संसद में देववाणी, मन की बात | modi man ki baat | Naya India बेबाक विचार
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संसद में देववाणी, मन की बात!

Narendra modi

modi man ki baat : आंकड़े बोलते हुए हैं। मैं अपनी तरफ से कुछ नहीं जोड़ रहा हूं। पिछले सात सालों में मोदी राज में खूब कानून बने। लेकिन कितनों पर संसदीय, सेलेक्ट कमेटी में विचार हुआ? कितनों पर संसद में लंबी लाइव बहस हुई? कितनी बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण हुए? अक्टूबर 2020 में छपी एक रिपोर्ट का आंकड़ा है कि छह सालों में प्रधानमंत्री मोदी 22 दफा बोले। इतना कम दो साल प्रधानमंत्री रहने वाले एचड़ी देवगौड़ा का आंक़ड़ा है। ठीक विपरीत छह वर्ष के कार्यकाल में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी 77 दफा बोले। जिन डॉ. मनमोहन सिंह को नरेंद्र मोदी ने सन् 2012 में मौनमोहन सिंह कहा था उन्होंने दस साल के अपने कार्यकाल में 48 दफा बोला।

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यह आश्चर्य की बात हो सकती है क्योंकि इतने भाषण देने वाले नरेंद्र मोदी संसद में क्यों इतना कम बोलते हुए? इसलिए कि संसद में बोलना टोका-टोकी, बहसबाजी के बीच होता है। विषय विशेष पर सच बोलना या बताना होता है? जनसभा में भाषण, रेडियो-टीवी पर ‘मन की बात’ या संबोधन में क्योंकि बस बोलना और सुनाना है तो वह एकतरफा संवाद हुआ। भाषण किया, हेडलाइन बन गई और बात खत्म। लेकिन संसद में बोलना जी का जंजाल है?रिकार्ड रहता है। प्रधानमंत्री ने जिन फैसलों, शासन की जिन बातों, देश के अनुभव को ऐतिहासिक, गजब और चमत्कारिक करार देने वाली बातें कहीं है उन पर याद करें कि वे बतौर प्रधानमंत्री संसद में कब बोले, कितना और क्या बोले?

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पर क्या बोले। सोचें, डेढ़ साल से चीन के साथ सीमा पर गतिरोध है, भारतीय इलाके में चीनी सेना घुसी हुई है तो प्रधानमंत्री क्या संसद में चीन का नाम ले कर कह सकते हैं कि चीन से सब ठीक है या उसकी सेना ने उकसाने वाला काम, भारत के इलाके में सेना तैनात नहीं की? या वे संसद से महामारी का अपना भी जाना सत्य भला कैसे शेयर कर सकते हैं? वे आर्थिकी पर क्या भाषण करेंगे या विदेश नीति के अफगानिस्तान या चीन की भारत विरोधी साम्राज्यवादी घेरेबंदी पर संसद में क्या बोंलेंगे? लोगों की बेरोजगारी, महंगाई, पेट्रोल-डीजल के दामों पर प्रधानमंत्री के पास संसद में बताने को क्या है?

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modi man ki baat : इससे भी अधिक त्रासद पहलू है जो सांसदों को भी विधेयकों पर पूरे विचार, बहस का मौका और पहले जैसा समय  नहीं मिलता है। आंक़ड़ा है कि 2019 की गर्मियों के सत्र में 40 बिल पेश हुए और उसमें चार पेश होने के दिन ही पास हो गए। उसके बाद सन् 2020 के सत्र में 22 बिल में इस तरह तीन बिल पास हुए। उन्हीं में एक बिल किसान पैदावार व्यापार-वाणिज्य बिल था, जिस पर विरोधी सांसदों ने हल्ला किया और आठ सासंद सस्पेंड हुए। कई विपक्षी दलों ने तब बाकी सत्र का बहिष्कार किया। उस मौके का फायदा उठा फिर सरकार ने अपने सांसदों से 15 विधेयक पास करवाए, जिसमें श्रम सुधार कानून भी था। ध्यान रहे मोदी सरकार ने संसद में बिल से पहले संसदीय कमेटियों में उन पर गहन विचार कराना छोड़ा हुआ है। आंकड़ा है कि 15वीं लोकसभा में संसदीय कमेटियों में कोई 71 प्रतिशत बिल जाते थे उनकी संख्या 16वीं लोकसभा में 25 प्रतिशत रह गई। और सन् 2020 में एक भी बिल मसौदा संसदीय कमेटी में विचार के लिए नहीं भेजा गया। मतलब अफसरों ने जैसा बनाया उस पर जनप्रतिनिधियों का कायदे से विचार-मंथन नहीं। परिणाम सामने है किसान बिल को ले कर आज जो गतिरोध है और श्रम सुधार आदि के खिलाफ चुपचाप जो पकता हुआ असंतोष है उसमें सरकार को या तो जिद्दी रूख अपनाना पड़ रहा है या न माया मिली न राम!

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ऐसे ही संसद में सवाल-जवाब, सरकार-अफसरों को जवाबदेह बनाने की सारी प्रक्रिया लगभग ठप्प है। बजट में क्या हुआ और उससे क्या बन रहा है इस पर भी सत्तारूढ भाजपा के सांसदों को समझने, बहस करने, सुझाव देने का मौका नहीं मिला क्योंकि पिछले दो सालों से बजट को कोरोना के बहाने फटाफट जैसे-तैसे पास कराया जाता रहा है। नतीजा है कि प्रधानमंत्री से लेकर पूरी सरकार में, संसद में किसी को समझ नहीं आ रहा है कि आर्थिकी किधर जा रही है। सरकार को-लोगों को महंगाई, बेरोजगारी, बरबादी की पता नहीं कितनी कीमत चुकानी पड़ेगी. modi man ki baat

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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