प्रणवदा और हम रिपोर्टर - Naya India
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प्रणवदा और हम रिपोर्टर

प्रणव मुखर्जी के दुनिया से चले जाने के बाद मुझे उनकी बहुत याद आ रही है। इसकी वजह यह नहीं है कि मैं उनके बहुत करीब था बल्कि इसलिए कि एक बार उन्होंने मुझसे जो कहा था वह मेरे जीवन का आदर्श वाक्य बन गया था। आज भी मैं खुद को सांत्वना देने के लिए उनकी उस बात को याद करता हूं। एक बार जब मैंने दक्षिण दिल्ली स्थित उनके घर में उनसे मुलाकात के दौरान कहा कि आपकी जिदंगी में इतने उतार-चढ़ाव आए हैं। उन्हें आप किस तरह से देखते हैं? इस पर उन्होंने कहा कि जिदंगी में एक बात हमेशा याद रखना कि हमें ज्यादातर अपनी किस्मत से ही मिलता है। वह कब व कितना मिलेगा यह समय तय करता है।

उन्होंने एक बार तो सार्वजनिक रूप से यह कहा था कि मुझे अपनी कमजोरियां पता है। चूंकि मेरी हिंदी बहुत अच्छी नहीं है इसलिए मैं देश का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता हूं। प्रणवदा व मेरे संबंध वैसे ही थे जैसे कि आमतौर पर एक पत्रकार व नेता के होते हैं। वे कांग्रेस के अन्य नेताओं से एकदम अलग थे। जहां नेता पत्रकारों के साथ बहुत मित्रवर व्यवहार करते हैं। उन्हें देखकर मुस्कुराते रहते हैं। वहीं प्रणव दादा पत्रकारो को उलाहना देने, नाराज होने, उन पर गुस्सा उतारने से नहीं घबराते थे।

जब मैं कांग्रेस कवर करता था तो अक्सर उनसे मिलने के लिए पार्टी दफ्तर स्थित उनके कमरे में जाता था। वहां कभी अकेले नहीं जाता था। मेरी तरह तमाम पत्रकारों की यही कोशिश होती थी कि हम लोग झुंड में उनसे मिले ताकि उनके गुस्से पर नियंत्रण रखा जा सके। मेरी कोशिश रहती थी कि कोई बंगाली पत्रकार हमारे साथ में हो। जब हम लोग उनसे मिलते तो बंगाली पत्रकार बंगाली में अपनी बाते शुरू करता व कुछ देर बाद हम लोग हिंदी में अक्सर बात करते। वे नाराज हो जाते व गुस्से में उनका चेहरा लाल हो जाता था।

मैंने यह हालात संसद के अंदर बजट पेश करने के दौरान उनके गुस्सा हो जाने पर भी देखी। एक बार तो उन्होंने किसी बात से नाराज होकर संसद के गलियारे में पत्रकारो के बीच डा नजमा हैपतुल्ला को डांटना शुरू कर दिया था। वे नेता की जगह हम लोगों के लिए मास्टर तुल्य ज्यादा थे। एक बार उन्होंने कुछ पत्रकारो को घर पर खाने के लिए आमंत्रित किया। उनमें मैं भी शामिल था। रात को खाने पर आए कुछ पत्रकारों को पीने की तलब हो रही थी। बहुत हिम्मत करके एक पत्रकार ने उनसे कहा कि दादा हमारे पीने की व्यवस्था हो जाए तो हिल्सा मछली खाने का मजा आ आए। यह सुनते ही प्रणवदा बौखला कर कहने लगे कि आप मेरे घर खाना खाने आए हैं। मेरा घर कोई दारू का ठेका नहीं है। खाना खाना है तो खाओ नहीं तो निकल जाओ। गैट आउट।

उनकी बात सुनकर सब घबरा गए व फिर कभी किसी ने उनसे यह घृंष्टता नहीं की। उनकी एक खासियत यह थी कि उनकी याददाश्त गजब की थी व जब वे हिंदी बोलते तो बंगाली अंदाज में उनकी बातों में रस भर जाता था। हम लोग अक्सर उनसे ऐसा सवाल पूछते जिससे वे हरियाणी बोले, वह कहते ‘यू नो व्हाट हैप्पिंड हो हरियाणा’ यह सुनकर हम लोग मुस्कुराने लगते व उनकी आंखों में गुस्सा नजर आने लगता।

आमतौर पर बांग्ला पत्रकार उन्हें घेरे रहते थे। मगर हमारी एक मित्र पत्रकार हिंदी अखबार से थी जिन्हें दादा बहुत अहमियत देते थे। एक बार संसद परिसर में अपनी प्रेस कांफ्रेंस में दादा ने सवाल पूछने से पहले हर पत्रकार से अपना नाम व अखबार का नाम बताने को कहा। जब उनकी बारी आई तो उन्होंने कहा, मैं शिखा परिहार हूं, इंदौर के नई दुनिया अखबार से। इस पर दादा ने कहा दैट वरनाकुलर न्यूजपेपर। इस पर वे नाराज हो गई व उन्होंने गुस्से में कहा कि आप अंग्रेजीदा लोगों की यही दिक्कत है कि आप लोग अंग्रेजों की तरह हिंदी व क्षेत्रीय भाषाओं के अखबारो की ‘वरनाकुलर’ कह उनको अपमानित करते हैं।

इस पर दादा ने जवाब दिया कि आप नाराज मत होइए। मेरे कहने का अर्थ नई दुनिया रिजनल अखबार है। इसके बाद उन्होंने सबके सामने उन्हें मनाने की कोशिश की। वे देखते-ही-देखते दादा के काफी करीब हो गई। जब कभी हमें उनसे मिलना होता तो हम पत्रकार लोग शिखा परिहार को साथ लेकर तालकटोरा रोड स्थित उनके सरकारी निवास पर जाते व उनके निजी स्टाफ में नियुक्त रणबीर सिंह चौधरी हमसे कहते कि दादा का मूड कुछ ठीक नहीं है। मगर चूंकि मैडम आई है इसलिए दादा आप लोगों से जरूर मिलेंगे।

इसके बाद वे दादा को हमारे व शिखाजी के आने की सूचना देते व दादा हम लोगों को बुला लेते। अक्सर तो थके होने पर बिस्तर पर आराम कर रहे दादा हमसे लेटे-लेटे ही बातें करते व चाय पिलवाते। एक बार रणवीर चौधरी ने कहा कि दादा मैडम की बहुत इज्जत करते हैं इसलिए हम लोग इन्हें शिखा नहीं सखाजी कहते हैं। प्रणवदा की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वे अपने संबंधों को बहुत अहमियत देते थे।

प्रणवदा राष्ट्रपति बने तो हम लोगों को लगता था कि शिखा परिहार को सूचना अधिकारी का सा कुछ अहम पद देंगे। मगर उन्हें कोई पद नहीं दिया गया। उनके निजी स्टाफ में एक बुजुर्ग पीए एम.के मुखर्जी, रणवीर सिंह व चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी हीरालाल भी था। वह 1980 से उनके साथ था। वह उनके साथ राष्ट्रपति भवन तक गया। उसकी पीठ में कुछ तकलीफ थी व वह थोड़ा झुककर चलता था। जब प्रणव मुखर्जी सत्ता के बाहर हुए तो वह किसी और जगह सरकारी नौकरी करने लगा। मगर वह हर शाम छुट्टी होने पर उनसे मिलने के लिए उनके घर आ जाता था।

वह उनका बेहद विश्वासपात्र था। उन्होंने उसे उसकी कमर के ईलाज के लिए मुंबई भेजा था व उसके बेटे की शादी के रिसेप्शन में भी शामिल हुए थे। मगर जब पहली बार उनके मंत्री बनने पर सूचना कार्यालय की एक सूचना अधिकारी ओमिता पॉल उनके संपर्क में आई तो उन्होंने उन्हें वित्त, रक्षा व विदेश मंत्रालय से लेकर राष्ट्रपति भवन तक हमेशा अपने साथ रखा। उन्हें इतनी ज्यादा अहमियत दी कि जब मोदी सरकार का शपथ ग्रहण हो रहा था तो ओमिता पॉल ने न केवल सभी मंत्रियो को बुलवा शपथ दिलवाई बल्कि वे प्रांगण में चल रहे समारोह में विदेश से आए राष्ट्रप्रमुखों की अगवानी तक करने गई।

एक बार तो प्रणवदा उन्हें अपने साथ राष्ट्रपति भवन से बग्घी में बैठाकर संसद तक ले आए व उनके इस कदम की काफी आलोचना हुई। यह संयोग ही कहा जाएगा कि उनकी कार का मैकेनिक व मेरी कार का मैकेनिक ‘नासिर’ उनके बेहद करीब था। जब वह उनकी कार ठीक करने के बाद तालकटोरा रोड स्थित उनके घर आता तो थोड़ी दूरी पर स्थित मेरे घर भी आ जाता और मैं उसे चाय पिलाते हुए उसकी बाते सुनता। नासिर ने मुझे बताया कि दादा ने कभी भी बिल में एक भी पैसा कम नहीं किया। वे उसे हमेशा चाय पिलवा कर भेजते थे। नासिर ही उनकी पुरानी कारे बेचता था। जब दादा राष्ट्रपति बन गए तो वह उनके दफ्तर से वीआईपी कोटे से रेल टिकट का आरक्षण करवाता था। अपने बच्चो के दाखिले के लिए पत्र लिखवाता था

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