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अब तो खुला खेल है

प्रसार भारती के ताजा निर्णय से कोई व्यावहारिक फर्क तो शायद ही पड़ेगा, लेकिन इससे यह साफ हुआ है कि देश में अलग-अलग दृष्टियों की उपस्थिति की जरूरत नहीं समझी जा रही है। वैचारिक विभिन्नताओं के सम्मान के माहौल को लगातार सिकोड़ा जा रहा है।

प्रसार भारती ने अपने सूचना स्रोत के लिए हिंदुस्थान समाचार नाम की एजेंसी का चयन किया, इसे सूचना स्रोतों को विविध बनाने की प्रक्रिया के हिस्से के रूप में देखा जा सकता था। लेकिन ऐसा देश की सबसे मशहूर समाचार एजेंसी पीटीआई से करार रद्द करने की कीमत पर किया गया। मतलब यह कि अब दूरदर्शन और आकाशवाणी से जितनी भी खबरें प्रसारित होंगी, उनका स्रोत हिंदुस्तान समाचार होगा। यह एजेंसी आरएसएस विचार से जुड़ी रही है। इसके संस्थापक विश्व हिंदू परिषद से जुड़े एक नेता थे। ऐसी खबरें चर्चित रही हैं कि नरेंद्र मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद इस एजेंसी को शक्ति देने के लिए नए सिरे से संसाधन जुटाए गए। अब यह सरकारी मीडिया को खबर देने वाली एकमात्र भारतीय एजेंसी बन गई है। किसी भी संगठन से जुड़ी एजेंसी के बारे में आम धारणा होती है कि वह खबरों को एक खास नजरिए से पेश करती है। हिंदुस्तान समाचार इस धारणा से मुक्त नहीं है। तो यह निष्कर्ष निकालना गलत नहीं है कि अब सरकार ने दृष्टि की विभिन्नता का आवरण हटा कर एक खास विश्व दृष्टि के आधार पर समाज में सूचना और कथानक फैलाने की दिशा में कदम उठा दिया है।

इसे किसी कीमत पर लोकतंत्र के लिए स्वस्थ बात नहीं समझा जा सकता। वैसे पिछले कुछ वर्षों में देश में सूचना का वातावरण है, उसमें यह विश्व दृष्टि पहले से ही अपना शिकंजा कस चुकी है। लोगों के दिमाग पर इसी नजरिए की बमबारी प्राइवेट मीडिया भी लगातार करता रहता है। इसलिए प्रसार भारती के ताजा निर्णय से कोई व्यावहारिक फर्क तो शायद ही पड़ेगा, लेकिन इससे सैद्धांतिक तौर पर इस बात की पुष्टि हुई है कि देश में मतभेद और अलग-अलग दृष्टियों की उपस्थिति की जरूरत नहीं समझी जा रही है। वैचारिक विभिन्नताओं के सम्मान के माहौल को लगातार सिकोड़ा जा रहा है। तात्कालिक रूप से यह सत्ताधारी दल के लिए लाभ की बात है। लेकिन दीर्घकाल में इसका असर लोगों के मन में तमाम सूचना तंत्र साख खत्म होने के रूप में सामने आएगा। बहरहाल, आज की सरकार ऐसी बातों की चिंता नहीं करती!

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