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राहुल ने गंवाई 48 सीटे!

हां, राहुल गांधी ने एक झटके में महाराष्ट्र की 48 लोकसभा सीटे नरेंद्र मोदी की गोदी में डाल दी। ध्यान रहे सन् 2019 में कांग्रेस को सिर्फ एक सीट मिली थी। अब तीन दिनों में दो बार सावरकर पर बोल कर राहुल ने शिवसेना और एनसीपी दोनों को बिदका डाला है। मुझे लगता है मुंबई कांग्रेस के नेता नाना पटोले ने राहुल गांधी को यह अक्ल दी होगी कि महाराष्ट्र में ओबीसी-मुस्लिम-दलित गठजोड से कांग्रेस जिंदा होगी तो शिवसेना से वैचारिक मतभेद बतलाने के लिए राहुल यदि सावरकर को एक्सपोज करेंगे तो पार्टी का जहा स्पेस बनेगा वही आप विचाकर-सिद्धांतिक यौद्धा की इमेज पाएंगे। लेकिन कल्पना करें कि शिवसेना बिदक कर भाजपा से जुडे या शिवसेना-एनसीपी दोनों मिलकर कांग्रेस को अकेले छोड़ दे तो 2024 के चुनाव में महाराष्ट्र में कांग्रेस की क्या वही स्थिति नहीं होगी जो दिल्ली, यूपी, बिहार या बंगाल में हो गई है।

संदेह नहीं जैसे बाकि नेताओं के साथ होता है वैसा राहुल गांधी के साथ भी हो रहा है। यात्रा की भीड से वे भी अपने को जनप्रिय, महान और विचारवान नेता समझने लगे है। जनता की तकलीफ, सीबीआई-ईडी जैसी एजेंसियों, नफरत आदि के मकसद छोड अपनी खास-अलग इमेज में उन्होने अपने को कांग्रेस का राजऋषि बनने के ख्याल पाल लिया है। तभी भटक रहे है। मतलब मोदी-संघ परिवार के गुरू सावरकर को एक्सपोज करों तो अपने आप गांधी -नेहरू की विचारधारा देश में वापिस खिलेगी और कांग्रेस के सुनहरे दिन लौटेगे।

इस तरह की नेताओं में गलतफहमियां हुआ करती है। चंद्रशेखर भी अपनी यात्रा से ऐसी गलतफहमी बना बैठे थे। मैंने तब उनके हवाई ख्यालों पर भी लिखा था। तमाम हल्ले, भारत यात्रा केंद्रों, चिरकुटों की बड़ी-बड़ी बातों के अंत में तब मेरा ही लबोलुआब मतलब चिरकूट यात्रा का सत्य बना।  लोगों भीड और भक्ति अच्छे-अच्छे समझदार नेताओं में मुगालता बनवा देती है। यह वीपीसिंह, चंद्रशेखर, लालू यादव, वाजपेयी से ले कर अब नरेंद्र मोदी के साथ होता हुआ है तो राहुल गांधी के साथ भला न हो ऐसा कैसे संभव है?

बुनियादी बात महाराष्ट्र, गुजरात में उनकी यात्रा से कांग्रेस को बहुत भारी नुकसान होना है। राहुल गांधी को जो भी समझा रहा है, ज्ञान दे रहा है वह एक ही बात करता होगा कि कैसे अच्छे-पुराने दिन लौटे! इसमें अकेला सूत्र है कि गांधी और नेहरू के समय में हिंदू जैसे सोचते थे वैसे ही वापिस सोचे। मतलब हिंदू राजनीति खत्म हो और सेकुलर राजनीति लौटे!

सोचे, ऐसा मोदी-शाह और आरएसएस तथा उसके भारी संसाधनों, नेटवर्क, भक्तों के रहते क्या संभव है? कतई नही। अपना मानना है कि वह हिंदू सोच चुनाव में तब थोड़ी-बहुत कम हो सकती है जब अरविंद केजरीवाल वाली राजनीति हो। महंगाई, बेरोजगारी, बदहाली तथा रेविडियों के फार्मूल पर जनता को रिझाए, अपना  विकल्प बताए तो मोदी के भक्त वोट विकल्प देखते हुए होंगे नहीं तो भाजपा ही अच्छी। इस सच्चाई को केजरीवाल ने न केवल समझा है बल्कि शातिरता से अपना हिंदू विकल्प बना डाला है। केजरीवाल ने भी शुरूआत में विचारधारा, वैचारिकता, धर्मनिरपेक्षता में बहुत पेंतरे चले। लेकिन अंत में उन्होने जान लिया कि हिंदू बनकर राजनीति करेंगे, विकल्प बनाएंगे तो गुजरात की प्रयोगशाला में भी हल्ला बना लेंगे।

तभी हैरानी की बात है कि हिंदू राजनीति के इस नए प्रत्यक्ष प्रमाण के बावजूद राहुल गांधी और उनके सलाहकार  गांधी-नेहरू की राजनीति लौटा लाने की गलतफहमी में है! या ओबीसी, दलित, मुस्लिम वोटो के फार्मूले सोचते हुए! क्या सन् 2024 का चुनाव कांग्रेस ऐसे फार्मूलों या सावरकर को मुद्दा बनाकर लडेगी?

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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