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राम के विमर्श में क्यों पड़े राहुल?

राहुल गांधी जमीनी, वास्तविक और लोगों के जीवन पर प्रत्यक्ष असर डालने वाले मुद्दों पर ज्यादा समय तक फोकस किए नहीं रह सकते हैं। वे बार बार विचारधारा की बहस में और धर्म के विमर्श में घुसते हैं। ऐसे हर विमर्श में उनको शिकस्त मिलती है या कम से कम उनको या कांग्रेस को कोई फायदा नहीं मिलता है। इसके बावजूद पता नहीं क्यों वे उस ग्रंथि से मुक्त होना नहीं चाहते हैं। वे बार बार उस विमर्श में घुसते हैं, जो उनके लिए और उनकी पार्टी के मौजूदा नेतृत्व के लिए भी सर्वथा अपरिचित और अनजाना सा क्षेत्र है और जिस क्षेत्र में उनकी मुख्य प्रतिद्वंद्वी पार्टी भाजपा को महारत हासिल है। भाजपा अपने को हिंदू राष्ट्रवाद के विचार पर एकाधिकार रखने वाली पार्टी बताती है और भगवान राम के नाम पर खुल कर राजनीति करती है। इसमें से कांग्रेस के असर वाला एकमात्र क्षेत्र राष्ट्रवाद है लेकिन राहुल गांधी उस पर भी ज्यादा फोकस नहीं करते हैं। इसकी बजाय वे हिंदू और राम के विमर्श में ज्यादा घुसते हैं।

याद करें कैसे पिछले साल दिसंबर में उन्होंने कांग्रेस पार्टी की ओर से राजस्थान में महंगाई के खिलाफ आयोजित एक बड़ी रैली में हिंदू और हिंदुत्ववाद की बहस छेड़ दी थी और अपने भाषण में काफी देर तक इस बारे में बोलते रहे थे। एक रिपोर्ट के मुताबिक 31 मिनट के अपने भाषण में राहुल गांधी ने 35 बार हिंदू और 26 बार हिंदुत्ववादी शब्द का प्रयोग किया। उन्होंने कहा कि वे हिंदू हैं लेकिन हिंदुत्ववादी नहीं हैं। पता नहीं वे खुद इस बात को कितना समझ पाए लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि सभा में मौजूद लोग और टेलीविजन चैनलों या सोशल मीडिया में उनका भाषण देखने वालों को कुछ खास समझ में नहीं आया। उनको महंगाई पर बोलना था लेकिन वे हिंदुत्व और हिंदुवाद पर बोले। वे सिर्फ वस्तुओं की कीमतों की सूची पढ़ देते तब भी उनका भाषण संपूर्ण माना जाता क्योंकि रैली महंगाई के विरोध में हो रही थी और देश के लोग सबसे ज्यादा त्रस्त महंगाई से हैं। वे महंगाई, बेरोजगारी और गरीबी को अपना मुख्य सरोकार मानते हैं और यह गुजरात के चुनाव में सर्वेक्षण करने वाली एजेंसियों की सर्वे रिपोर्ट में भी पता चला है। लेकिन राहुल एक ज्यादा जटिल विषय के विमर्श में उलझ गए।

इसी तरह अपनी भारत जोड़ो यात्रा में जब वे महाराष्ट्र पहुंचे तो सावरकर विमर्श में उलझ गए। राहुल अपनी सावरकर ग्रंथि से भी नहीं उबर पा रहे हैं। उन्होंने कर्नाटक में भी सावरकर पर हमला किया। लेकिन महाराष्ट्र में, जहां सावरकर एक बड़े आईकॉन हैं और लोक मानस में बैठे हैं। वहां राहुल ने एक सौ साल पुरानी चिट्ठी दिखा कर, जिसे पूरा देश पहले ही देख चुका है, कहा कि सावरकर डरपोक और कायर थे। वे अंग्रेजों के साथ मिल गए थे और उन्होंने महात्मा गांधी और पंडित नेहरू को धोखा दिया। उनकी दोनों सहयोगी पार्टियों- शिव सेना और एनसीपी ने इसका विरोध किया। वहां भी वे इस विमर्श में इसलिए घुसे थे ताकि सावरकर के दो राष्ट्र के सिद्धांत का विरोध किया जाए। सावरकर ने कहा था कि हिंदू और मुस्लिम दो राष्ट्र हैं और ये दोनों एक साथ नहीं रह सकते हैं। सो, सावरकर के अंग्रेजों से मिले होने का मुद्दा उठा कर राहुल असल में हिंदू-मुस्लिम विमर्श में ही घुसे थे। जब चारों तरफ से विरोध हुआ तो उन्होंने इसे छोड़ा और आगे की यात्रा में महंगाई, बेरोजगारी, नोटबंदी, जीएसटी आदि पर बोलते रहे।

लेकिन मध्य प्रदेश में यात्रा समाप्त होने से पहले वे फिर एक नई बहस में घुस गए। उन्होंने एक जनसभा में विस्तार से ‘हे राम’, ‘जय सियाराम’ और ‘जय श्रीराम’ का फर्क समझाया। उन्होंने कहा कि गांधी जी ‘हे राम’ कहा करते थे। पता नहीं उनको किसने बताया या इतिहास की किस किताब में ऐसा लिखा हुआ है! यह प्रचलित है कि जब नाथूराम गोडसे ने बापू को गोली मारी तो उनके मुंह से ‘हे राम’ निकला था। हालांकि कई लोग इस पर भी सवाल उठाते हैं। लेकिन अगर इसको सही माना जाए तब भी ‘हे राम’ कहना कोई आध्यात्मिक या धार्मिक अभिव्यक्ति नहीं थी। आमतौर पर हैरानी, दुख, परेशानी या आहत होने पर लोगों के मुंह से ‘हे भगवान’ या ‘हे महादेव’ निकलता है उसी तरह से उनके मुंह से ‘हे राम’ निकला होगा। क्योंकि उससे पहले कभी भी इस बात की कोई मिसाल नहीं है कि बापू अपनी बातों में, भजनों में या सभाओं में ‘हे राम’ कहा करते थे। या ‘हे राम’ कह कर किसी का अभिवादन करते थे। इसलिए ‘हे राम’ की बहस पूरी तरह से बेमानी है।

जहां तक ‘जय सियाराम’ कहने का सवाल है तो यह भी अभिवादन का प्रचलित तरीका नहीं है। मंदिरों में दीवारों पर ‘जय सियाराम’ लिखा होता है या भजनों में ‘जय सियाराम’ गाया जाता है। अभिवादन में हमेशा ‘राम राम’ कहा जाता है। दिल्ली, हरियाणा, पश्चिम उत्तर प्रदेश, राजस्थान सहित कई और इलाकों में अभिवादन का यह प्रचलित तरीका है। ‘राम राम’ कई जगह जान पहचान के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन इसे सीता विरोधी या स्त्री विरोधी नहीं कहा जा सकता है, जैसे कई लोग अभिवादन के लिए ‘राधे राधे’ कहते हैं या ‘जय श्रीकिशन’ कहते हैं तो ऐसा नहीं है कि ‘राधे राधे’ कहने वाले महान नारीवादी लोग हैं या ‘जय श्रीकिशन’ कहने वाले लोग स्त्री विरोधी हैं। ये सब लोक मानस में प्रचलित मुहावरे हैं या अभिव्यक्ति और अभिवादन के तरीके हैं। ‘जय श्रीराम’ जरूर एक राजनीतिक नारा है, जो रामानंद सागर के सीरियल से निकला और नब्बे के दशक में मंदिर आंदोलन के समय प्रचलित हुआ। लेकिन मध्य प्रदेश में यात्रा के दौरान उस पर भी सवाल उठाने का कोई संदर्भ नहीं था।

ऐसा लगता है कि राहुल गांधी अपनी यात्रा के दौरान महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी, नोटबंदी, जीएसटी, संस्थाओं के दुरुपयोग जैसे मुद्दे उठाते हैं तो उनको लगता है कि यह एक सामान्य और औसत राजनेता का काम है और उनको कोई बड़ी बौद्धिक विमर्श करना चाहिए। इसलिए वे जरूरी मुद्दों को छोड़ कर गैर जरूरी विचारधारात्मक बहस में उलझ जाते हैं। उनकी टीम में भी कोई है, जो उनको ‘हिंदू बनाम हिंदुत्ववादी’ की बहस में ले जाता है या ‘हे राम, जय सियाराम या जय श्रीराम’ की बहस में डालता है और कभी सावरकर विमर्श कराता है। जहां बहुत जरूरी न हो वहां उनको ऐसी बहस में जाने से बचना चाहिए।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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