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बाइडेन के अच्छे, भले सौ दिन!

पृथ्वी के साढ़े सात अरब लोगों की सांस दो संकटों में अटकी है। एक, कोविड-19 के विषाणुओं से। दूसरे, तानाशाह-नीच प्रवृत्ति के उन नेताओं से जो वायरस से अपनी सत्ता और साम्राज्यवादी मंसूबों का मौका मानते हैं। चीन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग से लेकर रूस के राष्ट्रपति पुतिन जैसे नेता अपने वर्चस्ववादी-निरंकुश मॉडल की पताका का जलवा बूझे हुए हैं। चीन आर्थिकी की ताकत पर इतराते हुए इस घमंड में है कि उससे दुनिया में अब कोई प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता। जाहिर है दुनिया के लोगों को तकनीक-विकास के पिंजरे में गुलाम बनाने का विस्तारवादी रोडमैप है। इन दो संकटों का जवाब क्या? अपनी राय में अमेरिका के राष्ट्रपति के सौ दिनों का कार्यकाल। यों मैं वायरस संकट में पहले दिन से इस थीसिस का रहा हूं कि समाधान ज्ञान-विज्ञान-सत्य की खुली उड़ान याकि अमेरिका और पश्चिमी देशों के लोकतंत्र से निकलना है। वे ही पहले टीका बनाएंगे और दुनिया को महामारी से बाहर निकालेंगे। वही हुआ। अमेरिका-ब्रिटेन की प्रयोगशालाओं ने ही वैक्सीन का रास्ता बनवाया और अगले छह महीनों में ये देश कोविड संकट से बाहर निकल सामान्य होंगें और पश्चिमी सभ्यता फिर पटरी पर दौड़ चलेगी।

बावजूद इसके चीन और वायरस काल के अनुभव को भुलाया नहीं जा सकता है। महामारी ने जो विनाश किया है उससे बाहर निकल अमेरिका को वह पुनर्निर्माण तो करना होगा जो हर ध्वंस के बाद जरूरी होता है। उस नाते अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने बुधवार को संसद में अपनी सरकार के सौ दिन का ब्योरा देते हुए जो भाषण किया है और जो संकल्प बताए वह कुछ मायने में वैसे ही ऐतिहासिक है जैसे वैश्विक महामंदी के बाद फ्रैंकलिन रूजवेल्ट का था। खलास अमेरिका में रूजवेल्ट ने तब जैसे जान फूंकी थी और उनसे फिर जो अमेरिका बना, विश्व का जैसे सिरमौर, चौकीदार हुआ वैसा कुछ बाइडेन से हो, यह वक्त सही साहित करे तो आश्चर्य नही होगा। फिलहाल इतना गारंटी से कहा जा सकता है कि अमेरिका फिर खड़ा हो गया है। जो बाइडेन अमेरिका को अगले चार वर्षों में पूरी तरह बदलने वाले हैं और लोकतंत्र विरोधी जो भी देश, नेता हैं उनके साथ अमेरिका सख्ती से पेश आएगा।

बाइडेन नपा तुला बोले। अमेरिका के संकट और मूल्यों, जरूरतों के एक-एक बिंदु पर दो टूक आह्वान करते हुए उन्होंने बताया कि वे और उनकी संसद 21वीं सदी अमेरिका की बनाने के लिए वह सब करेंगे जो जरूरी है। उनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी पहले सौ दिनों में दुस्साहसी फैसले किए थे। उस नाते चार साल डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका में जितनी तरह के प्रयोग किए, वह यदि अमेरिका को बदलने की उनकी सोच, तासीर अनुसार उथल-पुथल वाले थे तो उससे भी ज्यादा अनुपात में बाइडेन ने अपना इरादा बताया है। रोनाल्ड रीगन से डोनाल्ड ट्रंप के बीच रिपब्लिकन पार्टी के राष्ट्रपतियों ने घोर पूंजीवादी-दक्षिणपंथी आर्थिकी में दशा-दिशा बदली तो बाइडेन का राज उस सब पर न केवल ब्रेक है, बल्कि डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति शासनों (कार्टर-क्लिंटन से लेकर ओबामा) से भी कई गुना दुस्साहसी जनकल्याणकारी योजनाओं का रोडमैप लिए हैं। किसी जानकार ने ठीक कहा कि बाइडेन ने जो रोडमैप बताया है वह अमेरिका को उन यूरोपीय देशों में बदलेगा जो जनकल्याणकारी- उदारवाद में ढले हुए हैं। मतलब अमेरिका को फ्रांस, नीदरलैंड, स्कैंडनेवियाई देशों में बदलना। हां, स्वीडन, नार्वे, डेनमार्क, नीदरलैंड जैसे देश सचमुच जलवायु परिवर्तन का ख्याल करते हुए जीवन जीते हैं तो लोगों की रोजमर्रा की हर तरह की चिंता का बंदोबस्त भी सरकार अपने जिम्मे लिए हुए है।

 

बाइडेन ने जो कहा है और संसद ने यदि उस अनुसार कानून बना दिए तो चार वर्षों में अमेरिका बहुत बदल हुआ होगा। पढ़ाई हो, छोटे बच्चों की घर पर देखभाल, दवा का बिल हो या रोजगार सभी में संघीय सरकार, जहां नई व्यवस्थाएं बनवाएगी वहीं स्वास्थ्य व्यवस्था बतौर हक लोगों की सेवा वाली होगी। ओबामा ने जो किया या पूर्ववर्ती डेमोक्रेटिक राष्ट्रपतियों या सैंडर्स जैसे लिबरल नेताओं ने जो सोचा है उससे कई गुना अधिक फैसले बाइडेन लेते हुए हैं। प्रति घंटा 15 डॉलर की न्यूनतम मजदूरी और पूरे देश का इफ्रांस्ट्रक्चर बदल डालने के खरबों डॉलर के बजट के साथ जलवायु परिवर्तन के मकसद में नई तकनीक और उसमें रोजगार का उन्होने वह रोडमैप बनाया है, जिससे अमेरिका अगले चार साल हाइपर एक्टिव रहेगा। आर्थिकी दौड़ेगी। नई तकनीक, नए विकास में खरबों डॉलर उड़ेले जाने हैं तो अपने आप चीन, रूस या अमेरिका की कीमत पर अमेरिका को पछाड़ने का ख्याल लिए लोग उसके पीछे हाफंते हुए होंगे।

सवाल है बाइडेन पैसा-पूंजी का जुगाड़ कैसे करेंगे? वायरस से आर्थिकी दिवालिया हुई है महामंदी के बाद की सर्वाधिक मंदी के दौर में अमेरिका रहा है तो निवेश के लिए पूंजी-पैसा कहां से? जवाब बाइडेन का दुस्साहस है। उन्होंने अमेरिका के एक प्रतिशत खरबपतियों, खरबपति कंपनियों पर टैक्स लगाने का फैसला किया है। अमेरिका के एक प्रतिशत खरबपति, सीईओ-कंपनियां साल में कितना मुनाफा कमाती है इसे समझने के लिए अंबानी-अडानी ने कोरोना काल के एक वर्ष में अपनी जैसी जो संपदा बढ़ाई है उस अनुसार जरा सोचें और अनुमान लगाएं कि गूगल, फेसबुक, अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट जैसी महाबली अमेरिकी कंपनियों पर अमेरिकी संसद टैक्स बढ़ाए तो सरकार को कितनी रेवेन्यू एक झटके में अतिरिक्त मिलेगी? इन कंपनियों पर सालाना कमाई का पांच-दस-पंद्रह प्रतिशत टैक्स बढ़ाना ही नया कुबेर का खजाना बनना होगा तो भला बाइडेन महामारी काल के बाद के पुनर्निर्माण के मौके पर क्यों चूकें?

सोच कर हैरानी होती है कि बिना करिश्मे के व्यक्तित्व वाले सहज-मृदु आवाज (डॉ. मनमोहन सिंह से कुछ बुलंद) वाले बाइडेन ने सौ दिनों में जो किया है (52 प्रतिशत आबादी का टीकाकरण, ट्रंप के तमाम फैसलों को बदलने, चीन-पुतिन सबके प्रति दो टूक विदेश नीति आदि) वह भला कैसे संभव है? कैसे संभव है साथी देशों में फिर अमेरिकी साख-धाक का बहाल होना?  इसलिए कि बाइडेन और उनकी टीम लफ्फाज नहीं है। संसद और प्रशासन का बाइडेन को गहरा अनुभव है। कार्यशैली विक्रेंदित है। बाइडेन ने अपनी उप राष्ट्रपति कमला हैरिस को इतनी जिम्मेवारी दी है, अपने मंत्रियों को इतना दौड़ाया हुआ है कि वाशिंगटन के अनुभवी जानकार भी बाइडेन को लेकर यह कहते मिलेंगे कि उनसे इतनी उम्मीद नहीं थी। बाइडेन ने पके हुए-अनुभवी बुजुर्ग की तरह प्रशासन को मुखिया वाला वह नेतृत्व दिया है, जिससे हर कोई (मंत्री, संसदीय नेता, पार्टी) विश्वास-भरोसे के साथ मेहनत करते हुए हैं।

इसका अर्थ यह नहीं कि बाइडेन ने जो कहा है उसके लिए संसद और विरोधी रिपब्लिकन पार्टी व ट्रंप की टीम अपनी तह पहल कर सहयोग करेगी। बाइडेन का भाषण आम राय का आह्वान लिए हुए था लेकिन उन्होंने जिस बेबाकी व खुलेपन से देश के कायाकल्प की योजना बताई है उससे अपने आप रिपब्लिकन-अनुदारवादी राजनीति भड़केगी। टकराव भी बनेगा लेकिन बाइडेन क्योंकि महामारी के अनुभव में लोगों की जरूरत, सोच अनुसार बोलते हुए हैं, रीति-नीति बनाते हुए हैं तो जनता में उनका समर्थन बढ़ रहा है और वह वैक्सीनेशन व आर्थिकी में तेजी से बढ़ता जाएगा। इससे अपने आप बाइडेन का एजेंडा चल पड़ेगा। जाहिर है अमेरिका के दिन अच्छे आने हैं और चीन-रूस जैसे देश जो पैंतरे चल रहे थे उस पर चेकमेट लगेगा।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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