रेसिपः भारत की नासमझी या चीन से डर?

अपने डा वेदप्रताप वैदिक विदेशी मामलों के ज्ञानी है। पिछले सप्ताह उन्होने चीन, जापान, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और द. कोरिया सहित दस आसियान देशों की नई साझा बाजार संधि (क्षेत्रीय विशाल आर्थिक भागीदारी-रिसेप) को चीन की चौधराहट में बांधा और भारत के अलग रहने का समर्थन किया तो लगा मौजूदा हालातों में भारत के पास विकल्प ही क्या है! चीन से पंगा है, उसके साथ व्यापारिक असंतुलन है और चीनी सामान का बहिष्कार करके आत्म निर्भर बनने का प्रधानमंत्री का जुमला है तो क्यों ‘क्षेत्रीय विशाल आर्थिक भागीदारी’ (रिसेप) संगठन का हिस्सा बन कर उससे भी हम चीन का बाजार बने। फिर अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप इसके समर्थक नहीं है तो उनकी हां में हां मिलाते हुए अपने प्रधानमंत्री ने भी अलग रहने का फैसला किया है तो ठिक ही है। लेकिन यह भारत की भारी गलती है।

समझा जाए इस बात को वैश्विक व्यापार के बहुपक्षीय, भूमंडलीकृत व्यापार व्यवस्था कुछ सालों से गडबडाई है। राष्ट्रवादी ऊफान ने डोनाल्ड़ ट्रंप, बॉरिस जानसन, पुतिन, नरेंद्र मोदी आदि की अमेरिका पहले, ब्रिटेन पहले, इंडिया पहले, ब्राजिल पहले की जो राजनीति हुई तो सर्वत्र समझा गया कि भूमंडलीकरण का वक्त गया और आगे व्यापार दो देशों के द्विपक्षीय समझौतों में ढलेंगे। ब्रिटेन ने योरोपीय संघ छोडा तो वह अब अलग-अलग देशों से द्विपक्षीय व्यापारी व्यवस्था बनाएगा। लेकिन दक्षिण-पूर्व एसिया के देशों ने उलटा किया। इन्होने रिसेप बनाया।

सोचे जब दुनिया, दक्षिण कोरिया, जापान, आस्ट्रेलिया, विएतनाम जैसे देश चीन से चिढ़े हुए है तब इन्होने वह साझा बाजार क्यों बनाया जिसमें चीन का व्यापारिक दबदबा बनता है? यही हमारा झूठ में जीना है। चीन आर्थिक महाबली है इसलिए हम सोचे रहते है कि वह जहां होगा वहां उसका दबदबा रहेगा और भारत की नहीं चल पाएगी। इस भय, इस आंशका का भला क्या जवाब हो सकता है? क्यों यह नहीं सोचते कि विएतनाम, कंपूचिया, लाओस, थाईलैंड, सिंगापुर जैसे देशों ने चीन की दादागिरी की चिंता नहीं की बल्कि उलटे उन्होने माना कि वे साझा खुले बाजार से चीन में अपना सामान बचेगें और चीन को नानी याद कराएं या न कराएं, उससे फायदा जरूर उठाएगें। हां, जाने यह तथ्य कि कोविड़-19 के बाद चीन छोड़ कर भागने वाली, निवेश करने वाली कंपनियां विएतनाम और आसियान देशों की और है। विएतनाम में काफी कंपनियां शिफ्ट हुई है।

क्यों? इसलिए कि इन देशों में काम करना आसान है, चीन से सस्ता लेबर है तो आसियान के मुक्त व्यापार क्षेत्र से बाजार भी बड़ा है। इसी परिपेक्ष्य में रिसेप संधि पर सोचे और दुनिया के इस नए सबसे बड़े बाजार की विशालता-फायदे पर विचार करें। यह बाजार योरोपीय संघ से बढ़ा खुला बाजार होगा। इसमें दुनिया का 30 प्रतिशत व्यापार होगा। आसियान के दस देशों सहित चीन, जापान, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और द. कोरिया का माल-ताल एक-दूसरे के यहां मुक्त रुप से बेचा और खरीदा जाएगा। उस पर कस्टम या अन्य रोक-टोक नहीं लगेगी। यह बाजार वैश्विक अर्थव्यवस्था का क़रीब एक-तिहाई व्यापार लिए हुए है। जाहिर है ‘द रीजनल कॉम्प्रीहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप’ यानी रिसेप बाजार यूरोपीय संघ और अमेरिका-मैक्सिको-कनाडा व्यापार समझौते में बने साझा बाजार का बाप होगा।

कोई माने या न माने यह छोटे आसियान देशों की बड़ी समझ से हुई व्यापारिक संधि है। इससे अगले दस-बीस सालों में दक्षिण-पूर्व एसिया के छोटे-छोटे (सिंगापुर, विएतनाम, कंपूचिया, म्यंमार, फिलीपीन) देश दुनिया के विकास-व्यापार का हब बने हुए होंगे जिसमे जापान-आस्ट्रेलिया-चीन सभी का निवेश होगा। यह सोचना गलत नहीं होगा कि संभव है जो आज चीन दुनिया की जैसी फैक्ट्री है वह दस-बीस साल बाद विएतनाम से ले कर फीलीपीन के भूभाग में शिफ्ट हो?

तभी आश्चर्य है कि आसियान देशों के नेताओं में ऐसी दूरदृष्टि कैसे बनी? संधि पर दस्तखत के बाद वियतनाम के प्रधानमंत्री न्यून-शुअन-फ़ूक ने इसे ‘भविष्य की नींव’ बतलाते हुए जो कहा है वह काबिले तारीफ है। उनके अनुसार यह गर्व की बात है, यह बहुत बड़ा क़दम है जो आसियान देश इसमें केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं।

भला आसियान देशों ने क्यों ऐसा किया? इसलिए कि ये देश निर्माण, मैन्यूफैक्चरिंग में, वैश्विक व्यापार में अपनी साख-धाक, अपना ढ़ाचा बना चुके है। इन्होने समझा हुआ है कि उनके पास जमीन, लेबर और बाजार की पूंजी है तो निर्माण क्षेत्र, कृषि पैदावार का और विस्तार किया जा सकता है। जब रिसेप बन चुका होगा तब इस इलाके का निर्माण-उद्योग 30 प्रतिशत वैश्विक होगा। इस बात को इस तरह समझे कि बांग्लादेश अचानक अपनी सस्ती-मेहनती श्रमशक्ति से रेडिमेड कपड़ों का निर्माता देश बना। दुनिया का वह निर्यातक देश हुआ तो यदि वह कल रिसेप का सदस्य बने तो उसे यह फायदा होगा कि चीन, जापान व दुनिया की बड़ी कंपनियां वहां आ कर फेक्ट्रीयां लगाएगी। दो कारण से। एक चीन को भी वहां रेडिमड कपड़े बनवाना सस्ता पड़ेगा तो दूसरी बात साझा बाजार का हिस्सा होने से अमेरिकी रेडिमेड कंपनी भी बांग्लादेश में कपड़े बनवा दुनिया के सबसे बड़े खुले-साझा बाजार की एप्रोच लिए हुए होगी।

चीन बहुत विकसित हो गया है वहां छोटे-छोटे सामान की मैन्यफेक्चरिंग महंगी हो गई है, राजनैतिक कारणों से जापान, द. कोरिया, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, योरोप की कंपनियां अपने कारखाने शिफ्ट कर रही है या करना चाहेगी तो सबके लिए रिसेप देशों याकि विएतनाम में निवेश करना सहज होगा या नहीं? चीन खुद भी चाहेगा कि जिस संधि के साझा बाजार में है वहीं उसकी कंपनियां, फैक्ट्रीयां शिफ्ट है और वहां की सस्ती-मेहनती लेबर से प्राडक्ट बना बाकि दुनिया को निर्यात करें।

सो सर्वाधिक फायदे में कौन? गरीब आसियान देश! ऐसा होना और उससे अलग होना भारत के भविष्य का भारी नुकसान है। कैसे?  सीधी बात है भारत को यदि आत्मनिर्भर बनना है, चीन से खरीददारी घटानी है तो वह देश में विदेशी कंपनियों को बुलाकर फैक्ट्रीया लगवाएं।  यह काम देशी अंबानी-अडानी नहीं कर सकते? क्रोनी पूंजीपति देश खा सकते है, देश बना नहीं सकते और न ही दुनिया में, चीन में, आसियान देशों या अमेरिका-योरोप में प्रतिस्पर्धी बन भारत निर्मित सामान बेच सकते है। भारत के इन देशी क्रोनी पूंजीपतियों ने अपने मुनाफे, एकाधिकार की प्रवृति में सरकारी बाबूओं, नेताओं से ऐसे कानून-व्यवस्थाएं बनवा रखे है जिससे दुनिया की आंखों में भारत वह देश है जहां बिजनेश हतोत्साहन मतलब इंडिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार कितनी ही बातें कर ले भारत बिजनेश लायक न था, न है और न भविष्य में हो सकेगा।

हां, हम अंदरूनी सोच-समझ में ऐसे जकड़े है कि रिसेप का दीर्घकालीन फायदा भी नहीं बूझ पाए। तभी वाणिज्य मंत्रालय इन चिंताओं में फंसा रहा कि रिसेप का हिस्सा बने तो आस्ट्रेलिया के डेयरी सामान, आसियान देशों से वाहनों व चीनी सामान की भारत में बाढ़ आ जाएगी। क्या चीनी सामान की पहले से ही बाढ़ नहीं है?  क्या जापान, आस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, विएतनाम जैसे घोर चीन विरोधी देशों के साथ मिल कर रिसेप में भारत अपनी दादागिरी नहीं बना सकता था? चीन की दादागिरी का रिसेप के भीतर क्या प्रतिरोध नहीं हो सकता?

क्या कहें! हकीकत यह है कि दुनिया के अलग-अलग क्षेत्र अपने रिजनल खुले बाजार बना फल-फूल रहे है। वक्त की चुनौतियों के आगे साझा और साझा बाजार बने है लेकिन भारत निपट अकेला है। क्या आपको मालूम है कि इधर पूर्व-दक्षिण पूर्व एसिया के पंद्रह देशों ने रिसेप नाम का साझा बाजार बनाया तो एक जनवरी से अफ्रिका के तीस देश मतलब मिस्र से दक्षिण अफ्रीका का पूरा महाद्वीप मुक्त साझा बाजार बन रहा है। उधर अरब देश दुनिया को हैरान करते हुए इजराइल से आर्थिक साझा खाद्य आपूर्ति नेटवर्क का रास्ता बना रहे है। योरोपीय संघ का साझा बाजार कोविड़-19 महामारी का साझे संसाधनों से मुकाबला कर रहा है तो अमेरिका-मेक्सिको-कनाडा की संधि डोनाल्ड ट्रंप की तमाम सनकों के बावजूद आर्थिक महाशक्ति का सुपर साझा बाजार है।

जाहिर है भूमंडलीकरण खत्म नहीं है बल्कि वह नए रूप में खिल रहा है। क्षेत्रिय साझा बाजारों का लगातार विस्तार भूमंडलीकरण का ही विस्तार है। इसे हमे बांग्लादेश, विएतनाम, कंपूचिया, लाओस, घाना जैसे देशों की प्रगति से देखना-समझना चाहिए। ये सब भूमंडलीकरण से ही तो पनपे है। सोचे इस साल प्रतिव्यक्ति जीडीपी में भारत को बांग्लादेश पछाडेगा।

यह सब नए आईडिया, नई हिम्मत और दूरदृष्टि से है। हम चीन को केवल सस्ते सामान- मैन्यूफेक्चरिंग देश होने की नजर से देखते है। हकीकत में वह संचार, डिजिटल, सेवा क्षेत्र की एडवांस तकनीक के उस दौर में है जिससे पूरी दुनिया में ग्लोबल वैल्यू चैन की गतिविधियों से विस्तार बना रहा है। सचमुच जो काम भारत को आईटी के प्रारंभिक सेवा धंधे से करना था और एडवांस ग्लोबल डिजिटल टेक्नोलोजी का इंजिन होना था वह चीन हो रहा है। ज्ञान- इनोवेशन आर्थिकी से वह आगे रेसिप में दबदबा बनाएगा। नई तकनीक, नई उत्पादकता से वह आगे बढ़ता हुआ है। हां, वैश्विक तथ्य है कि सन् 2004 से 2014 के बीच  वैश्विक उत्पादकता सचमुच में इनोवेशन याकि नवाचार आर्थिकी से बढ़ी। मतलब नए-नए आईडिया के नए रास्ते। आसियान देशों ने इसे समझा तभी जोखिम ले कर चीन, जापान, आस्ट्रेलिया जैसें महाबली देशों के साथ बाजार साझा करने की संधि की। आसियान के देश नए आईडिया से नई संभावनाए बनाएगें क्योंकि खुला-साझा बाजार ही विकास के नए आईडिया का हाईवे होता है। अफ्रिकी देश ऐसा करते हुए है। लातिन अमेरिकी देशों ने ऐसा किया है लेकिन पूरी दुनिया में भारत वह बिरला-अकेला देश है जो पडौस से बाजार साझा करने से डरता है तो अमेरिका, योरोप, अफ्रिका से भी डरता है। फालतू बात है कि अलग-अलग देशों से हमने मुक्त व्यापार के समझौते किए हुए है। उनसे भला क्या बना? क्या है विश्व व्यापार में भारत का हिस्सा? कितना असंतुलित व्यापार है हमारा?

तभी ईश्वर के लिए भारत को लपक कर, गलती माने हुए रेसिप संधि का तुरंत सदस्य बनना चाहिए।

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