PM Narendra Modi Government घटनाओं के आगे लाचार मोदी
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घटनाओं के आगे लाचार मोदी

75th Independence Day :

PM Narendra Modi Government यह तो नहीं कह सकते हैं कि जिस तरह से 2011 के बाद से मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी का घटनाओं पर जोर नहीं नहीं रह गया था और देश के जो हालात बन गए थे वैसे ही हालात अभी बन गए हैं। लेकिन स्थितियां उसी तरफ बढ़ रही हैं। एक के बाद एक ऐसी घटनाएं हो रही हैं, जिनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के कामकाज और उनके नेतृत्व पर सवाल उठ रहे हैं। महंगाई, आर्थिक बदहाली, बेरोजगारी, कोरोना संकट के साथ साथ अंतरराष्ट्रीय और सामरिक मोर्चे पर अफगानिस्तान से लेकर चीन तक का मसला उलझा है। राफेल से लेकर पेगासस जासूसी तक दूसरे देशों में हो रही जांच ने सरकार को अलग उलझाया है। नरेंद्र मोदी ने अपने को उस समय नसीब वाला प्रधानमंत्री कहा था कि जब कच्चे तेल के दाम कम हो रहे थे। लेकिन नसीब ने करवट ली तो कच्चे तेल के दाम भी बढ़ने लगे और कोरोना की वजह से देश पर बड़ी आर्थिक चोट अलग पड़ी। सो, अब सरकार की स्थिति ऐसी है कि वह चाह कर भी पेट्रोल-डीजल और रसोई गैस के दाम कम नहीं कर पा रही है।

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डेस्पेरेट अटेम्प्ट के तौर पर विदेश सेवा के पूर्व अधिकारी और संयुक्त राष्ट्र संघ में काम कर चुके हरदीप सिंह पुरी को पेट्रोलियम मंत्री बनाया गया है कि वे तेल उत्पादक देशों के समूह ओपेक से बात कर उन्हें उत्पादन बढ़ाने के लिए तैयार करेंगे। अगर ओपेक देश उत्पादन नहीं बढ़ाते हैं तो कीमतें किसी हाल में कम नहीं होंगी। उत्पादन बढ़ने पर भी बहुत ज्यादा कमी आने की संभावना नहीं है क्योंकि कीमत बढ़ने के और भी कारण है। एक कारण तो यह है कि पूरी दुनिया में पोस्ट कोरोना गतिविधियां बढ़ी हैं, जिससे ईंधन की खपत बढ़ी है और दूसरा कारण यह है कि भारत सरकार के पास राजस्व के स्रोत के नाम पर ईंधन ही है, जिसके ऊपर उत्पाद शुल्क दोगुने से ज्यादा बढ़ाया जा चुका है। इसी तरह मेक इन इंडिया योजना को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने विदेशी वस्तुओं के आयात पर शुल्क बढ़ाया हुआ है। सो, उत्पाद शुल्क और आयात शुल्क में बढ़ोतरी का कुल जमा नतीजा यह हुआ है कि सारी चीजें महंगी हो गई हैं। कोई भी कोशिश करके सरकार मंहगाई को कम नहीं कर पा रही है। सरकार अगर महंगाई कम करती है तो पहले से गिरती जा रही अर्थव्यवस्था और गिरेगी। और अगर इसी तरह महंगाई बढ़ती रही तो लोगों की हालत और खराब होगी।

modi amit shah

सरकार हर तरह से कोशिश करके देख चुकी लेकिन चीन सीमा से पीछे नहीं हट रहा है। उलटे उसके सैनिक नए इलाकों में भारतीय सीमा में घुस कर टेंट लगा कर बैठे हैं। पिछले दिनों खबर आई थी कि चीन के सैनिकों ने डेमचॉक इलाके में भारतीय सीमा में घुस कर टेंट लगा लिया है और कहने के बावजूद पीछे नहीं हट रहे हैं। इस बीच चीन के राष्ट्रपति शी जिनफिंग ने तिब्बत का दौरा किया और अरुणाचल प्रदेश की सीमा तक आए। अफगानिस्तान का मामला भारत के हाथ से निकल गया है। भारत ने कंधार और मजार ए शरीफ से अपने राजनयिकों और सुरक्षाकर्मियों को वापस बुला लिया है। पाकिस्तान की तरह अफगानिस्तान का भी चीन की कॉलोनी बनना महज वक्त की बात है। उसके बाद पाकिस्तान के भारत विरोधी छद्म युद्ध को कितनी ताकत मिलेगी इसका अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है।

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पूर्वोत्तर में देश के राज्यों के बीच ही जंग छिड़ी है। गृहमंत्री पूर्वोत्तर का दौरा करके लौटे उसके अगले ही दिन असम और मेघालय के आम लोगों और सुरक्षाकर्मियों के बीच हिंसक झड़प हुई, जिसमें असम के पांच पुलिसकर्मी मारे गए और एक आम नागरिक की भी जान गई। दोनों राज्यों के बीच झगड़ा इतना बढ़ गया है कि असम ने अपने नागरिकों को मिजेरम नहीं जाने की सलाह दी है तो मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कहा है कि सीमा पर अब भी मिजोरम के सुरक्षाकर्मी तैनात हैं। यह पहली बार है, जब अपने ही देश के दो राज्यों के बीच सीमा विवाद इस हद तक पहुंचा है कि सरकार के केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ी है। असम और मिजोरम की सीमा पर अभी सीआरपीएफ के जवान तैनात किए गए हैं। इस विवाद के बाद चिंता यह है कि पूर्वोत्तर के बाकी राज्यों के सीमा विवाद भी भड़क सकता है।

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इजराइली सॉफ्टवेयर पेगासस से जासूसी के विवाद को संभालना भी सरकार के हाथ में नहीं है। मूकदर्शक बने रहने के सिवा वह कुछ और नहीं कर सकती है। यह विवाद दुनिया के 17 मीडिया समूहों ने प्रकाशित किया है और पेरिस की संस्था फॉरबिडेन स्टोरीज और एमनेस्टी इंरनेशनल ने दुनिया के 50 हजार फोन की जासूसी किए जाने का खुलासा किया है। इसमें भारत के तीन सौ लोगों के एक हजार फोन शामिल हैं। जिनकी जासूसी हुई उसमें राहुल गांधी सहित कई विपक्षी नेता, केंद्रीय मंत्री, सुप्रीम कोर्ट के जज, केंद्र सरकार के अधिकारी, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं। इस पर अंतरराष्ट्रीय हल्ला है। अमेरिका ने इसकी आलोचना की है तो इजराइल और फ्रांस ने जांच शुरू करा दी है। भारत में भी पश्चिम बंगाल सरकार ने इसकी जांच के लिए न्यायिक आयोग बनाया है तो समूचा विपक्ष एकजुट होकर इस मसले पर दो हफ्ते से संसद नहीं चलने दे रहा है। उधर फ्रांस में राफेल सौदे में किसी भारतीय बिचौलिए को पैसे देने और ऑफसेट कांट्रेक्ट देने में पक्षपात किए जाने के आरोपों की जांच शुरू हो गई है। इसमें होने वाला कोई भी खुलासा सरकार के लिए भारी पड़ सकता है। पेगासस और राफेल मामले में भारत सरकार चर्चा कराए न कराया, जांच कराए न कराए पर दुनिया के दूसरे देशों में हो रही जांच की आंच भारत सरकार तक जरूर पहुंचेगी।

देश के किसान पिछले आठ महीने से आंदोलन कर रहे हैं। केंद्र सरकार के बनाए तीनों कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमा के पास किसान आंदोलन पर बैठे हैं और सुप्रीम कोर्ट ने इन कानूनों के अमल पर रोक लगा दी है। कानून पर अमल भी नहीं हो रहा है और किसान भी संतुष्ट नहीं हैं। सरकार चुपचाप बैठ कर यह उम्मीद कर रही है कि किसान थक कर चले जाएंगे। लेकिन ऐसा होता नहीं दिख रहा है। संसद सत्र के दौरान किसान दिल्ली के जंतर-मंतर पर आकर भी किसान संसद लगा रहे हैं। और अंत में कोरोना का प्रबंधन है, जिसमें सरकार बुरी तरह से फेल हुई है। यह घटनाक्रम भी सरकार के हाथों से निकला हुआ है। कुछ राज्य सरकारें जरूर किसी तरह से कोरोना संक्रमितों की संख्या दबा-छिपा रहे हैं लेकिन कभी भी भारत में कोरोना बम फिर फूट सकता है। पिछले तीन दिन से देश में 44 हजार के करीब केसेज आ रहे हैं। और तमाम प्रयासों के बावजूद वैक्सीनेशन की रफ्तार नहीं बढ़ रही है। देश से लेकर दुनिया तक, आर्थिकी से लेकर स्वास्थ्य तक और किसानी से लेकर रोजगार तक कोई क्षेत्र ऐसा नहीं है, जहां सरकार मुश्किल में फंसी है और उसका कोई जोर नहीं चल रहा है।

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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