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और कोई रास्ता नहीं

ByNI Editorial,
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विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी बात को जनता के बीच ले जाने की है। इसका रास्ता जनता के बीच जाकर और वहीं से राजनीति को शक्ल देने की कोशिश के जरिए ही निकल सकता है।

कांग्रेस ने अगर इस संदेश को आत्मसात कर लिया है कि अब जनता के बीच जाने और वहीं से अपनी राजनीति को नई शक्ल देने के अलावा कोई रास्ता नहीं है, तो कहा जा सकता है कि यहां से एक नई शुरुआत हो सकती है। हालांकि ऐसी ही समझ के साथ राहुल गांधी ने पिछले साल भारत जोड़ो यात्रा शुरू की थी। उस प्रयोग का कुल अनुभव सकारात्मक रहा। बल्कि कई लोगों की तो समझ है कि राहुल गांधी अगर वर्तमान सत्ता के निशाने पर आए हैं, तो उसकी एक खास वजह उस यात्रा से उनका बढ़ा कद है। इस बढ़े कद के कारण उनकी बातें ज्यादा गंभीरता से सुनी जाने लगी हैँ। इसकी कीमत उन्हें अपनी सांसदी गंवाने के रूप में चुकानी पड़ी है। लेकिन विपक्ष की सियासत करने की कीमत चुकाने वाले वे अकेले नेता नहीं हैँ। इसकी सूची लंबी है। फर्क सिर्फ इतना है कि राहुल गांधी ने वर्तमान सत्ता की शक्ति के आधारों की बेहतर पहचान की है, इसलिए इनसे संघर्ष की अधिक उपयुक्त रणनीति वे सोच पाए हैँ। बाकी नेताओं का अभी तक चुनावी गठबंधनों और अन्य परंपरागत तरीकों पर भरोसा बना हुआ है।

उन्हें इस बात का अहसास नहीं है कि भारत में चुनावों में मुकाबले का धरातल अब समान नहीं रह गया है। धन-बल, एकतरफा संस्थागत झुकाव और प्रचार शक्ति के मामले में उनकी तुलना में भारतीय जनता पार्टी इतनी अधिक सशक्त हो चुकी है कि सिर्फ मतदाताओं की विद्रोही मुद्रा ही उसे हरा सकती है। लेकिन ऐसी मुद्रा गढ़ने में भी प्रचार तंत्र की ही बड़ी भूमिका होती है, इसलिए अभी तक जनता के मूड में आमूल बदलाव का भी कोई संकेत नहीं है। जाहिरा तौर पर विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी बात को जनता के बीच ले जाने और अपने मुद्दों पर मतदाताओं के बहुमत को गोलबंद करने की है। इसका रास्ता जनता के बीच जाकर और वहीं से राजनीति को शक्ल देने की कोशिश के जरिए ही निकल सकता है। कांग्रेस ने इस दिशा में पहल की है। बहरहाल, वह कितनी देर तक इस कठिन राह पर चल पाएगी, इसको लेकर अगर लोगों में संदेह है, तो उसे निराधार नहीं रहा जा सकता।

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