nayaindia rajiv gandhi assassination case राजीव की हत्या और उम्रकैदियों की रिहाई
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राजीव की हत्या और उम्रकैदियों की रिहाई

सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी रूप से राजीव गांधी की हत्या को आतंकवादी कार्रवाई नहीं माना। इस मामले में सरकार की ओर से मुकदमा लड़ने वाले वकील अदालत को यह समझाने में कामयाब नहीं रहे कि लिट्टे द्वारा राजीव गांधी की हत्या उस समय आतंकवादी घटनाओं से निपटने के लिए बनाए गए टाडा कानून के तहत एक आतंकवादी कार्रवाई थी।

पूर्व प्रधानमंत्री दिवंगत राजीव गांधी की हत्या में शामिल सात लोगों की उम्रकैद की सजा माफ कर दिए जाने पर पूरे देश में जोर शोर से चर्चा हो रही है। उन्हें देश की सर्वोच्च अदालत सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया है। ध्यान रहे कि इसी सुप्रीम कोर्ट ने 1999 में सर्वसम्मति से इन लोगों को राजीव गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार ठहराया था। इस फैसले को लेकर मैंने तमाम अखबारों में कानून के विशेषज्ञों की राय पढ़ी है।

कानून विशेषज्ञों को इलेक्ट्रानिक चैनलों पर चर्चा करते हुए सुना है। सब कुछ पढ़ने व समझने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि इस फैसले की वजह एक अहम तकनीकी कारण हैं। कारण यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने तकनीकी रूप से राजीव गांधी की हत्या को आतंकवादी कार्रवाई नहीं माना। इस मामले में सरकार की ओर से मुकदमा लड़ने वाले वकील अदालत को यह समझाने में कामयाब नहीं रहे कि लिट्टे द्वारा राजीव गांधी की हत्या उस समय आतंकवादी घटनाओं से निपटने के लिए बनाए गए टाडा कानून के तहत एक आतंकवादी कार्रवाई थी।

बम विस्फोट के कारण न सिर्फ राजीव गांधी मारे गए थे उनके साथ उनकी सुरक्षा में तैनात नौ पुलिसकर्मियों की भी बम विस्फोट में मौत हो गई थी। अदालत कितने तकनीकी आधार पर काम करती है, इन सात लोगों की रिहाई इसका जीता जागता उदाहरण है। मालूम हो कि आतंकवादी गतिविधियों में मई 1991 में बम विस्फोट के जरिए राजीव गांधी के शरीर के चीथड़े उड़ा दिए गए थे। इस तरह से देश में यह पहली बार सुसाइड बम की मदद से किसी को मारा गया था। बाद में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंतसिंह की भी हत्या करने में ऐसे ही बम का उपयोग किया गया था।

पहली बार 1998 में सुप्रीम कोर्ट के समय यह मामला पहली बार सुनवाई के लिए आया था। उस समय इसकी सुनवाई कर रहे विशेष ‘टाडा’ कोर्ट ने इसमें शामिल सभी 26 अपराधियों को मौत की सजा सुनाई थी। सभी अभियुक्तों ने अपनी मौत की सजा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। अदालत ने दोनों पक्षों को सुना। इसके बाद तीन सदस्यीय खंडपीठ इस हत्याकांड में शामिल 20 लोगों की भूमिका व सजा के बारे में अलग अलग राय जताई।

जस्टिस थॉमस ने इन 26 अभियुक्तों में से सिर्फ 7 को ही मौत की सजा के लिए जिम्मेदार माना व बाकी लोगों को रिहा कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ संथान, मुरुगन, नलिनी, पेरारिवलन, रॉबर्ट पायस को ही मौत की सजा दी जबकि जयकुमार व रविचंद्रन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई वहीं जस्टिस डीपी वधवा ने सिर्फ चार लोगों नलिनी, संथान, मुरुगन व पेरारिवलन को ही मौत के लिए जिम्मेदार मानते हुए उन्हें मौत की सजा दी बाकी सभी लोगों को छोड़ दिया गया। जबकि खंडपीठ में शामिल तीसरे न्यायाधीश एसएस एम कादरी पहले जज की तरह ही कुछ लोगों को मौत की सजा बनाए रखी तथा बाकी लोगों को रिहा करने का फैसला किया व बाकी दो न्यायाधीश इस राय से सहमत थे कि नलिनी को मौत की सजा दी जानी चाहिए। सभी न्यायाधीश ने राजीव गांधी की हत्या को भारतीय दंड सहिता 302 व षडयंत्र (120वी) की तरह किया गया जघन्य कृत्य माना पर वहीं उनका मानना था कि टाटा कानून की अन्य धाराएं इन पर लागू नहीं होती।

टाटा कानून की सेक्शन 3 (1) कहती है कि जो कोई भी सरकार का तख्ता पलटने के लिए या समाज में लोगों के बीच सदभाव बिगाड़ने के लिए कोई आतंकवादी काम करेगा उसके लिए ऐसी साम्रगी का इस्तेमाल करेगा जिसके विस्फोट के कारण लोगों की मौत अथवा संपत्ति को नुकसान पहुंचता है तो उसे आतंकवादी कार्रवाई माना जाएगा। अदालत ने इसके उद्देश्य को बहुत अहमियत देते हुए कहा कि ‘अभियोजन पक्ष की दलील है कि इस हत्या का उद्देश्य सरकार को भारत-श्रीलंका समझौते को लागू होने से रोकना था।

अभियोजन पक्ष ने कहा कि राजीव गांधी चुनाव जीतने पर यह समझौता लागू करवाते। अभियोजन पक्ष ने इससे यह मान लिया कि राजीव गांधी की हत्या करके भारत श्रीलंका समझौते को लागू करना भारत सरकार का तख्ता पलटना है। अदालत ने लिट्टे प्रमुख प्रभाकरण के एक भाषण का हवाला देते हुए कहा कि प्रभाकरण राजीव गांधी के खिलाफ जरुर थे मगर वे भारत सरकार के खिलाफ नहीं थे और उन्होंने सरकार का तख्ता पलटने के लिए कुछ नहीं किया। वे देश के पूर्व नेतृत्व के खिलाफ थे जो कि लिट्टे द्वारा लड़ी जाने वाली स्वतंत्रता की लड़ाई के खिलाफ थे। इसके लिए उन्होंने लिट्टे के मुखपत्र वाइस आॅफ टाइगर्स का हवाला दिया।

यह सब देखकर हमें इस बात पर विश्वास नहीं होता है कि षड़यंत्रकारी कोर्ट में ऐसा काम कर रहे थे जिसे भारत सरकार का तख्ता पलटने वाला समझा जा सके न ही उनके बम विस्फोट में 18 लोगों का मारा जाना व लोगों में आतंकवाद का डर फैलानेवाली कोई कार्रवाई। यह बात अलग है कि पेंरबदूर की घटना के बाद देश में कुछ स्थानों पर जरुर तोड़फोड़ हुई पर इस बात का कोई प्रमाण नहीं मिला कि कोई साजिशकर्ता राजीव गांधी के अलावा इस हमले में किसी और को भी मारना चाहता था।

अदालत का यह भी कहना था कि राजीव गांधी किसी संवैधानिक पद पर नहीं थे और न ही उन्होंने संविधान के तहत ऐसी शपथ ले रखी थी जिससे उनकी हत्या को सरकार का तख्ता पलटना माना जाए। इस बम कांड में नौ पुलिस अधिकारियों के मारे जाने के बारे में अदालत का मानना था कि अभियोजन पक्ष कहीं भी यह साबित नहीं कर सका कि इस कांड में शामिल लोग राजीव गांधी के अलावा किसी और की भी हत्या करना चाहते थे। राजीव गांधी पर संविधान के तहत देश की सार्वभौमिकता व एकता अखंडता की रक्षा करने की जिम्मेदारी भी नहीं थी। इन लोगों पर कहीं भी सरकार के तख्ता पलटने का आरोप तक नहीं लगाया गया है। न्यायाधीश कादरी के साथ न्यायाधीश वाधवा की भी यही राय थी।

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