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Monday, April 19, 2021
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चीन की बौखलाहट और क्वाड का भविष्य

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हाल में क्वाड देशों- भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के बीच सुरक्षा संवाद हुआ। वर्चुअल कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से संपन्न इस अनौपचारिक स्वरूपी सम्मेलन का महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि पहली बार चारों देशों के राष्ट्रप्रमुखों ने बैठक की। यूं तो बैठक में स्वतंत्र, मुक्त और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र, महामारी कोविड-19 रोधी टीकाकरण, जलवायु परिवर्तन, समुद्री सुरक्षा और उभरती प्रौद्योगिकियों जैसे विषय पर बात हुई, जिसमें चीन का किसी भी सदस्य देश ने एक बार भी नाम नहीं लिया गया। फिर भी चीन भड़क गया।

चीनी विदेश मंत्रालय के अनुसार, “हमें उम्मीद है कि संबंधित देश इस बात को ध्यान में रखेंगे कि क्षेत्रीय देशों के समान हितों में खुलेपन, समावेशीकरण और लाभकारी सहयोग के सिद्धांतों को बरकरार रखा जाए। ऐसी नीतियों पर बल दिया जाए, जो विरोधाभासी होने के बजाय क्षेत्रीय शांति, स्थिरता और समृद्धि के लिए हितकर हो।” इससे पहले चीन क्वाड समूह को “मिनी नाटो” अर्थात् सैन्य गठबंधन तक कह चुका है। क्वाड समूह, जो अभी तक अपने अनौपचारिक स्वरूप में है- आखिर उससे चीन इतना असहज क्यों है?

अनौपचारिक चतुर्भुज सुरक्षा संवाद पर चीन की बौखलाहट का कारण क्वाड का चीनी अधिनायकवाद विरोधी दृष्टिकोण है। यह सही है कि नवंबर 2020 में क्वाड देशों ने अरब सागर में नौसेना अभ्यास में भाग लिया था, किंतु यह कोई सैन्य गठबंधन नहीं है। वास्तव में, इस समूह की मूल अवधारणा में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बहुपक्षीय व्यापार और वाणिज्य की स्वतंत्रता को सुनिश्चित कराना है। साथ ही चीन के एक-पक्षीय और कुटिल साम्राज्यवादी राजनीति को ध्वस्त करके क्षेत्र में अन्य शक्तियों को समरुप और अधिक विकल्प देना है। इस चतुष्कोणीय समूह को बनाने का विचार वर्ष 2007 में जापान द्वारा तब प्रस्तावित हुआ था, जब चीन ने दक्षिण चीन सागर, जोकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है- उसके जलमार्ग पर उग्र रूप से अपना दावा जताना तेज कर दिया था। चीन पूरे दक्षिण चीन सागर पर अपनी सम्प्रभुता का दावा करता है। किंतु वियतनाम, मलेशिया, फिलीपींस, ब्रुनेई और ताइवान भी इसपर अपना अधिकार जताते हैं। वर्तमान समय में भारत (138 करोड़), अमेरिका (33 करोड़), जापान (12.6 करोड़) और ऑस्ट्रेलिया (2.5 करोड़) की कुल आबादी लगभग 186 करोड़ है। अर्थात् वैश्विक मानव संसाधन का लगभग 24 प्रतिशत भाग इन देशों में पाया जाता है। भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र होने के साथ सामरिक रूप से चौथा सबसे ताकतवर देश और उभरती हुई आर्थिक महाशक्ति भी है। वह समस्त विश्व को “वसुधैव कुटुम्बकम्” रूपी वैदिक मूल्यों से देखता है। वही अमेरिका सबसे ताकतवर लोकतंत्र के साथ आर्थिक और आधुनिक हथियारों से लैस देशों की सूची में अग्रणी है। इसी प्रकार ऑस्ट्रेलिया की गणना संपन्न देशों में होती है, तो समृद्ध जापान की कार्यकुशलता और तकनीक का बोलबाला विश्वभर में है।

इस पृष्ठभूमि में चीन एक हिंसायुक्त साम्यवाद की वैचारिक नींव पर खड़ा कुटिल साम्राज्यवादी राष्ट्र है, जिसकी कुल आबादी विश्व में सर्वाधिक 144 करोड़ है। यह स्वयं को एक देश के बजाय दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यता मानता है और अपनी इसी धुन के कारण उसका कई अधिक देशों के साथ विवाद (भू-जल-व्यापार सहित) है। जहां चीन का भारत के साथ विगत छह दशकों से सीमा विवाद में उलझा हुआ है, वही अमेरिका के साथ उसका व्यापार-युद्ध शेष विश्व के लिए खतरा बना हुआ है। पूर्वी चीन सागर में दावे को लेकर चीन और जापान के बीच विवाद, तो द्वीपों पर अधिकार को लेकर झगड़ा है। ऑस्ट्रेलिया के साथ चीन की कूटनीतिक लड़ाई है। ऐसे में इन चारों देशों के एक साथ आने से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की साम्राज्यवादी नीतियों को कड़ी चुनौती मिल रही है।सच तो यह है कि मानवाधिकार-रहित राजनीतिक और वैचारिक अधिष्ठान, विकृत पूंजीवादी अर्थव्यवस्था के साथ ब्रांडेड उत्पादों की नकल बनाने में निपुणता के बल पर चीन एक बड़ी आर्थिक-सामरिक शक्ति बना हुआ है। घोषित तौर पर जिन तत्वों से वैश्विक शांति और मानवता को सबसे अधिक खतरा है- उन्हे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रुप से चीन का समर्थन और आशीर्वाद प्राप्त है। परमाणु संपन्न और इस्लामी आतंकवाद के केंद्रों में से एक पाकिस्तान और साम्यवादी देश उत्तर कोरिया से चीन की निकटता इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

क्वाड विरोधी चीनी बौखलाहट के तीन अन्य कारण भी है। पहला- वैश्विक महामारी कोविड-19 से उत्पन्न स्थिति और संक्रमण के प्रसार में चीन की “अस्पष्ट” भूमिका। कोरोनावायरस का डंक विश्व को जब से (नवंबर-दिसबंर 2019) लगा है, तब से इसके उद्गम-स्थान और बीमारी से संबंधित जानकारी छिपाने को लेकर चीन पर कई प्रकार के आरोप लगे है। इसी संदर्भ में चीन ने अपनी कलंकित छवि को सुधारने हेतु कोविड-19 वैक्‍सीन को 112 देशों में भेजकर सहानुभूति लेने का प्रयास किया था। किंतु वे इसमें असफल रहा। इसके उलट, भारत अब तक पाकिस्तान, बांग्लादेश सहित 70 से अधिक देशों में 586 लाख से अधिक स्वदेशी वैक्सीन (निशुल्क सहित) भेज चुका है और कई देश पंक्ति में खड़े है। क्वाड समूह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में वैक्सीन के उत्पादन-वितरण में सहयोग करने पर सहमत हुए हैं, जिसमें भारत की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। स्वाभाविक है कि चीन इससे असहज होगा।

दूसरा- भारत और चीन सैन्य टकराव। एशियाई भूभाग में भारत ही एक ऐसा देश है, जो शक्ति और आकार के बल पर चीनी साम्राज्यवाद को टक्कर दे सकता है। यही कटु सच्चाई चीन को स्वीकार नहीं। वह चाहता है कि भारत भी अन्य एशियाई देशों की भांति उसके वर्चस्व (वन बेल्ट वन रोड परियोजना सहित) को स्वीकार करें। किंतु भारत ने 2017 के डोकलाम और फिर 2020 के पूर्वी लद्दाख स्थित गलवान प्रकरण में मिली कूटनीतिक विजय प्राप्त करके चीन को यह संदेश दे दिया है कि भारतीय नेतृत्व 1962 की निर्बल राजनीतिक छत्रछाया से वह बाहर निकल चुका है और अपनी एकता, अखंडता, सीमा-सुरक्षा और आत्मसम्मान की रक्षा हेतु किसी भी हद तक जाने को कटिबद्ध है। ऐसे में क्वाड समूह में भारत की सक्रियता देखकर चीन की कुंठा और बढ़ गई है। इसका प्रमाण चीनी सरकार के मुखपत्र “ग्लोबल टाइम्‍स” के संपादक का एक ट्वीट भी है, जिसमें वे लिखते हैं, “क्वाड का तंत्र भारत को एक इंच भी चीनी क्षेत्र पर कब्‍जा करने में मदद नहीं करेगा…।”

तीसरा- अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन का चीन विरोधी रूख। जनवरी 2020 से बिडेन प्रशासन की अबतक जो नीतियां सार्वजनिक हुई है, उससे स्पष्ट है कि वह ट्रंप शासनकाल की भांति चीन के सामने हिंद-प्रशांत महासागर के अतिरिक्त आर्थिक नीति, व्यापार-युद्ध, जलवायु परिवर्तन, हॉन्गकॉन्ग, ताइवान जैसे मुद्दे उठाकर उसके घाव पर नमक छिड़कता रहेगा।

वास्तव में, अमेरिका-चीन टकराव विशुद्ध व्यापारिक हित और विश्व में अपना प्रभुत्व बरकरार रखने से संबंधित है। ऐसे में क्वाड का भविष्य क्या होगा, यह काफी हद तक अमेरिकी नीतियों पर निर्भर करेगा, जिसका इतिहास विरोधाभास और स्वार्थ से भरा हुआ है। वर्ष 1981-89 में रोनाल्ड रीगन, ताइवान-समर्थित और चीन-विरोधी राजनीति करते हुए दो बार अमेरिकी राष्ट्रपति बने थे। किंतु उन्होंने “वन-चाइना” नीति, जिसमें चीन ताइवान को अपने देश का हिस्सा मानता है- उसे न केवल स्वीकार किया, साथ ही उसके साथ हथियारों का सौदा भी किया। इसी तरह जुलाई 2020 को चीन से कटु संबंध होने के बाद भी अमेरिका ने चीन को 17.6 लाख टन से अधिक मकई का निर्यात किया, जोकि तीन दशकों की सबसे बड़ी बिक्री थी। ऐसे में भारत को अमेरिका के संदेहास्पद आचरण से सचेत रहने की आवश्यकता है।

आने वाले समय में भारत सहित अन्य देशों से चीन के संबंध कितने सुधरेंगे- इसका उत्तर चीन के कुटिल अधिनायकवादी चरित्र और आचरण में निहित है। यह स्थापित सत्य है कि जिन छल-कपट के बल पर साम्यवादी चीन विश्व-विजेता बनने का सपना देख रहा है, लगभग वैसा ही चिंतन त्रेता युग में लंका नरेश रावण, द्वार-युग में दुर्योधन और 20 शताब्दी में क्रूर तानाशाह अडोल्फ हिटलर का भी रहा था। रावण, दुर्योधन और हिटलर को उनके कुकर्मों की वांछित सजा मिल गई थी। यदि चीन नहीं सुधरा, तो आगामी वर्षों में उसका भी संभवत: ऐसा ही हश्र देखनों को मिल सकता है।

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