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सार्वजनिक शिक्षा स्वास्थ्य का लौटेगा दौर!

public education health system

बहुत समय नहीं बीता, जब भारत में शिक्षा और स्वास्थ्य सार्वजनिक उपक्रम थे। लोगों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराना सरकारों की जिम्मेदारी होती थी। स्कूल, कॉलेज और अस्पताल सरकारी होते थे। निजी शिक्षण संस्थानों और अस्पतालों की संख्या बहुत मामूली थी और देश की बहुत छोटी आबादी उनका इस्तेमाल करती थी। आर्थिक उदारीकरण के बाद सुनियोजित तरीके से शिक्षा और स्वास्थ्य की सरकारी व्यवस्था को कमजोर किया गया ताकि निजी शिक्षण संस्थान और अस्पताल फल-फूल सकें। ऐसा नहीं है कि सिर्फ शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में ऐसा हुआ। संचार से लेकर परिवहन तक लगभग हर सेक्टर में यह देखने को मिला। सो, सवाल है कि क्या समय का चक्र उलटा घुमाया जा सकता है? क्या सब कुछ पहले की तरह हो सकता है?

हर सेक्टर में ऐसा संभव नहीं है। लेकिन कम से कम शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में पुरानी व्यवस्था बहाल हो सकती है। इस उम्मीद के दो कारण हैं। पहला कारण कोरोना वायरस की महामारी है, जिसने सस्ती और बेहतर शिक्षा व स्वास्थ्य व्यवस्था की जरूरत को रेखांकित किया है। दूसरा कारण दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार के शिक्षा व स्वास्थ्य मॉडल की सफलता है। केजरीवाल ने अपनी तमाम राजनीतिक नाटकीयताओं के बावजूद सार्वजनिक शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था को राजनीतिक विमर्श का केंद्र बना दिया है। गुजरात और दिल्ली मॉडल का यह बुनियादी फर्क है। गुजरात मॉडल के तहत स्कूल-कॉलेज व अस्पताल नहीं दिखाए गए थे, बल्कि औद्योगिक व आर्थिक विकास दिखाया गया था। उसके उलट केजरीवाल दूसरे राज्यों में जाकर अपने स्कूल और अस्पताल दिखा रहे हैं। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन दिल्ली आए तो सरकारी स्कूल देखने गए। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कहा कि वे दिल्ली के सरकारी स्कूलों की तर्ज पर अपने यहां स्कूल विकसित करवाएंगी।

पता नहीं स्टालिन और ममता बनर्जी ऐसा कर पाएंगे या नहीं लेकिन यह बहुत बड़ी बात है कि तीन दशक के बाद समय का पहिया उलटा घूम रहा है। तीन दशक पहले आर्थिक उदारीकरण के साथ यह धारणा बनी थी कि सरकारी स्कूलों में अच्छी पढ़ाई नहीं होती है और अगर किसी को अपने बच्चों का भविष्य बनाना है तो उसे निजी स्कूल में भेजना होगा। इसका नतीजा यह हुआ कि गली गली में निजी स्कूल खुलने लगे। सरकारी अस्पतालों के बारे में भी ऐसी ही धारणा बनाई गई। ऐसा नहीं है कि यह धारणा अपने आप बनी। सरकारों ने भी शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च घटाना शुरू किया। शिक्षकों और डॉक्टरों की नियुक्ति कम की। स्कूल और अस्पताल बनाने बंद किए और इस तरह अच्छी शिक्षा व स्वास्थ्य की व्यवस्था निजी हाथों में सौंप दी। केजरीवाल ने भले अपने राजनीतिक फायदे के लिए किया हो लेकिन उनकी दिल्ली सरकार ने बजट का लगभग 40 फीसदी हिस्सा शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करना शुरू किया है। ऐसा नहीं है कि इससे निजी शिक्षण संस्थानों और अस्पतालों की जो शृंखला बनी है वह बंद जाएगी लेकिन उसके बरक्स सस्ती व बेहतर गुणवत्ता वाले सरकारी स्कूल व अस्पतालों की व्यवस्था विकसित होगी तो देश की बड़ी आबादी को उसका लाभ मिलेगा।

कोरोना वायरस की महामारी ने भी एक अवसर उपलब्ध कराया है। इस बात को ऐसे भी कह सकते हैं कि कोरोना महामारी और उससे पहले देश की अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती ने लोगों को मजबूर किया कि वे शिक्षा और स्वास्थ्य की सरकारी व्यवस्था की ओर देखें। एनुअल स्टैट्स ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट यानी एएसईआर के मुताबिक 2018-21 के बीच सरकारी स्कूलों में दाखिले में छह फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। जाहिर है यह बढ़ोतरी लोगों की आर्थिक स्थिति में आई गिरावट के कारण हुई है। यह आंकड़ा 2018-21 का है, इसके अगले एक साल में स्थिति और खराब हुई है। मध्य वर्ग का बड़ा हिस्सा गरीबी रेखा के नीचे गया है। उसकी मजबूरी हो गई है कि वह अपने बच्चों का दाखिला सरकारी स्कूलों में कराए। ऐसे में अगर सरकारें व्यवस्था में सुधार करती हैं, शिक्षकों की नियुक्ति करती हैं और नए स्कूल-कॉलेज बनवाए जाते हैं तो सरकारी स्कूलों में लौटे बच्चों को उसी स्कूल में बनाए रखा जा सकता है। इसके लिए सरकारी खर्च में बढ़ोतरी करनी होगी। आमतौर पर महामारी के दौरान शिक्षा पर खर्च कम होता है।  भारत में भी हुआ। पिछले साल शिक्षा पर खर्च में छह फीसदी की कमी हुई थी लेकिन अगले साल के लिए इसमें 12 फीसदी की बढ़ोतरी की गई है।

इसी तरह कोरोना महामारी ने स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियों को उजागर किया है। राजधानी दिल्ली से लेकर देश के दूसरे हिस्सों में भी देखने को मिला कि सरकारी अस्पतालों में लोगों को बेहतर इलाज मिला, जबकि निजी अस्पतालों में लूट हुई। निजी अस्पतालों ने टेस्ट से लेकर इलाज और इंजेक्शन से लेकर दवा के नाम पर मरीजों को लूटा। अनाप-शनाप पैसे बनाए और इसके बावजूद खराब इलाज, दवा और ऑक्सीजन की कमी से लोग मरे। ऑक्सीजन की कमी से ज्यादातर मौतें निजी अस्पतालों में हुईं। सो, लोगों का निजी अस्पतालों से मोहभंग हुआ और आर्थिक बदहाली से मजबूरी भी हुई कि वे सरकारी अस्पतालों की तरफ देखें।

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अब जरूरत इस बात की है कि सरकारी स्कूलों और अस्पतालों को लेकर बनी धारणा को तोड़ा जाए। जनता और सरकार दोनों मिल कर यह काम कर सकते हैं। लोगों को ध्यान रखना चाहिए कि नवोदय और केंद्रीय विद्यालयों की गुणवत्ता किसी भी निजी स्कूल के टक्कर की है। दिल्ली विश्वविद्यालय से लेकर जेएनयू, जामिया और बीएचयू जैसे संस्थान किसी भी निजी विश्वविद्यालय से बेहतर हैं। एम्स से लेकर सफरदजंग, एलएनजेपी और जीबी पंत अस्पताल का इलाज किसी निजी अस्पताल के इलाज से अच्छा है।

और अब तो पंजाब में आम आदमी पार्टी की जीत से यह भी प्रमाणित हो गया है कि स्कूल और अस्पताल बनवा कर वोट हासिल किया जा सकता है और चुनाव जीता जा सकता है। दो राज्यों में आम आदमी पार्टी की सफलता ने इस बात को स्थापित किया है कि विकास के नाम पर ऊंची इमारतों और चिकनी सड़कों के निर्माण के साथ साथ अगर सामाजिक मुद्दों पर खर्च बढ़ाया जाए तो उसका राजनीतिक फायदा मिल सकता है। आर्थिक व औद्योगिक विकास के बरक्स सामाजिक विकास समय की जरूरत है। अगर आज सरकारें सामाजिक विकास पर ध्यान देंगी और उस पर खर्च बढ़ाएंगी तो आने वाले समय में आर्थिक व औद्योगिक विकास की मजबूत बुनियाद बनेगी।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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