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पंजाबी किसान शहीदी मिजाज का!

हां, पंजाब के सिक्ख किसानों का इन शहीदी महिना है। इसी महिने सिक्खों के दसवें गुरू के दो बेटे दिल्ली दरबार के औरंगजेब से लड़ते हुए शहीद हुए थे और दो बेटे सरहिंद में दीवाल में चीने गए। इनकी मां बुर्ज में ठंड में ठिठुरते हुए शहीद हुई। चमकौर लड़ाई लड कर गुरू गोविंदसिंह लुधियाना को पास मच्छीवाड़ा पहुंचे तो उनसे किसी ने पूरे परिवार को गंवाने के बारे में पूछा तो उनका जवाब था-चार मुए तो क्या हुआ जीवत कई हजार! यानी चार बेटे खोए तो क्या हुए मेरे असंख्य अनुयायी बेटे जैसे है। जंग में अपने दो बेटों की मौत पर उन्होने कहां था- ‘तेरा तुझ को सौंपते, क्या लागे मेरा’।

ये बाते मुझे तब ध्यान आई जबकरनाला के गुरुद्वारा नानकसर सिंगड़ा के प्रमुख बाबा राम सिंह ने केंद्र सरकार के तीन कृषि कानूनों को रद्द करवाने की मांग को लेकर धरनास्थल पर कनपटी के पास गोली मारकर आत्महत्या की। अब तक कोई बीस किसान ठंड-बीमारी से मर चुके है और एक गुरुद्वारा प्रमुख ने आत्महत्या कर जान दी तो आखिर किस सकंल्प, सोच में? और इनका शहीद होना क्या बिना कुछ पाए वापिस पंजाब लौटना होगा? मुझे तो संभव नहीं लगता। अपना मानना है कि जीने की, खेती की खुद्दारी में सिक्ख किसान आंदोलन करते हुए है। ये नरेंद्र मोदी, नरेंद्रसिंह तोमर का न यह झूठ लिए हुए है कि वे कम्युनिस्टों-वामपंथियों के गुर्गे है और न लंगूर भक्तो व मीडिया का यह प्रोपेगेडा सत्य है कि ये आंदोलनकारी खालिस्तानी है या वे पाकिस्तान, चीन की साजिश का हिस्सा है।

उफ! क्या हो गया है भारत मां के गुजराती लालाओं को जो खुद्दार किसानों के पेट पर लात मार रहे है तो स्वाभिमानी सिर को कभी वामपथियों का, कभी मुसलमानों, कभी चीन की साजिश में चलता हुआ करार दे रहे है। लेकिन मेरा मानना है कि दिल्ली की सीमा पर डेरा डाले किसान सिर कटवा देंगे लेकिन सार याकि झुकेंगे नहीं। गुरूतेगबहादुर का कहा वह वाक्य हमेशा ध्यान रखें कि – सीस दीआ पर सिरड न दीआ!सिर कट जाए लेकिन अपनी खेती की अपनी आजादी को अंबानी-अड़ानी के अधीन नहीं बनाएगें।पंजाब के किसान जनवरी तो क्या महिनों दिल्ली की सीमा पर डेरा डाले रह सकते है। वे नए किसान कानूनों को खत्म करा कर या कम से एमएसपी रेट और जमीन के मालिकाना की कानून में गारंटी ले कर ही आंदोलन खत्म करेंगे। पिछले तमाम किसान आंदोलन और इस किसान आंदोलन का बुनियादी फर्क यह है कि यह पंजाब के सिक्ख किसानों की कमान में, उनसे संचालित है। बिहार, यूपी, महाराष्ट्र के नंगे पांव, चप्पल वाले पैदल किसानों, खेतीहरों का नहीं है। ये ट्रेक्टर-ट्रंक वाले किसान है।भूखे-नंगे नहीं बल्कि गुरूद्वारों में लंगर सेवा करने वाले है। इसमें वे सिक्ख किसान है जिनकी संताने दिल्ली –मुंबई मजदूरी करने नहीं बल्कि कनाडा, ब्रिटेन और योरोप, लातीनी अमेरिका तक में खेती-मजदूरी करने जाती है। जिससे भारत की 138 आबादी का सचमुच पेट भरता है।

मोदी सरकार, भाजपा और भक्त लंगूर इस आंदोलन को इन बातों से ही बदनाम करने की कोशिश में है कि इनके पीछे कनाड़ा-ब्रिटेन-विदेश के खालिस्तानी है। नहीं, ये खुद्दार, जिंदादिल उन गुरूओं के बंदे है, उन भगतसिंह को हिरो मानने वाले है जिनके बेटों ने मुसलमान हुक्मरानों की नाइंसाफी के खिलाफ अपने को दीवाल में चिनवा दिया था, फांसी का फंदा स्वीकार लिया था। जिन पर ईस्टइंडिया कंपनी भी किसानों पर जुल्म नहीं कर पाई थी जैसबंगाल-बिहार में अंग्रेजों ने नील, जूट की खेती में किया था।

इस सत्य को मानना चाहिए कि पंजाब-सिक्ख की तासीर बिहार, बंगाल, गुजरात के हिंदुओं से जुदा है। इसे समझना हो तो मोदी-शाह कभी दिल्ली के कनाटप्लेस के हनुमानमंदिर और बंगलासाहिब गुरूद्वारा जा कर देखें। मंदिर के आगे भिखारी हिंदुओं की भीड लगी होगी जबकि गुरूद्वारे के लंगर में वे खाना खाते हुए होगे और सिक्ख साफ-सफाई-सेवा करते हुए। बिहार के मंदिर और पंजाब के गुरूद्वारों का फर्क लोगों की सेवा, पुरषार्थके फर्क से है। यदि पंजाब का किसान ट्रैक्टर-ट्रंक, छह महिने के राशन की तैयारी के साथ है या आंदोलनकर्ता नाई, ब्यूटपार्लर, मोबाइल टॉयलेट, कैंप टेंट, खाने-पीने की चीजे, गीजर, जनरेटर लिए हुए है तो इसलिए नहीं कि इस फाइव स्टार आंदोलन को कही से पैसा मिल रहा है और यह गरीब किसानों का आंदोलन नहीं है। ऐसा समुदाय के सेवा-शहीदी मिजाज से है। कुप्रचार की पराकाष्ठा है जो यह पूछा जा रहा है कि बिहार का किसान 800-1000 रू क्विंटल धान बेचकर भी खुश है, वह आंदोलन नहीं कर रहा है तो पंजाब के किसान 1500-1800 की रेट लेते हुए भी क्यों आंदोलन कर है।क्योंएमएसपी रेट की अनिवार्यता चाह रहे है?मतलब सरकार चाहती है कि अपने बूते, अपनी मेहनत, अपने संघर्षों से मंडी, एमएसपी से मजबूत कर, रिकार्ड तोड फसल पैदा करने वाला पंजाब-हरियाणा का किसान भी बिहार-बंगाल के किसान जैसा बने। वह अपने को भूखा, नियतिवादी, डरपोक बना ले। अपने को वैसे ही ठगा जाने दे जैसे देश के बाकि हिस्सों में चप्पल पहने गरीब किसान अपना जीवन गुजर करते है।

आंदोलन कोठाठबाट की दलीलों से बदनाम करने की बात  का जहा है उसमें सुमदाय के मिजाज की हककीत का तथ्य है। आंदोलन में नाई या पीजा खिलाने, जुगाडु गीजर, टेंट की सेवादारों की व्यवस्थाएं व भी है तो वजह सिक्खों में सेवा भाव का संस्कार है। इस समुदाय के अमीर सिक्ख अपनी संगत के लिए काजू-बादाम के लंगर भी चलाने में समर्थ है तो लड़ने में भी समर्थ है। वे अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा हर तीर्थ पर संगत-गुरूद्वारे की सेवामें, बिना अपनी नाम पट्टी के इमारते बनवाने वाले होते है।

सो आंदोलन को कितना ही बदनाम करें अपना मानना है कि पंजाब का किसान न घबराएगा, न टस से मस होगा। वह सिर कटा देगा पर खेती करने की अपनी खुद्दारी के सार को अंबानी-अड़ानी के यहां गिरवी नहीं होने देगा। और यदि वह किसी झांसे से लौटा भी तो पंजाब में फिर वह खुन्नस पाले रखेगा जिससे हिंदू राज के आगे के पानीपतों में दस-बीस साल बाद पता नहीं क्या हो!

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

1 comment

  1. जब ये आडणी अंबानी का चौकीदार नहीं सुनेगा तो फिर खालिस्तान की मांग जोर पकड़ेगी ही परिणाम चाहे अभी नहीं हो निकट भविष्य में लेकिन नींव तो भरी जा रही है मैं किसानों को खालिस्तान का समर्थक नहीं बता रहा लेकिन जब उनकी नहीं सुनी जाएगी तब बरसों से दबी चिंगारी में आग तो लगेगी ही ऊपर गुरुद्वारे का गेट जो खुला है पाकिस्तान वाले का आग में घी डालने के लिए

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