उफ! रैनबैक्सी की तीसरी पीढ़ी

दिल्ली प्रेस की नौकरी करते हुए मैंने जिदंगी को बहुत करीब से देखा और चीजों को सीखा। हमारी पत्रिकाओं के युवा संपादक परेशनाथ तमाम मुद्दों पर अपनी बेबाक राय दिया करते थे जो कि उनके अपनी जिदंगी के अनुभवों पर आधारित होती थी। एक बार जब किसी औद्योगिक परिवार के अंदर विवाद खड़ा हो जाने की खबर आई तो हमारी साप्ताहिक बैठक में परेशनाथ ने कहा कि देखना अब जरूर तीसरी पीढ़ी धंधा संभालने लगी होगी।

उनका कहना होता था कि पहली पीढ़ी संघर्ष करके संपत्ति बनाती है दूसरी पीढ़ी पिता के संघर्ष को देखते हुए उसे बनाए रखने या उसमें कुछ और जोड़ने की कोशिश करती है जबकि सुख व वैभव में पली तीसरी पीढ़ी धंधा संभालते ही मनमानी करने लगती है और सब कुछ बरबाद करके ही दम लेती है। असल में जब पिछले दिनों अविभाजित भारत के रावलपिंडी में जन्में भाई मोहन सिंह के पिता भाई ज्ञानचंद हिंदू व मां सुंदर दाई सिख थी। उन्होंने दोनों विश्व युद्धों के दौरान सड़क निर्माण के साथ-साथ अंग्रेजों से लंबे ठेके लिए और मोटा पैसा कमाया। देश के बंटवारे के बाद वे रावलपिंडी छोड़कर भारत आकर बस गए।

उन्होंने यहां आ कर सूद पर पैसा देने का काम शुरू कर दिया। उनके चचेरे भाईयो रंजीत सिंह व गुरबख्श सिंह ने अपने दोनों के नाम जोड़कर रैनबैक्सी नामक कंपनी बनाई थी। वे जापानी दवा कंपनी ए शिरोगी के भारतीय वितरक थे। यह कंपनी विटामिन व टीबी के ईलाज की दवाएं बनाती थी। रैनबैक्सी अपनी इस कंपनी का उधार चुकाने में नाकाम रही तो भाई मोहन सिंह ने 1 अगस्त 1952 को मात्र 25 लाख रुपए में रैनबैक्सी कंपनी को खरीद लिया।

उन्होंने दवा के धंधे में इटली की लपेटिट स्पा नामक कंपनी से संपर्क साधा व बाद में उसे ही खरीद लिया। 1960 के दशक में उन्होंने काफी पैसा कमाया। तब तक देश में पेटेंट कानून लागू नहीं हुआ था व पूर्वी यूरोप के देश अंतर्राष्ट्रीय कानूनो को ज्यादा अहमियत नहीं देते थे। उन्होंने इस स्थिति का फायदा उठाते हुए नींद लाने वाली गोली कांपोज का इन देशों में निर्माण करवाना शुरू कर दिया जोकि जानी-मानी रोश कंपनी द्वारा तैयार की जाने वाली वेलियम दवा का जेनरिक रूप थी।

रोश कंपनी ने इसे भारत में पेटेंट नहीं करवाया था। उन्होंने इसके निर्माण से काफी पैसा कमाया। जब भारत में 1970 के दशक में पेटेंट व्यवस्था लागू हुई तो मोहन सिंह ने महसूस किया कि वह रिवर्स इंजीनियरिंग के जरिए दुनिया की कोई भी दवा भारत में बना सकते थे। उन्होंने इसके लिए मोहाली में खोज व अनुसंधान प्रयोगशाला शुरू की और रोसीलिन, सिफ्रान सरीखी दवाओं का जमकर उत्पादन किया। वे अपने तीन बेटों में से सबसे बड़े परविंदर सिंह को बहुत ज्यादा चाहते थे। उन्होंने उसे पढ़ने के लिए विदेश भेजा और 1972 में उसे कंपनी का प्रबंध निदेशक बनाया।

यहां से दो पीढि़यों का संघर्ष शुरू हुआ। परविंदर सिंह विदेश में पढ़े थे व उदारवाद के युग में चाहते थे कि व्यवसायिक व्यक्ति ही कंपनी का कामकाज देखें। जबकि उनके पिता कंट्रोल लाइसेंस के युग के थे व सरकार के संरक्षण का फायदा उठाते आए थे। वे चाहते थे कि कंपनी पर परिवार का ही नियंत्रण रहे। उन्होंने अपने सबसे छोटे बेटे अनलजीत सिंह के लिए मैक्स इंडिया कंपनी बनाई।

इस कंपनी को बनाने व हावी करने के मुद्दे पर बाप-बेटे में तनाव इतना बढ़ा कि 1999 में बोर्डरूप मीटिंग में पिता को पूरी तरह से हटाकर कंपनी को अपने हाथ में ले लिया। इससे भाई मोहन सिंह बुरी तरह से टूट गए। उन्होंने खुद को पूरी तरह से धंधे से अलग कर लिया। 27 मई 2006 को उनका स्वर्गवास हो गया। भाई मोहन सिंह कांग्रेस के काफी करीब थे व एनडीएमसी के उपाध्याक्ष रह चुके थे। बाबा खड़क सिंह मार्ग पर क्नाट प्लेस के निकट बनी भाई मोहन सिंह प्लेस बिल्डिंग उनके नाम पर ही है।

परविंदर सिंह ने अपनी कंपनी के काम को काफी फैलाया व अमेरिका की जानी-मानी कंपनी इली लिली के जरिए दुनिया भर में अपनी दवाएं बेची। महज 55 साल की उम्र में 1999 में उनकी कैंसर से मौत हो गई। उनके बाद उनका बेटा मालिंवदर सिंह कंपनी का सीईओ बना। जिसने 2010 में इस पद से इस्तीफा देकर कंपनी के अपने 35 फीसदी हिस्से समेत रैनबैक्सी को दाइची सैंक्यो कंपनी को बेच दिया। पहले बेटे ने बाप को अलग किया फिर दोनों भाई शिविंदर व मालिंवदर एक दूसरे के खिलाफ हो गए। मालविंदर का कहना था कि उसके भाई शिविंदर व उनके धार्मिक गुरू का चुना लगा रहे हैं।

इन दोनों के फोर्टिस हैल्थकेयर नाम से व देश की दूसरी सबसे बड़ी अस्पतालों की श्रृंखला शुरू की व रेलीगेयर नाम से वित्तीय सेवाएं देने वाली कंपनी शुरू की। उन पर जापानी दाइची सैंक्यो कंपनी ने धोखाधड़ी करने का मुकदमा चला। सिंगापुर स्थित ट्रिब्यूनल ने दोनों भाईयो को 3500 करोड़ रुपए चुकाने का आदेश दिया। दाइची का आरोप था कि इन दोनों ने उनसे गंभीर जानकारी छुपाई थी।

उन्हें दिल्ली पुलिस ने रेलीगेयर फिवेस्ट कंपनी को जानबूझकर 2397 करोड़ का चूना लगाने के आरोप में गिरफ्तार कर लिया है। उन्होंने ऐसी कंपनियों को कर्ज दिए जिनके पास पैसे वापस करने के लिए थे ही नहीं। उसे दाइची कंपनी के 3500 करोड़ रुपए चुकाने है जबकि अमेरिका में भी उसके खिलाफ मामले चल रहे हैं। यह दोनों भाई अपनी कंपनी के अफसरों समेत गिरफ्तार हो चुके हैं और कभी शाही जिदंगी बिताने वाले जेल की सलाखों के पीछे दिन बिता रहे हैं। आखिरकार पैसा कमाने की भी एक सीमा होनी चाहिए।

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