सरकारी जमीनों की बंदरबांट

एक पुरानी कहावत है कि इस दुनिया में सारे विवादों की जड़ जर, जोरू और जमीन होती है। महाभारत का कारण कौरवों द्वारा अपने भाई पांडवों को एक इंच तक जमीन ने देने से साफ इंकार कर देना था। जबकि रामायण राम और रावण के टकराव की वजह उनकी पत्नी सीता बनी। पूरी दुनिया में तो एक दूसरे पर कब्जा करने उसकी संपत्ति हथियाने के लिए झगड़े होते आए हैं। और अब देश के संपन्न राज्य पंजाब में जमीन के कारण एक नया विवाद खड़ा हो गया है। इस देश में सबसे ज्यादा अनुसूचित जाति के लोग पंजाब में रहते हैं। जहां देश की जनसंख्या का औसत 37.45 फीसदी हिस्सा अनुसूचित जाति के लोगों का है वहीं पंजाब में उनका 37.46 फीसदी है।

इनमें से बड़ी तादाद में दलित कहे जाने वाले या तो भूमिहीन व गरीब है। उनकी माली हालत सुधारने के लिए राज्य सरकार ने पंजाब विलेज कामनलैंड एक्ट का गठन किया। गांव की शामलात जमीन को उन्हें पट्टे पर देना शुरू कर दिया। शामलात जमीन गांव की वह जमीन होती है जिसका कि मालिक पूरा गांव होता है। यह जमीन ऐसे किसानों को खेती करने के लिए हर साल दी जाती है। पंजाब में कुल 1.5 लाख एकड़ शामलात जमीन है। गांव की पंचायत इसकी मालिक होती है। वह यह जमीन लोगों को घर बनाने से लेकर खेती करने तक के लिए दे दी जाती है। यह फैसला पंचायत करता है जिस पर अभी जाति के जमींदार हावी रहते हैं।

पंजाब के छह जिले गुरुदासपुर, लुधियाना, कपूरथाला, फतेहगढ़ साहिब व अमृतसर में यह जमीन सबसे ज्यादा है। इसमें से 23000 एकड़ जमीन पर दूसरे लोगों का कब्जा हो चुका है जबकि बाकी 1.57 लाख एकड़ जमीन को सालाना नीलामी के जरिए पट्टे पर दे दिया जाता है व किसान व खेती करके अपना जीवन यापन करते हैं। दलितों को 20000 रुपए एकड़ की दर से व आम जाति के लोगों को 28000 रुपए एकड़ की दर से उनसे हर साल जमीन का किराया लिया जाता है जबकि तमाम जगहों जैसे मालवा इलाके के लोग 65000 एकड़ तक किराए पर यह जमीन पट्टे पर लेने के लिए तैयार रहते हैं। इनसे जो पैसा मिलता है उसको ग्रामीण विकास व पंचायत विभाग के कर्मचारियेां को वेतन दिया जाता है।

हर साल इस नीलामी से प्राप्त होने वाली राशि को जो कि औसतन 350 करोड़ रुपए सालाना होती है। गांव में मनरेगा सरीखी योजनाएं चलाकर उसका विकास किया जाता है। कुछ परिवार इस जमीन पर अपने पशुओं के लिए चारा उगाते हैं। हाल ही में सरकार के एक फैसले ने राज्य में उसके खिलाफ आंदोलन खड़ा कर दिया है। कैप्टन अमरिंदर सिंह सरकार ने विलेज कामन लैंड (रेगुलेशन) एक्ट में संशोधन करके पंचायतों को यह जमीन औद्योगिक घरानों, व्यापारियों, निजी कंपनियों व माइक्रो स्माल व मीडियम औद्योगिक इलाका स्थापित करने वालों को इसे बेचने की छूट दे दी। इसके लिए जमीन का आवंटन नीलामी के जरिए किया जाना था। आमतौर पर अभी तक इस जमीन का इस्तेमाल कृषि कार्यो के लिए ही होता आया था। इसे लेकर राज्य में जमीन प्राप्ति संघर्ष समिति ने आकर आंदोलन छेड़ दिया।

इस संगठन में ज्यादातर दलित शामिल हैं व यह उनके हितों की रक्षा करने की बात करता है। सरकार ने एक तिहाई जमीन दलितों के लिए आरक्षित रखी है। समिति इसका विरोध कर रही है क्योंकि उसका आरोप है कि ऐसा करने पर गांव की शामलात जमीन पर व्यापारियों व उद्योगपतियों का कब्जा हो जाएगा। मालूम हो कि पिछली कांग्रेस सरकार में भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव करने की बात है। जमीन का अधिग्रहण काफी मुश्किल बनाने के साथ उसके बदले में दिए जाने वाले मुआवजे की राशि में बहुत बढ़ोतरी कर दी थी व इसके कारण व्यापारियों व उद्योगपतियों द्वारा पिछड़े इलाके में जमीन खरीदकर वहां उद्योग धंधा स्थापित करने में बाधा पैदा हो गई। सरकार द्वारा अधिग्रस्त की जाने वाली जमीन का मुआवजा भी काफी बढ़ गया व दिल्ली के पास जेवर में देश का सबसे बड़ा हवाई अड्डा बनाने के लिए जमीन का अधिग्रहण करने में सालों लग गए व आम दर की तुलना में किसानों को कहीं ज्यादा मुआवजा देना पड़ा। पूरे देश में ही इस तरह की जमीन के कारण झगड़े होते आए हैं।

दिल्ली से जुड़े हरियाणा में भी पंचायतों द्वारा शामलात की जमीन बेचे जाने के मामले प्रकाश में आए। फरीदाबाद की पहाड़ी पर काफी जमीन को लेकर विवाद पैदा हो गया था। बाद में यह मामला अदालत में गया और पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह जमीन पंचायत की थी ही नहीं। अब जमीन प्राप्ति संघर्ष समिति के लोग विधायकों व मंत्रियों के घरों का घेराव कर रहे हैं।

पंजाब के मुख्य विपक्षी दल आप है तो कांग्रेस सरकार में शामिल प्रभावशाली लोग अपने परिचित उद्योगपतियों व व्यापारियों के सस्ते दामों पर यह जमीन उपलब्ध करवाना चाहते हैं। वहां के नगर निगम इस शामलात जमीन का रिकार्ड तैयार करने में जुट गए हैं। इससे पहले दिल्ली के कुछ नेताओं ने शामलात जमीन हासिल की थी जिसे लेकर काफी विवाद पैदा हुआ व मामला सीबीआई तक के पास जांच के लिए गया। इसकी वजह यह रही कि किसानो को जमीन का अधिग्रहण दशकों से एक विवादास्पद विषय रहा। अंग्रेजों के शासनकाल में इसका सिलसिला शुरू हुआ था व रेलवे सड़क आदि बनाने के लिए नाममात्र के मुआवजे पर सरकार उनसे जमीनें ले लेती थी। राष्ट्रपति भवन के लिए रायसीना पहाड़ी पर महज चार आने गज को लेकर आज तक मुकदमा चल रहा है।

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