राहुल न बनें मोदी जैसे जिद्दी!

जैसे नरेंद्र मोदी को कोई नहीं समझा सकता वैसे राहुल गांधी को समझा सकना भी मुश्किल है। तभी सोनिया गांधी, प्रियंका वाड्रा या कोई भी एक्सवाई कांग्रेस नेता और शरद पवार आदि राहुल गांधी को यह समझाने में असमर्थ हैं कि बिना राजनीति के, बिना कार्यकर्ताओं के, बिना नए-पुराने नेताओं के साझे के पूरे भारत में कांग्रेस वापिस जिंदा नहीं हो सकती है जबकि कांग्रेस का जिंदा होना भारत की जरूरत है। राहुल गांधी अकेले चाहे जो करें, कितनी ही मेहनत करें बिना कांग्रेसियों के एक्टिव हुए पार्टी जिंदा नहीं हो सकती है। बिहार, उत्तरप्रदेश आदि में एलायंस नहीं बन सकता है तो जनता को यह सहारा भी नहीं मिलेगा कि उनके परिवार में जब महामारी का कोई शिकार हुआ तो प्रशासन-सरकार की कमियों को उजागर करने वाले, उनके लिए रोने वाले कुछ लोग थे। विपक्ष संवेदना के साथ खड़ा था। राजनीति कर रहा था।

कांग्रेस हाईकमान याकि सोनिया, राहुल, प्रियंका, डॉ. मनमोहनसिंह, अहमद पटेल, एंटनी, चिदंबरम आदि की बेसिक समस्या यह है कि इन्होंने शायद ही कभी खुल कर विचार किया हो कि बतौर विपक्ष उन्हें कैसे राजनीति करनी चाहिए?राहुल गांधी ने कमान संभाली हुई है लेकिन उन्होंने न अपनी युवा टीम को इम्पॉवर करके संघर्ष का जिम्मा दिया हुआ है और न पुराने नेताओं से कहा है कि देश यदि आज आपात स्थिति में है तो पार्टी के प्रदेश मुख्यालयों में जा कर सरकार की असफलताओं को पकड़, उन पर जनता का ध्यान दिलवाओ!

सचमुच एकतरफा खबरों और नैरेटिव के बावजूद दिल्ली और प्रदेशों में हर दिन ऐसी खबरें आती हैं जो लोगों की संवेदनाओं को झिंझोड़ने वाली होती है। मिसाल के तौर पर दिल्ली में कांग्रेस के नेता अजय माकन ने हल्की सी मेहनत कर दिल्ली के तीनों एमसीडी क्षेत्र से आंकड़े निकाल कर प्रेस कांफ्रेस की। बताया कि केजरीवाल सरकार और एमसीडी की मौत के आंकड़े में इतना फर्क है। मीडिया ने इसे ज्यादा कवर नहीं किया लेकिन दिल्ली के लोग धीरे-धीरे जान गए कि मौत के आंकड़े कैसे छुपाए जा रहे हैं।

बतौर विपक्ष यदि कांग्रेस अपने प्रदेश संगठन, जिला संगठनों से महामारी के वक्त में, टेस्ट-मेडिकल बंदोबस्त, बीमारी, मौत, मुर्दाघर, श्मशान और संवेदना का ख्याल बनवाए रखे तब भी जनता के दिल में जगह बनेगी। इसके लिए जरूरी है कि हर वह पुराना नेता एक्टिव हो जो जनता के बीच राजनीति करने में अनुभवी हो। यदि राहुल गांधी को नए युवा चेहरों, एनएसयूआई, यूथ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं पर ही भरोसा है तो उन्हें ही टारगेट दें कि हर प्रदेश, हर शहर में बतौर राजनीतिक संगठन वे जनसंपर्क करके दिखाएं!

पर कांग्रेस आज पूरी तरह राहुल गांधी पर आश्रित है और राहुल गांधी को कोई समझाने की स्थिति में नहीं है कि पार्टी का राजनीतिक संगठन, उसके सभी नेता जब तक सक्रिय नहीं होंगे तब तक पार्टी जिंदा नहीं हो पाएगी। नरेंद्र मोदी, अमित शाह, भाजपा महामारी और हर तरह की बरबादी के बीच भी चुनाव की तैयारी में है, वर्चुअल रैलियां कर रहे हैं, जबकि राहुल गांधी को न बिहार की सुध है और न उत्तरप्रदेश की। बिहार में बिना एलायंस व चेहरे के बिना प्रोजेक्शन के कैसे चुनाव लड़ा जा सकता है या उत्तरप्रदेश में लगातार सपा, बसपा और कांग्रेस अलग-अलग दिशा में रहे तो विधानसभा चुनाव के वक्त होगा क्या?

जाहिर है कांग्रेस में सोनिया गांधी और बाकि नेता घर में बैठे हुए सोच रहे हैं कि राहुल गांधी हैं। वे सब कर लेंगे। उधर राहुल गांधी का मानना है कि उनका सरकार के खिलाफ बोलना ही बहुत है। यह फालतू की आत्मघाती एप्रोच है। मोदी के पहले कार्यकाल और इस कार्यकाल का फर्क यह है कि अब से 2024 तक भारत में लोग बीमारी, मौत, भूख और बेरोजगारी में परेशान रहेंगे। ऐसे वक्त में कांग्रेसी नेताओं को ब्लॉक स्तर पर खड़े रहना चाहिए। कांग्रेस को बतौर राजनीतिक दल और संगठन के लोगों को बीमारी के वक्त जुबानी जमाखर्च से ही सही उनके साथ खड़ा दिखना चाहिए। सो, जरूरी है कि राहुल गांधी संगठन को सक्रिय करें। पर राहुल गांधी को कौन समझाए? और राहुल गांधी नहीं समझे तो न विपक्ष का समझना है और न विपक्ष का खड़ा हो सकना है। तभी भारत का अंधकार काल हर तरह का अंधकार लिए हुए होगा।

One thought on “राहुल न बनें मोदी जैसे जिद्दी!

  1. बिल्कुल सही लिखा है आपने,सर गजब लिखते हैं आप,वाकई में देश में मजबूत विपक्ष होना बहुत जरुरी है,मजबूत विपक्ष ना होने का खा मियाजा ही आज देश को भुगताना पड़ रहा है। आज जो माहौल है उसमें अकेले राहुल गांधी या फिर कैसी एक,दो नेताओं का एक्टिव होना ही जरुरी नही बल्कि पूरी टीम को एक्टिव होना पड़ेगा

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