विपक्षी सरकारों की गर्दन पर तलवार

सरकार हो तो डबल इंजन की हो वरना न हो! यह उस पार्टी और सरकार का मूलमंत्र बन गया है, जिसके नेताओं ने विपक्ष में रहते और सत्ता में आने के बाद भी सहकारी संघवाद का सबसे ज्यादा मंत्र जाप किया है। जिस नेता ने विपक्ष में रहते हुए केंद्र के हर कदम, हर फैसले को इस कसौटी पर कसा कि यह भारत के संघीय ढांचे के अनुरूप है या नहीं और जिसने खुद देश की कमान संभालने के बाद सहकारी संघवाद का सबसे ज्यादा बार जिक्र किया उसी के शासन में देश का संघीय ढांचा अपनी आखिरी सांसें गिनता दिख रहा है।

जिस पार्टी ने सबसे लंबा समय विपक्ष में बिताया है और जिस पार्टी के ऐसे नेता हुए, जिनका कद विपक्ष में रहते हुई भी सत्ता पक्ष के नेताओं से बड़ा हुआ और जिन्हें प्रधानमंत्रियों से भी ज्यादा सम्मान मिला उस पार्टी की अब चाह है कि देश में कोई विपक्ष न हो, न कोई विपक्षी सरकार हो, जहां हो वहां डबल इंजन की सरकार हो!

हालांकि ऐसा नहीं है कि डबल इंजन की सरकारें जादू कर रही हैं। जिस राज्य में भी डबल इंजन की सरकार पांच साल चली वहां एकाध अपवादों को छोड़ कर लोगों ने या तो सरकार पलट दी या उसके प्रति स्पष्ट नाराजगी जता दी। यह बात कोरोना वायरस की लड़ाई में भी साफ दिख रही है। डबल इंजन की राज्य सरकारों ने सब गुड़ गोबर किया हुआ है। जहां सिंगल इंजन की सरकार है वहां कोरोना से लड़ाई ज्यादा प्रभावी तरीके से लड़ी जा रही है और डबल इंजन वाली राज्य सरकारों ने कोरोना के सामने लोगों को उनके हाल पर छोड़ा है। गुजरात से लेकर उत्तर प्रदेश और बिहार से लेकर कर्नाटक तक और गोवा से लेकर पूर्वोत्तर के राज्यों तक में इसे बहुत स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

फिर भी भाजपा की जिद है कि वह हर राज्य में डबल इंजन की सरकार बनाएगी, चाहे पार्टी चुनाव में जीती हो या नहीं। इसके लिए भाजपा ने कोई 12 साल पहले 2008 में कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा के ईजाद किए ऑपरेशन लोट्स के फार्मूले को और इंप्रोवाइज किया है। कर्नाटक में 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को पूर्ण बहुमत नहीं आया था पर उसकी सरकार बन गई थी। इसके बाद येदियुरप्पा ने कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों से इस्तीफे करा कर उनको अपनी पार्टी की टिकट से चुनाव लड़ाया और अपनी सरकार का बहुमत बनाया। दूसरी बार भी उनकी सरकार इसी फार्मूले से बनी है।

कर्नाटक में तो भाजपा ने जीतने और सरकार बनाने के बाद यह फार्मूला अपनाया था पर अब हारे हुए राज्यों में भी वह इस फार्मूले से सरकार बना रही है। इसी फार्मूले से भाजपा ने मध्य प्रदेश में अपनी सरकार बनाई है। ऐसा नहीं है कि भाजपा ने राज्यों में डबल इंजन की सरकार बनाने के लिए सिर्फ इसी फार्मूले का इस्तेमाल किया है। उसने आजाद भारत के इतिहास में ईजाद हुए दूसरे तमाम फार्मूले भी आजमाए। जैसे एक फार्मूला भजनलाल का था, जिन्होंने अस्सी के दशक में पूरी पार्टी का विलय कांग्रेस में करा दिया और मुख्यमंत्री बने रहे थे। इस फार्मूले से भाजपा ने अरुणाचल प्रदेश में सरकार बनाई थी, जब पेमा खांडू ने पूरी पार्टी का विलय भाजपा में कर दिया। गठबंधन बदल के फार्मूले से भाजपा ने बिहार में डबल इंजन की सरकार बनाई है। दूसरी पार्टी के विधायकों को तोड़ कर अपनी सरकार बनाने का फार्मूला भाजपा ने मणिपुर में और गोवा में आजमाया। ऑपरेशन लोट्स वाले फार्मूले पर अब राजस्थान में सरकार बनाने का प्रयास होता दिख रहा है।

शायद भाजपा के नेता मान रहे हैं कि जब तक केंद्र से लेकर हर राज्य में भाजपा की अपनी सरकार नहीं बनेगी तब तक देश का विकास संभव नहीं है और न भारत को विश्व गुरू बनाया जा सकता है। इसलिए सारे काम छोड़ कर, भाजपा विपक्षी सरकारों को अस्थिर करने और अपनी सरकार बनाने के काम में लगी है। ध्यान रहे इस समय देश कोरोना वायरस से त्रस्त है और आर्थिकी का संकट इतिहास के किसी भी समय के मुकाबले ज्यादा गहरा है, पर इसकी चिंता से ज्यादा ध्यान राजनीतिक ताकत बढ़ाने पर है। भाजपा ने यह काम इतने खुलेआम तरीके से किया है कि सारे विपक्षी मुख्यमंत्री डरे हुए हैं। उन्हें कामकाज से ज्यादा चिंता इस बात की हो गई है कि अपने विधायकों को बचा कर कैसे रखें। इस चिंता में वे अपने विधायकों और मंत्रियों को मनमानी करने दे रहे हैं।

सोचें, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र, सबसे बड़ी फंक्शनल डेमोक्रेसी, जिसे सबसे जीवंत लोकतंत्र भी कहा जाता था, आज किस मुकाम पर है? आज कोई अपनी सरकार बचाने के लिए विधायकों को एक रिसॉर्ट में ले जाता है तो दूसरा उसकी सरकार गिराने के लिए विधायकों को होटलों और रिसॉर्ट में बंद कर रहा है। राजस्थान का मामला आया तो एक नेता ने विधायकों को बकरा मंडी में खड़ा बताया तो दूसरे नेता ने घोड़ों के अस्तबल का मुहावरा इस्तेमाल किया। भाजपा के एक नेता ने कहा कि जहां हरियाली होगी वहीं तो घोड़े जाएंगे! इसका मतलब है कि हरियाली भाजपा में है और वहां सबको खुलेआम दौड़ लगाने और हरी घास चरने की सुविधा भी होगी। लेकिन प्रधानमंत्री ने तो कहा था कि वे न खाएंगे, न खाने देंगे! बहरहाल, भाजपा ने एक तरह से जनता के वोट का मतलब ही खत्म कर दिया है। जनता अपने वोट से जिसे चाहे जिताए, अंत में वह भाजपा में चला जाएगा और सरकार भाजपा की बन जाएगी। इसका नतीजा यह है कि विपक्षी सरकारों ने मंत्रियों व विधायकों को खुश रखने को प्राथमिकता दी है क्योंकि उन्हें पता है कि वे खुश नहीं रखेंगे तो भाजपा उनको खुश कर देगी। और विधायकों, मंत्रियों को किस तरह से खुश रखा जाता है, यह सबको पता है।

बहरहाल, आज स्थिति यह है कि जिस राज्य में भी विपक्षी पार्टी की सरकार है वह चिंता में है। उसकी गर्दन पर तलवार लटक रही है। मुख्यमंत्री कामकाज करने की बजाय विधायकों को खुश रखने के प्रयास में हैं। विधायक अपने अपने नेतृत्व को यह डर दिखाने की स्थिति में हैं कि वे भाजपा में चले जाएंगे। वहां उन्हें मंत्री बना दिए जाएंगे और मंत्री नहीं बनाए गए तब भी किसी बोर्ड या निगम की अध्यक्षता मिल जाएगी। सांसदी भी मिल सकती है। सिद्धरमैया, कुमारस्वामी और कमलनाथ से लेकर अशोक गहलोत तक ने कहा है कि विधायकों को भारी भरकम नकदी भी ऑफर की गई। फिर एक बड़ा फायदा यह भी है कि भाजपा में जाते ही उनके सारे पिछले पाप धुल जाते हैं और वे हर तरह की जांच से सुरक्षित हो जाते हैं। इतने सारे स्पष्ट प्रलोभनों के बावजूद अगर कुछ लोग आज भी विपक्ष की राजनीति कर रहे हैं तो उन्हें सैल्यूट करना तो बनता है।

 

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