क्या बोडो क्षेत्र में शांति बनेगी?

अंततः दशको तक अलग बोडो राज्य की मांग करते आने के बाद केंद्र सरकार व नेशनल फ्रंट आफ बोडोलैंड के बीच शांति व विकास के लिएएकसमझौता हुआ है।  इस पर राज्य सरकार ने भी दस्तखत किए हैं। सरकार का दावा है कि यह समझौता बोडो समस्याओं का व्यापक व अंतिम समाधान है। असम की कुल जनसंख्या में 5 से 6 फीसदी लोग बोडो समुदाय के हैं जोकि बोडो कछारी के अनुसूचित जाति के समुदाय माने जाते हैं।जब राजीव गांधी ने 1985 में असम समझौता किया था तब असम की प्लेंस ट्राइबल परिषद ने यह आंदोलन शुरू किया था। दो साल बाद 1987 में ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन के उपेंद्र नाथ ब्रम्हा ने बोडो क्षेत्र को राज्य का दर्जा दिए जाने की मांग को लेकर आंदोलन तेज कर दिया। वे लोग सशस्त्र संघर्ष करने लगे।

रंजन दैमारी के नेतृत्व में सशस्त्र बोडो सुरक्षा बल बना यानी यह एनडीएफबी बन गया व बाद में इसके दो घटक हो गए। एक वर्ग सशस्त्र संघर्ष किए जाने के पक्ष में था जबकि दूसरा हथियारो के जरिए अपनी मांगें मनवाना चाहता था। असमी भाषी लोगों ने 2016 में भाजपा का जमकर समर्थन किया था मगर अब नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर बड़ी तादाद में असमी कलाकार, गायक, प्रबुद्ध लोग इस समझौते का विरोध कर रहे हैं। राज्य भर में भाजपा विरोधी प्रदर्शन होने लगे है।ऊपरी असम सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ। जहां सबसे ज्यादा असमी भाषी लोग रहते हैं जबकि बोडोलैंड इलाका पश्चिमी असम में आता है। वे लोग ज्यादातर भाजपा के समर्थक माने जाते हैं। बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट चुनाव में भाजपा की मदद करता आया है। उसके नेता हग्राम मोहिलारी बोडोलैंड टैरीटोरियल काउंसिल के मुखिया हैं। यह एक स्वायत्तशाली संस्था है व विगत में हुए दो बोडो समझौतो के बाद इसका गठन किया गया था।

ऑल बोडो स्टूडेंट यूनियन के द्वारा 1987 में आंदोलन करने के बाद 1993 में बोडो समझौता हुआ था व बोडोलैंड स्वायत्तपरिषद के गठन के बाद पहले बोडो में अपना आंदोलन वापस ले लिया था। मगर फिर अलग राज्य की मांग तेज कर दी गई। मगर 2002 में केंद्र सरकार ने दो अतिवादी संगठन बोडो लिबरेशन टाइगर्स फोर्स के साथ मिलकर समझौता किया। इसमें राज्य सरकार भी शामिल थी। इसके तहत परिषद का गठन हुआ।इस समय इस संगठन के चार धड़े हैं जोकि सशस्त्र संघर्ष में विश्वास करते हैं व इस संघर्ष में अब तक 4000 जाने जा चुकी हैं। आबसू के अध्यक्ष प्रमोद बोरो का दावा है कि इस बार का समझौता बहुत मायने रखता है क्योंकि बोडोलैंड की मांग करते आए चारों धड़े इसमें शामिल हुए हैं। जहां सरकार यह दावा कर रही है कि इस समझोते के बाद अलग बोडो राज्य की मांग एकदम खत्म हो गई वही आबसू के नेता दावा करते हैं कि हमने अलग राज्य की मांग छोड़ी नहीं है।

बोडो ट्राइबल काउंसिल के तहत आने वाले इलाके को बोडो टैरीटोरियल आटोनामस डिस्ट्रिक माना गया है। अब इसे बोडो टैरीटोरियल रीजन के नाम से जाना जाएगा। इस इलाके में असम का 11 फीसदी इलाका आता है जिसमें इसकी 10 फीसदी जनसंख्या रहती है। हालांकि हाल ही में असम सरकार ने विधानसभा में यह खुलासा किया था कि उसके पास इस इलाके में रहने वाली असमी व गैर असमी जनसंख्या के कोई आंकड़े नहीं हैं। मजेदार बात यह है कि इस इलाके की कोकराझार लोकसभा सीट के सांसद नब कुमार सरनिया बोडो नहीं हैं। सरकार ने कहा है कि वह इलाके के बाहर रहने वाली बोडो जनता की भलाई के लिए भी काम करेगी। इसके समुदाय के दूसरे वर्गो के साथ होने वाले उनके टकरावो की आएगी व उनकी संख्या बढ़ जाएगी। राज्य सरकार बोडो भाषा को देवनागरी लिपि में सहायक अधिकारिक भाषाओं के रूप में तव्जजो देती है जिन नेताओं ने इस समझौते पर दस्तखत किए हैं उन्हें 2008 में असम के बम विस्फोट का जिम्मेदार ठहराते हुए ताउम्र जेल की सजा मिली थी। इस हमले में हुए बम विस्फोट में 9 लोग मारे गए थे। सरकार ने उन्हें विश्वास दिलाया है कि उनके खिलाफ इस मामलों की एक-एक करके समीक्षा की जाएगी। अन्य शब्दो में उन्हें रिहा कर दिया जाएगा।

कुछ साल पहले 2012 में बोडो अतिवादियो ने 40 बंगाली मुसलमानों की हत्या कर दी।यह इस देश का दुर्भाग्य है कि जब भी कोई बड़ा समझौता होता है तो उस आंदोलन में शामिल अपराधी लोगों को सरकारे माफ कर देती है। कभी जेकेएलएफ के प्रमुख ने भी श्रीनगर में बस स्टाफ पर बैठे इंतजार कर रहे कुछ वायु सैनिको की गोली मारकर हत्या कर दी थी। मगर बाद में सरकार ने उस पर इस अपराध का मुकदमा नहीं चलाया और वह आराम से घूम फिर रहा है। असम में मारे गए 40 बंगाली लोगों के वकील अब्दुल वदूर का कहना है कि इस तरह की माफी देने से बहुत गलत संदेश जाता है व अतिवादियो की हिम्मते बढ़ती है।

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