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Thursday, May 6, 2021
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तलब है कि लिखा जाए

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हर व्यक्ति को कोई-न-कोई तलब होती है जिसके अभाव में वह बैचेन हो जाता है। कोई सिगरेट, तंबाकू की तलब करता है तो कोई शराब के बिना बहुत परेशान हो जाता है। मुझे बचपन से ही कुछ खास तलबें हुआ करती थी। मैं खाना खाने के साथ पत्र-पत्रिकाएं पढ़ता था। इसे मेरी मां नापसंद करती थीं व अक्सर मेरी थाली से दाल की कटोरी हटा लेती थी व हाथ का कौर थाली के धरातल से टकरा जाता व मैं दें-दें करता हुआ उनकी ओर मुस्कुराने लगता व वे मुझे डांटते हुए मेरी दाल वापस कर देती थी।

आज भी नाश्ता करते या खाना खाते समय अखबार पढ़ना पसंद करता हूं। जब बड़ा हुआ तो एक और तलब लगने लगी। यह तलब लेख लिखने की थी। मुझे कभी अच्छे कपड़ो या जूते पहनने का शौक नहीं रहा। अच्छा खाना खाने का जरूर शौक था। जोकि कुछ वर्षों से छूट गया है क्योंकि अब भूख ही नहीं लगती है। फिर जब लेख छपने लगे तो उन पर मिलने वाली प्रतिक्रियांए जानने की तलब होने लगी।जब जनसत्ता में था तो हर सबुह अखबार में अपने नाम से छपी खबर पढ़कर खुश हो जाता था। फिर जब कोई उस पर प्रतिक्रिया जवाब तो खुशी का पारावार ही नहीं रहता। वैसे बता दूं कि ज्यादातर आने वाले फोन करने वाले मुझे कोस रहे होते थे क्योंकि आमतौर पर मैं अपनी खबरों में किसी न किसी व्यक्ति या उससे जुड़े घोटाले को उजागर ही करता था। आमतौर पर लोग आलोचना या शिकायत करते समय मुझसे बदतमीजी नहीं करते थे। कुछ लोग इतना जरूर कह देते थे कि तुम अपने आप को क्या समझते हो। पत्रकार होकर मेरा क्या बिगाड़ लोंगे।

एक ने तो यहां तक कह दिया था कि मैंने शून्य से जीवन शुरू किया व मैं तुम्हें चुनौती देता हूं कि अगर आज तुम मुझे बरबाद भी कर दो तो फिर भी मैं छह माह में आज के हालात में खुद को पहुंचा कर दिखा दूंगा। वह सज्जन नानक दूध के मलिक नानक सिंह थे व उनसे हुई मुलाकात पर मैंने अपने कॉलम में विस्तार से लिखा भी था।जनसत्ता से रिटायर होने के बाद व्यासजी ने अगले दिन ही इस रहस्य का खुलासा कर दिया कि विनम्र नाम से रिपोर्टर डायरी लिखने वाला व्यक्ति विवेक सक्सेना है। उन्होंने मेरा फोन नंबर भी छाप दिया। उसके बाद पाठको के इतने फोन आए व उन्होंने आजतक इतनी ज्यादा प्रतिक्रियाएं जताई कि बता नहीं सकता। हर रोज लगभग आधा दर्जन पाठको के फोन आते जो इनमें से ज्यादातर मेरी खबरों पर अपनी प्रतिक्रिया जताते व कुछ उन बातों की आलोचन भी करते जो कि उन्हें पसंद नहीं आती थी। इनमें से कुछ डायरी में लिखी गई गलत जानकारी पर भी अपनी प्रतिक्रिया जताते हुए मुझे ठीक करते थे व मैं उन्हें बताता था कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ मेरी याद्दाश्त पर भी असर पड़ने लगा है। अतः कई बार गलती हो जाती है।

मैं तो अपनी डायरी को पाठको तक पहुंचाने में अहम भूमिका अदा करने वाले विकास का शुक्रगुजार हूं जोकि मेरी बेहद गंदी राइटिंग को भी पढ़कर उसे टाइप कर देता है। सच्चाई तो यह है कि मैं खुद अपना लिखा हुआ बहुत मुश्किल से पढ़ पाता हूं। व मेरी पत्नी तक मेरी हैंडराईटिंग की आलोचना करती है। जब अपने जीजाजी की मृत्यु होने के कारण मैं बेहद अशांत व असामान्य हो गया तो मैंने कुछ समय के लिए लिखना बंद कर दिया।तब शुरू में मुझे लगता था कि जैसे बिना ब्रश किए या नहाए हुए ही दिन की शुरुआत कर दी है। अचानक बहुत खाली-खाली लगने लगा। पहले लगा कि इसकी बड़ी वजह घर में अखबारों का आना बंद हा जाना था जोकि लॉकडाउन के कारण आना बंद हो गए थे। मगर वजह कुछ और ही थी। अचानक एक दिन जयपुर से एक पाठक, छाबड़ाजी का फोन आया और उन्होंने मुझसे कहा कि आपने लिखना क्यों बंद कर दिया है? तबियत तो ठीक है ना? वे मेरे स्वास्थ्य को लेकर परेशान थे। उन्होंने कहा कि वे मेरे लेखन को बहुत ज्यादा मिस कर रहे हैं। अतः मैं सामान्य होकर पुनः लिखना शुरू कर दूं।

फिर व्यासजी ने मुझे लेखनी उठाने को कहा। जब मैंने लिखना शुरू किया तो छपने के बाद इतने ज्यादा फोन आए कि बता ही नहीं सकता हूं। मुझे समझ आया कि नया इंडिया को ईपेपर के रूप में भी कितना पढ़ा जा रहा है। पहले ही दिन सुबह-सुबह पुराने सहयोगी व मित्र आर्येंद्र का फोन आया। उन्होंने मेरे साथ घटी इस दुखद घटना पर मुझे सांत्वना देते हुए पुनः सक्रिय हो जाने के लिए मुझे प्रोत्साहित किया। फिर भीलवाड़ा से पुराने पाठक व मित्र लोकेश व्यास का फोन आया जिन्होंने इतनी बड़ी खबर की समय रहते उन्हें जानकारी न देने की शिकायत करते हुए मुझे सामान्य करने के लिए बहुत अच्छी-अच्छी बातें की व हंसते हुए कहने लगे कि कोरोना ने तो हमारे भीलवाड़ा सरीखे छोटे से शहर को खबरों में ला दिया। उन्होंने मुझसे लेखन जारी रखने के लिए कहा।

नीरज शर्मा का तो कहना ही क्या था। सबने जिस आत्मीयता के साथ बात की तो मुझे लगा कि वे मेरे पाठक न होकर मेरे विस्तृत परिवार के लोग हैं जोकि मुझे व मेरे लेखन को लेकर इतने ज्यादा चिंतित हो रहे हैं। मैंने इतना ज्यादा अपनापन बहुत दिनों के बाद महसूस किया व दिली तौर पर उन सबसे जुड़ गया। मुझे लगा कि मेरा लिखना तलब न होकर मेरा सांस लेना है। वह भी ऐसे वेंटीलेटर से सांस लेना जिससे मेरे साथ कुछ और पाठक भी जुड़े हुए हैं। सो लगता है अब यह लिखना जारी रहेगा।

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