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Wednesday, May 12, 2021
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अदालत के कंधे पर आस्था का भार!

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अजीत द्विवेदीhttp://www.nayaindia.com
पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

अयोध्या में राम जन्मभूमि मंदिर का आंदोलन जब चरम पर था तब भाजपा के सर्वोच्च नेता लालकृष्ण आडवाणी और विश्व हिंदू परिषद के प्रमुख अशोक सिंघल कहा करते थे कि यह आस्था का मामला है, इसमें अदालत की कोई भूमिका नहीं है। कभी न कभी यह बात भाजपा की मौजूदा पीढ़ी के नेताओं ने भी कही होगी क्योंकि यह सूत्र वाक्य था। समय के साथ सूत्र वाक्य बदलता गया। केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद अचानक भाजपा नेताओं ने कहना शुरू कर दिया कि अदालत का फैसला सबको मानना चाहिए। आस्था के मामले में अदालत की भूमिका स्वीकार करने और अदालत के सम्मान का जो भाव हाल के दिनों में भाजपा नेताओं के अंदर जाग्रत हुआ वह अद्भुत है। अब तो ऐसी स्थिति हो गई है कि भाजपा आस्था के हर सवाल का निपटारा अदालत से ही करना चाहती है।

तभी धर्मस्थल विशेष प्रावधान कानून 1991 का मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा हुआ है। भाजपा के नेता और पूर्व प्रवक्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय ने इस कानून को चुनौती देने वाली याचिका दायर की है। यह महज संयोग नहीं है कि एक तरफ सुप्रीम कोर्ट में उस कानून को चुनौती दी गई, जिस कानून के जरिए देश के सारे धर्मस्थलों की 1947 वाली स्थिति बहाल रखने का प्रावधान किया गया है और दूसरी तरफ इस कानून के प्रभाव में होने के बावजूद बनारस की एक जिला अदालत ने काशी की ज्ञानवापी मस्जिद का पुरातात्विक सर्वेक्षण विभाग से जांच कराने का आदेश दे दिया! कुछ दिन पहले मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि के पास से मस्जिद हटाने का मामला भी अदालत में पहुंचा था। हालांकि अदालत ने इस पर सुनवाई नहीं की। पर इसका यह मतलब नहीं है कि वह मामला खत्म हो गया है। अगर धर्मस्थल विशेष प्रावधान कानून 1991 के मामले में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होती है या काशी में ज्ञानवापी मस्जिद का एएसआई के जरिए सर्वेक्षण होता है तो देर-सबेर मथुरा का मामला भी अदालत में पहुंचेगा। यह भी संयोग है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस से जुड़े आपराधिक मामलों में लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी आदि नेताओं को क्लीन चिट देने वाले जज को उत्तर प्रदेश सरकार ने लोकायुक्त बना दिया है।

ध्यान रहे जब अयोध्या का आंदोलन चल रहा था तो भाजपा और विश्व हिंदू परिषद का नारा था- अयोध्या तो झांकी है, मथुरा-काशी बाकी है। हालांकि तब लालकृष्ण आडवाणी ने कहा था कि अगर मुस्लिम बाबरी मस्जिद के विवादित ढांचे पर अपना दावा छोड़ देते हैं तो भाजपा मथुरा-काशी पर दावा छोड़ देगी। पर आडवाणी और उनकी कही बातें भी बीती हुई बात हो गई। अब अयोध्या में राम मंदिर बन रहा है और उसके साथ ही मथुरा और काशी का विवाद अदालत में पहुंचा गया है। आने वाले दिनों में दूसरे अनेक मंदिरों का मामला निकल सकता है। ताजमहल को तेजोमहालया बताने वाले भी अदालत में पहुंचेंगे। जानकार बताते हैं कि राष्ट्रपति भवन, जो पहले वायसराय के रहने के लिए बनाया गया था वहां भी कोई बड़ा हिंदू मंदिर था। लेकिन उस मंदिर की मुक्ति का आंदोलन चलाने की जरूरत नहीं है क्योंकि उसका राजनीतिक लाभ नहीं मिलेगा।

अब सवाल है कि सुप्रीम कोर्ट में धर्मस्थल विशेष प्रावधान कानून 1991 पर सुनवाई में भाजपा और केंद्र सरकार का क्या रुख होगा? क्या भाजपा की केंद्र सरकार इस कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई होने देगी और अदालत के जरिए इसे बदलने का रास्ता साफ करेगी? पिछले सात साल के अनुभव से अंदाजा लग रहा है कि इस मामले में भी सरकार अदालत के कंधे पर रख कर ही बंदूक चलाएगी। जैसे अयोध्या मामले में हुआ। भाजपा के नेता हमेशा इस पक्ष में थे कि संसद में कानून लाकर मंदिर का रास्ता साफ किया जाए। लेकिन नरेंद्र मोदी के पूर्ण बहुमत से सरकार बनाने और कई विवादित विधेयकों को संसद से जोर-जबरदस्ती पास कराने के बावजूद एक बार नहीं कहा गया कि सरकार संसद में कानून बना कर मंदिर बनवाए। यह काम सुप्रीम कोर्ट के फैसले से हुआ। इसी तरह केरल के सबरीमाला मंदिर में सुप्रीम कोर्ट ने हर उम्र की महिलाओं के मंदिर में जाने की अनुमति देने का फैसला सुनाया तो भाजपा नेताओं ने इसका वरोध किया। केंद्रीय गृह मंत्री ने सीधे सुप्रीम कोर्ट को चुनौती दी। लेकिन इसके बावजूद सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने वाला कानून संसद में नहीं लाया गया। सुप्रीम कोर्ट में ही फैसले पर पुनर्विचार हो रहा है और ज्यादा संभावना इस बात की है कि पुराना फैसला पलट जाए और आस्था की जीत हो!

बहरहाल, धर्मस्थल विशेष प्रावधान कानून 1991 पीवी नरसिंह राव की सरकार ने बनाया था। यह कानून 18 सितंबर 1991 से देश में लागू है। इसके तहत यह प्रावधान किया गया कि अयोध्या की बाबरी मस्जिद को छोड़ कर देश के बाकी धर्मस्थलों की जो स्थिति 1947 में थी उसे बहाल रखा जाएगा। इस कानून के प्रभावी रहने का मतलब है कि कोई भी किसी दूसरे धर्म के पूजास्थल पर दावा नहीं कर पाएगा। सभी धर्मों के बीच सद्भाव बनाए रखने के लिहाज से इस कानून को बेहद अहम माना जाता है। तभी नवंबर 2019 में पांच जजों की बेंच ने इस फैसले की प्रासंगिकता को स्वीकार किया था। पर पिछले दिनों चीफ जस्टिस एसए बोबडे और जस्टिस एएस बोपन्ना की बेंच ने इस कानून की संवैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय गृह, कानून और संस्कृति मंत्रालय को नोटिस दिया है। हैरानी की बात है कि ज्यादा बड़ी बेंच द्वारा इस कानून को स्वीकार किए जाने के बावजूद दो जजों की बेंच ने इस पर सुनवाई की और नोटिस जारी किया।

सवाल है कि केंद्र की भाजपा के नेतृत्व वाली प्रचंड बहुमत की सरकार इस तरह के मसलों से संसदीय या राजनीतिक तरीके से क्यों नहीं निपट रही है? संसद में बने कानून को बदलने के लिए सरकार दूसरा कानून बना सकती है। आखिर नरसिंह राव की लूली-लंगड़ी सरकार ने, जिसके पास बहुमत नहीं था, उसने धर्मस्थल कानून पास किया था। फिर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली प्रचंड बहुमत की सरकार इस कानून को क्यों नहीं बदल सकती है? सरकार के पास लोकसभा में प्रचंड बहुमत है और राज्यसभा में बहुमत नहीं होने के बावजूद उसने तमाम किस्म के विवादित विधेयक पास कराए हैं। नरसिंह राव सरकार की एक प्रतिबद्धता थी, जिसके तहत उसने धर्मस्थल कानून पास कराया था। अगर भाजपा की मौजूदा सरकार हिंदू हितों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता की बात करती है तो उसे अदालतों के कंधे पर रख कर बंदूक चलाने की बजाय आगे बढ़ कर जिम्मेदारी लेते हुए काम करना चाहिए।

कह सकते हैं कि इसमें क्या बुराई है जो आस्था के सवाल अदालतों के जरिए सुलझाए जा रहे हैं? बुराई यह है कि प्रॉक्सी के जरिए भाजपा आस्था के जो मुद्दे अदालतों में ले जा रही है और उन पर जिस तरह के फैसले आ रहे हैं, उनसे अदालतों की साख और उनके फैसलों पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसा लग रहा है कि भाजपा और विश्व हिंदू परिषद का एजेंडा पूरा करने के लिए अदालतों का इस्तेमाल हो रहा है। आस्था से जुड़े मामलों के अलावा कृषि कानूनों सहित कई विवादित राजनीतिक मसलों को भी प्रॉक्सी के जरिए उच्च अदालतों के सामने ले जाया जा रहा है और अदालतें जाने-अनजाने में राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने का माध्यम बन रही हैं। लंबे समय में यह स्थिति देश की संसदीय व्यवस्था और न्यायपालिका की साख के लिए अच्छी नहीं होगी।

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