बिहार के असली मुद्दे अलग हैं

बिहार के लोगों को बरगलाने का काम फिर जोर-शोर से शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को कहा कि ‘बिहार प्रतिभा का पावरहाउस है’। इससे सारे बिहारी फूले नहीं समा रहे हैं। हालांकि असलियत यह है कि बिहार देश और दुनिया में मजदूर सप्लाई करने की फैक्टरी भर है। प्रतिभा का पावरहाउस किसी जमाने में रहा होगा पर अब नहीं है। अब वहां से सिर्फ मजदूर सप्लाई होते हैं। प्रधानमंत्री ने आगे कहा- किसी भी आईआईटी या किसी और संस्थान में चले जाइए, वहां भी बिहार की चमक दिखेगी, आंखों में बड़े बड़े सपने लिए, देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा लिए बिहार के बेटे और बेटियां सब जगह कुछ न कुछ हटकर कर रहे हैं।

असल में यह एक मिथक है, जिसका प्रचार बिहार के लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए राजनीतिक दल बरसों से कर रहे हैं। हकीकत अलग है। भारत के आईआईटी या अमेरिका के एमआईटी में चले जाएं तो दबदबा तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु जैसे राज्यों के छात्रों का है। इस साल की जेईई मेन्स की परीक्षा में जिन 25 छात्रों की सौ फीसदी परसेंटाइल आई है उसमें लगभग सभी छात्र दक्षिण के राज्यों के या राजस्थान, दिल्ली के हैं। पर कोई भी नेता तेलंगाना जाकर नहीं कहता है कि आईआईटी में यहां के बेटे-बेटियों की चमक है। क्योंकि नेताओं को पता है कि वहां के लोग इन बातों से बेवकूफ नहीं बनेंगे।

बिहार के लोग प्रतिभाशाली हैं, मेहनती हैं, दुनिया बदल रहे हैं आदि आदि बातें असल में वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने का एक तरीका है। बिहार में चुनाव के असली मुद्दे अलग हैं। मुश्किल यह है कि बिहार की कोई भी पार्टी ये मुद्दे नहीं उठाएगी क्योंकि बिहार को पिछड़ा, गरीब और अनपढ़ बनाए रखने के पाप में सब भागीदार हैं। इसलिए बिहार की जनता को खुद ही असली मुद्दे उठाने होंगे, उन पर टिके रहना होगा और पार्टियों से जवाब मांगना होगा। बिहार विधानसभा चुनाव के कुछ असली मुद्दे ये हैं-

एक, बिहार देश का सबसे गरीब राज्य क्यों है? यह सवाल चुनाव लड़ रहे दोनों गठबंधनों से पूछा जाना चाहिए। अगर दोनों में से कोई यह बताता है कि विकास के इतने काम हुए हैं तो उन्हें बताएं कि बिहार में गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली आबादी 34 फीसदी है। देश के 23 राज्यों की स्थिति इस मामले में बिहार से बेहतर है और बड़े राज्यों में बिहार से नीचे सिर्फ झारखंड और छत्तीसगढ़ हैं। यह भी बताएं कि बिहार में प्रति व्यक्ति औसत आय 3,650 रुपए महीना है, जबकि देश का राष्ट्रीय औसत इसके तीन गुने से ज्यादा 11,625 रुपए महीना है। साक्षरता के पैमाने पर बिहार देश का दूसरा सबसे पिछड़ा राज्य है, जहां 30 फीसदी लोग अब भी निरक्षर हैं। महिलाओं में निरक्षरता का औसत लगभग 50 फीसदी है। गरीबी, प्रति व्यक्ति आय और निरक्षरता का आंकड़ा अपने आप में विकास और सुशासन के दावों की पोल खोलने वाला है।

दूसरा, बिहार में विकास क्यों नहीं हुआ? चुनाव लड़ रहे दोनों गठबंधनों को इस सवाल का जवाब देना चाहिए। विकास के भी लगभग सभी पैमानों पर बिहार सबसे पिछड़ा है। बिहार में सड़क निर्माण पर प्रति व्यक्ति खर्च 44.60 रुपए है, जबकि राष्ट्रीय औसत 117.80 रुपए है। सिंचाई और बाढ़ नियंत्रण पर बिहार में प्रति व्यक्ति खर्च 104.40 रुपए है, जबकि राष्ट्रीय औसत 199.20 रुपए का है। देश में प्रति व्यक्ति बिजली की खपत 12 सौ किलोवाट की है, जबकि बिहार में सिर्फ 311 किलोवाट है। पूर्वोत्तर के राज्य असम, नगालैंड, मणिपुर, त्रिपुरा आदि का औसत भी बिहार से बेहतर है। प्रति व्यक्ति बिजली खर्च का आंकड़ा अपने आप में यह पोल खोलने वाला है कि बिहार में न तो औद्योगिक गतिविधियां हैं, न बिजली से चलने वाली आम उपभोक्ता इस्तेमाल की मशीनें हैं। इससे बिहार के लोगों के जीवन स्तर का भी पता चलता है।

तीसरा, शिक्षा की स्थिति इतनी खराब क्यों है? बिहार में शिक्षा की व्यवस्था पिछले 30 साल में व्यस्थित तरीके से कमजोर होती गई है। शिक्षा पर खर्च के मामले में बिहार देश के सबसे पिछड़े राज्यों में से है। स्कूलों में दो लाख से ज्यादा शिक्षकों के पद खाली हैं। ठेके पर जिन शिक्षकों को रखा गया उनमें से ज्यादातर शिक्षण के बुनियादी पैमानों पर फेल हो जाएंगे। ठेके पर रखे गए शिक्षकों ने अपने नीचे ठेके पर दूसरे लोग रख लिए। बच्चों को पढ़ाने के लिए सरोगेट शिक्षा की इस व्यवस्था को बिहार में सांस्थायिक रूप मिला है। मौजूदा सरकार ने वोट बैंक के लिए इस व्यवस्था को फलने-फूलने दिया है। दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बजट का 24 फीसदी शिक्षा पर खर्च कर रही है क्यों नहीं बिहार में इस बात के लिए दबाव बनाया जाए कि कम से कम शिक्षा का बजट दहाई में तो पहुंचे! यह सवाल प्रमुखता से पूछा जाना चाहिए कि बिहार में पिछले 30 साल में कितने स्कूल बने हैं, कितने कॉलेज और नए विश्वविद्यालय बने हैं, कितने स्कूल और कॉलेजों में कितने नए क्लासरूम जोड़े गए हैं और कितने शिक्षकों की बहाली हुई है?

चौथा, शिक्षा की तरह स्वास्थ्य का मुद्दा भी बनना चाहिए। अभी कोरोना का संकट आया तो स्वास्थ्य सेवाओं की ओर लोगों का ध्यान गया। पता चला कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने एक हजार की आबादी पर अस्पताल में तीन बेड्स का न्यूनतम पैमाना तय किया है। भारत में किसी तरह से दो बेड प्रति एक हजार की आबादी तक पहुंचने का प्रयास चल रहा है पर बिहार में एक हजार की आबादी पर 0.66 बेड हैं। यानी एक हजार की आबादी पर आधे से थोड़ा ज्यादा बेड्स हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा जब देश के स्वास्थ्य मंत्री थे तब उन्होंने एक रिपोर्ट तैयार कराई थी, जिसके मुताबिक देश में एक हजार लोगों पर सात डॉक्टर का औसत है। लेकिन इसी रिपोर्ट के मुताबिक बिहार में 28 हजार की आबादी पर एक डॉक्टर है। बिहार में स्वास्थ्य मंत्रालय पिछले पिछले 15 साल में 11-12 साल भाजपा के पास ही रहा है। पर 11-12 साल की छोड़ें, दोनों गठबंधनों से पूछा जाना चाहिए कि पिछले 30 साल में कितने मेडिकल कॉलेज खुले, कितने अस्पताल बने और कितने डॉक्टरों की नियुक्ति हुई है?

पांचवा, उद्योग-धंधे कहां हैं? बिहार में जिस तरह व्यवस्थित तरीके से शिक्षा और स्वास्थ्य को खत्म किया गया है उसी तरह से उद्योग-धंधों को नष्ट किया गया है। किसी जमाने में बिहार के हर जिले में औसतन तीन या उससे ज्यादा चीनी मिलें हुआ करती थीं। पर इनमें से ज्यादातर मिलें बंद हो गईं। कृषि आधारित उद्योगों के लिए बिहार सबसे आदर्श जगह है, एक सुधा की डेयरी लगी तो बिहार देश का दूसरा सबसे बड़ा दुग्ध उत्पादक राज्य है। चावल उत्पादन में बिहार दूसरे-तीसरे नंबर का राज्य है। फल और सब्जियों के उत्पादन में भी अव्वल है। फिर भी न कोई कृषि आधारित उद्योग लगा है और न पुराने कल-कारखाने चालू हुए हैं।

छठा, कृषि और सिंचाई का मुद्दा सबसे प्रमुखता से उठाया जाना चाहिए। बिहार के ज्यादातर इलाकों में तीन फसल उपजाने की जमीन है और नदियों की भरमार है। पर बिहार में नदियां समृद्धि लाने की बजाय बाढ़ और तबाही लाने का माध्यम बन गई हैं क्योंकि दशकों से इन नदियों की सफाई नहीं हुई है, गाद नहीं निकाली गई है, बांधों को मजबूत नहीं किया गया है, नई नहरें नहीं बनाई गईं हैं, सिंचाई की योजना को ईमानदारी से लागू नहीं किया गया है।

अंत में शहरीकरण और स्वच्छता का मुद्दा भी उठा सकते हैं। भारत में औसतन 38 फीसदी हिस्से का शहरीकरण हुआ है पर बिहार में यह औसत सिर्फ 11 फीसदी है। राज्य में 11 फीसदी जो शहरी हिस्सा है उसकी स्वच्छता की स्थिति यह है कि ताजा राष्ट्रीय स्वच्छता सर्वेक्षण में सबसे गंदा शहर राजधानी पटना है और 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले 10 सबसे गंदे शहरों में छह बिहार के हैं।

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