राहुल की गौरतलब बात - Naya India
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राहुल की गौरतलब बात

हार्वर्ड केनेडी स्कूल में प्रोफेसर निकोलस बर्न्स और इस स्कूल के छात्रों के साथ कांग्रेस नेता राहुल गांधी की बातचीत इस लिहाज से अहम रही कि इसमें पहली बार राहुल गांधी ने अर्थनीति के बारे में अपनी सोच का संकेत दिया। साथ ही चीन की उभरती हैसियत और उससे पेश आ रही चुनौतियों के बारे में उनका क्या आकलन है, इसका भी एक अंदाजा उन्होंने पेश किया। चीन का मसला इसलिए अहम रहा, क्योंकि राहुल गांधी की बातों से निकोलस बर्न्स असहज नजर आए। बर्न्स पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज बुश जूनियर के दौर में विदेश उपमंत्री रह चुके हैं। इसलिए स्वाभाविक है कि वे अमेरिकी ऐस्टैबलिशमेंट के विचारों से गहराई से जुड़े हैं। लेकिन राहुल गांधी ने चीन की चुनौती का मुकाबला करने की अमेरिकी नीति से असहमति जताई। उन्होंने कहा कि चीन की असल ताकत आर्थिक और वहां बढ़ रही लोगों की माली खुशहाली से आ रही है। जबकि अमेरिका इस चुनौती का सैनिक समाधान ढूंढ रहा है। खास बात यह है कि राहुल गांधी ने यहां विनम्रता, लेकिन मजबूती से एक राजनेता की तरह अपनी बात कहते नजर आए। यह उनके व्यक्तित्व में हुए विकास और अपनी सोच को लेकर बढ़े आत्म-विश्वास का परिचायक है।

इस आत्म-विश्वास के साथ उन्होंने आर्थिक नीति पर भी अपनी राय जताई, जो आज की आम सोच से अलग है। उनसे पूछा गया कि अगर वे प्रधानमंत्री होते, तो क्या अर्थ नीति अपनाते। इस पर उन्होंने कहा कि वे विकास दर (ग्रोथ) की बजाय जॉब यानी नौकरियां पैदा करने पर ध्यान देते। इसके साथ ही उन्होंने जोड़ा कि वे सब कुछ निजी क्षेत्र के हाथ में देने की सोच से सहमत नहीं हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे क्षेत्र सार्वजनिक क्षेत्र के हाथ में ही रहने चाहिए। कुल मिलाकर उन्होंने मिश्रित अर्थव्यवस्था अपनाने का समर्थन किया। इस सिलसिले में जिक्र किया, इसी दिशा में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन भी जा रहे हैं। राहुल ने बाइडेन की तारीफ की कि उन्होंने अमेरिका की समस्या के मूल स्वरूप को समझा है। बाकी बातें उन्होंने वही दोहराईं, जो हाल में वे तीन और अमेरिकी विश्वविद्यालयों के शिक्षकों और छात्रों के साथ अपने संवाद में वे कह चुके हैँ। मसलन, यह कि देश में संस्थागत ढांचे पर सत्ता पक्ष ने पूरी तरह कब्जा कर लिया है और आज ऐसी हालत है, जहां संस्थाएं लोकतंत्र की रक्षा नहीं कर पा रही हैं।

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