ट्रंप की यात्रा सिर्फ नौटंकी नहीं

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की इस भारत-यात्रा से भारत को कितना लाभ हुआ, यह तो यात्रा के बाद ही पता चलेगा लेकिन ट्रंप ऐसे नेता हैं, जो अमेरिकी फायदे के लिए किसी भी देश को कितना ही निचोड़ सकते हैं। यह तथ्य उनकी ब्रिटेन, यूरोप तथा एशियाई देशों की विभिन्न यात्राओं में से अब तक उभरकर आया है। ट्रंप की खूबी यह है कि वे सारी राजनयिक नज़ाकतों को ताक पर रखकर खरी-खरी बोल पड़ते हैं। उन्होंने नरेंद्र मोदी से अपने संबंधों की घनिष्टता पर बार-बार जोर दिया है, उन्हें ‘भारत का पिता’ भी कह दिया है लेकिन आपसी व्यापार के मामले में उन्होंने भारत के व्यवहार पर काफी कड़ुवे शब्दों में आपत्ति भी जताई है।

अमेरिका ने अभी-अभी भारत का विकासमान राष्ट्र का दर्जा भी खत्म कर दिया है, जिसका अर्थ यह है कि भारत को अपने माल पर मिलनेवाले अमेरिकी तटकर में भारी कटौती हो जाएगी। भारत ने भी जवाबी कार्रवाई कर दी है। इसीलिए शायद इस यात्रा के दौरान आपसी व्यापार का मामला नहीं सुलझ पाएगा लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि ट्रंप की यह यात्रा सिर्फ एक नौटंकी बनकर रह जाएगी। नौटंकी तो वह है ही। मोदी और ट्रंप इस मामले में गुरु-शिष्य हैं। ट्रंप का बार-बार यह कहना कि अहमदाबाद में उनके स्वागत में 50-70 लाख लोग आएंगे, कोरा मजाक है। शायद उन्होंने फोन पर बातचीत में हजार को लाख समझ लिया हो। जो भी हो, ट्रंप के लिए यही बहुत फायदेमंद है कि अमेरिका के 40 लाख भारतीय वोटरों को वे अपने चुनाव के लिए प्रभावित कर लेंगे। उनकी यात्रा के दौरान पांच समझौतों पर दस्तखत की तैयारी चल रही है। एक तो आतंकवाद विरोधी सहयोग, व्यापारिक सुविधाओं, बौद्धिक मालिकाना हक, भारत-प्रशांत क्षेत्र सहयोग तथा अंतरिक्ष और परमाणु सहयोग के समझौतों की घोषणा की तैयारियां चल रही हैं।

चीनी वर्चस्व के विरुद्ध लड़ने में भी अमेरिका भारत को अपने साथ लेना चाहता है लेकिन अफगानिस्तान से अपना पिंड छुड़ाने में वह पाकिस्तान को गले लगाए बिना नहीं रह सकता। तालिबानी अफगानिस्तान से निपटने की कोई तैयारी भारत के पास अभी तक दिखाई नहीं पड़ रही है। ट्रंप से इस मामले में मोदी को खुलकर बात करनी चाहिए। भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता के ट्रंप के प्रस्ताव को औपचारिक तौर पर भारत नहीं मानेगा लेकिन ट्रंप चाहे तो वे अपनी इस सदिच्छा को अनौपचारिक रुप में कृतार्थ कर सकते हैं।

 

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