प्रशांत किशोर राजनीति के टेंट!

मेरा मानना है कि इस देश में कुछ लोगों का व्यक्तित्व इंसान की तरह नहीं बल्कि टेंट की तरह होता है। उन्हें वे कहीं भी कभी भी ,किसी भी आयोजन में इस्तेमालकर लिया जाता है। वे शादी से लेकर मरने के बाद चौथे तक के कार् में टेंट की तरह सीना तान कर खड़े हो जाते हैं व उस आयोजन की शोभा बढ़ाते हैं।

भारतीय राजनीति के नए रणनीतिकार कहे जाने वाले प्रशांत किशोर के बारे में अपनी यही राय है। उन्होंने एक टेंट की तरह भाजपा से लेकर कांग्रेस तक के अंगने में छाने व उसके कार्यक्रमों को सफल बनाने का काम किया। उन्होंने पहली बार 2011 में नरेंद्र मोदी के संपर्क में आकर उन्हें 2012 में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव को जिताने का काम किया था। तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद मोदी उनसे इतना ज्यादा खुश हुए कि उन्होंने उन्हें 2014 में लोकसभा चुनाव की सारी जिम्मेदारी सौंप दी व उन्हें इसमें पूर्ण बहुमत हासिल हुआ व प्रशांत किशोर तो मानो विजय के देवरहा बाबा व आसाराम की तरह हो गए।

मतलब वे धर्म, जाति, पार्टी से ऊपर उठकर एक सेलफोन कंपनी की तरह हर पार्टी व नेता को अपनी सेवाएं देने लगे व उनसे संपर्क स्थापित किया। 2016 में पंजाब विधानसभा चुनाव अभियान की रणनीति तैयार करने के लिए कांग्रेस ने उनसे सेवाएं ली मगर कैप्टन अमरेंद्र सिंह ने उन्हें ज्यादा अहमियत नहीं दी। इस चुनाव में लगातार दो बार हारी कांग्रेस पार्टी जीत गई व रणदीपसिंह सुरजेवाला व शंकर सिंह वाघेला ने उन्हें जीत का श्रेय दिया। उनकी सफलता को देखते हुए वाईएस जगनमोहन रेड्डी ने मई 2017 में प्रशांत किशोर को अपना राजनीतिक सलाहकार नियुक्त किया। उनके संगठन ने उनके लिए समराला संवरवरम, अन्ना पिलुपु और प्रजा संकल्प यात्रा सरीखे चुनाव अभियान तैयार किए व उन्होंने 175 में से 151 सीटों पर जीत हासिल की।

मगर उससे पहले का रिकार्ड भी है। साल 2017 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस द्वारा प्रशांत किशोर को अपना रणनीतिकार बनाए जाने के बावजूद वहां भाजपा ने 300 से ज्यादा सीटे जीती जबकि कांग्रेस महज सात सीटो पर सिमट कर रह गई। तब एक वरिष्ठ पत्रकार ने यह खुलासा किया था कि वास्तव में कांग्रेस पार्टी कभी उन्हें अपना रणनीतिकार नहीं बनाना चाहती थी। मगर कांग्रेस नेतृत्व ने प्रशांत किशोर को उन पर थोप दिया।

अब यह कहा जा रहा है कि हाल में दिल्ली विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने उन्हें अपना सलाहकार बनाया था व तमिलनाडु में द्रमुक प्रमुख एमके स्टालिन ने 2021 में होने वाले विधानसभा चुनावो के लिए उनकी सेवाएं ली हैं। इससे पहले 2015 के विधानसभा चुनाव में प्रशांत किशोर ने नीतिश कुमार के साथ मिलकर उन्हें तीसरी बार मुख्यमंत्री बनाने में मदद की थी। चुनाव जीतने के बाद नीतिश कुमार ने उन्हें कार्यक्रम नियोजन पर अपना सलाहकार बना दिया।

उनका विरोध होने के बावजूद नीतिश कुमार ने उन्हें बहुत अहमियत दी व उनको पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया। इससे पार्टी के कई वरिष्ठ नेता उन्हें नापसंद करने लगे। मुख्यमंत्री ने उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया मगर पिछले कुछ महीनो से उनके व नीतिश के संबंध खराब होने लगे। नागरिकता संशोधन विधेयक पर यह अंतर्विरोध खुलकर सामने आया। जहां जनता दल (यू) ने संसद के दोनों सदनों में इस विधेयक का समर्थन किया वहीं पीके ने खुलकर इसका विरोध किया। पीके ने नीतिश पर हमला करते हुए कहा कि 2005 के बाद बिहार का जरा भी विकास नहीं हुआ। मालूम हो कि 2005 में ही नीतिश ने सत्ता संभाली थी।

ध्यान रहे कि बिहार के विधानसभा चुनाव के पहले पीके के कहने पर ही नीतिश महागठबंधन में शामिल हुए थे व उन्होंने ही उनके कहने पर राजद-कांग्रेस व गठबंधन सहयोगी दलों के साथ सीटों का बंटवारा किया। तब लालू यादव ने पीके को नीतिश कुमार का दिमाग बताया था। पहले पीके कहते थे कि नीतिश कुमार की विचारधारा जेपी, राम मनोहर लोहिया व कर्पूरी ठाकुर की विचारधारा से मिलती है। मगर जब दोनों के संबंध खराब हो गए तो वे कहने लगे कि जो व्यक्ति नाथूराम गोडसे की पार्टी (भाजपा) के नेताओं के साथ गठबंधन कर रहा हो उसका उन लोगों की विचारधारा से क्या लेना-देना। जब टकराव और ज्यादा बढ़ा तो नीतिश कुमार ने कहा कि उन्होंने तो अमित शाह के कहने पर पीके को पार्टी में लिया था।

उधर पश्चिम बंगाल में भी पीके का टेंट लगा है। बंगालमें भाजपा अपने पैर जमाने की कोशिश कर रही है?  उसने पिछले लोकसभा चुनाव में 18 सीटें हासिल की थी। जब हाल में पीके पुनः ममता बनर्जी की मदद करने लगे तो भाजपा की उनसे नाराजगी बढ़ी। ध्यान रहे कि बिहार में भाजपा व जद(यू) मिलकर सरकार चला रहे हैं। उत्तर प्रदेश चुनाव में उनका जादू न चलने के बाद नीतिश कुमार पर उनका जादू उतर गया। वह मानते थे कि पंजाब में कांग्रेस की जीत की वजह कैप्टन अमरिंद्र सिंह थे व कांग्रेस को पीके का कुछ असर नहीं था। ध्यान रहे कि पश्चिम बंगाल में2021 में विधानसभा चुनाव होने हैं व बिहार के निकट आ रहे विधानसभा चुनावों को देखते हुए पीके ने मोदी विरोधी दलों व नेताओं को एकजुट करना शुरू कर दिया है।

लगता है कि दूसरे दलों को सत्ता में लाने के प्रयोग के सफल होने के कारण पीके के मुंह में भी खुद सत्ता में आने का स्वाद लग गया है। उन्होंने बिहार की बात संगठन के जरिए इस अभियान की शुरुआत की है। वे चाहते हैं कि बिहार में आठ महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव में वे भाजपा-जद(यू) गठबंधन को विपक्ष के जरिए कड़ी चुनौती दे। इसके लिए वे जेएनयू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार की मदद लेना चाहते हैं। हालांकि लालू यादव की राजद ने उन्हें ज्यादा अहमियत नहीं दी है।

मेरा शुरू से मानना रहा है कि भाड़े के सैनिको की किसी के प्रति आस्था नहीं होती है। पीके तो सैनिक नहीं कमांडर है। मुझे तो कई बार वे उस बंदर की तरह लगते हैं जिससे प्रसन्न होकर उसके मालिक राजा ने उसे अपना अंगरक्षक तैनात करते हुए उसके हाथ में तलवार थमा दी थी व एक दिन उस बंदर ने राजा के सोते समय उन्हें परेशान कर रही मक्खी को मारने के लिए उनकी गर्दन पर तलवार चला दी थी जब वह उनकी गर्दन पर जा बैठी थी।

One thought on “प्रशांत किशोर राजनीति के टेंट!

  1. बिल्कुल सही विश्लेषण किया आपने pk का लेकिंन आपके के विद्वान वरिष्ठ पत्रकार महोदय तो मोदी विरोध में इस टेंट वाले को पोलिश कर चमका चमका कर बिहार cm बनवाना चाहते है उफ मुंगेरीलाल के हसीन सपने

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