बेहूदी बातें और तस्कर करीम लाला

हम हिंदुस्तानियों की एक बहुत बुरी आदत है कि जहां हमें बोलना होता है वहां हम लोग चुप बैठते हैं व जहां चुप रहना होता है वहां बोल जाते हैं। जब शिवसेना नेता संजय राउत ने यह कहा कि इंदिरा गांधी के करीम लाला से संबंध थे तो मुझे एक  घटना याद आ गई। हमारा इतिहास इस तरह की घटनाओं से भरा हुआ है। रामायण में जब कैकेयी को मंथरा ने भड़का कर अपने बेटे भरत को राजपाठ देने के लिए अड़ जाने को कहा तो उसको किसी ने उसे ऐसा न करने के लिए नहीं समझाया।

जब लक्ष्मण ने सूर्पणखा की नाक काटी तो किसी ने उसे ऐसा करने से नहीं रोका। इसी तरह जब महाभारत में भी द्रौपदी ने दुर्याधन को अंधे का बेटा अंधा कहा तो किसी ने उसे यह नहीं समझाया कि वह गलत कह रही है व उसे अपने देवर या जेठ के प्रति ऐसे शब्दो का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। वहीं जब दुशासन ने भरे दरबार में उसकी साड़ी खींची तो वहां मौजूद इतने बुजुर्गो व समझदार लोगों में से किसी ने भी उसके इस कदम को गलत बताते हुए ऐसा करने से उसे नहीं रोका।

हमारा वह डीएनए आज भी सक्रिय है व भाजपा समेत हर दल के नेता कभी-न-कभी ऐसी बेहूदगी बात कर देते हैं। अब न तो इंदिरा गांधी इस दुनिया में है और न ही तस्कर करीम लाला। अतः उन दोनों के संबंधों को याद दिलाने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता है। मगर एक वरिष्ठ नेता ने बेवजह का विवाद खड़ा कर अपने सहयोगी को परेशानी में डाल दिया।

हां, उसके इस बयान से पिछले दिनों की याद आ जाती है। जब देश में तस्करी का बहुत बोल-बाला था। हम लोग विदेशी ‘फारेन गुड्स’ को लेकर बहुत लालयित रहते थे। कस्टम विभाग वालो को भी लोगों की आदत व कमी का पता था व उनकी सरकारी दुकानों पर तस्करो के जरिए लाए जा रहे जब्त किए गए सामान, जैसे कपड़े, केलकुलेटर, घडि़या, क्रीम पाउडर आदि बिका करते थे व लोग उन्हें बेहद गर्व से खरीदते थे।

उन दिनों हाजी मस्तान, करीम लाल, वर्धराजन उर्फ वर्धा भाई नामक तस्कर होते थे जिनकी शहरों में व देश में तूती बोलती थी व कहा जाता था कि पुलिस अफसर व राजनीतिज्ञ, दल उनके इशारे पर काम करते हैं। वे लोग दुर्गा पूजा व गणेश पूजा के आयोजक थे। उनके बारे में तरह-तरह की किवदंतिया थी। जैसे कि करीम लाला के बारे में एक किस्सा बहुत प्रचलित था कि एक बार वह मुंबई के हवाई अड्डे पर ग्रीन लाइन से होता हुआ बाहर निकलने लगा क्योंकि तस्कर अपने साथ खुद कुछ लेकर नहीं जाता। वहां मौजूद एक नए अधिकारी को उसके साथी ने बताया कि वह तो जाना-माना तस्कर करीम लाला है। अति उत्साह में आए उस अधिकारी ने उसे रोककर उसकी तलाशी लेने की कोशिश की। इस पर करीम लाला ने सबके सामने उसे जोर का थप्पड़ मार दिया। हालांकि वह खुद कुछ लेने नहीं जा रहा था और बाहर निकल गया।

उस कस्टम अधिकारी का किसी ने भी बचाव नहीं किया। बताते हैं जब अगले दिन वह अपने घर में परिवार के साथ बैठा रामायण देख रहा था तो कुछ लोगों ने उसका दरवाजा खटखटाया। उसने दरवाजा खोला तो 2-3 लंबे चौड़े लोग उसके घर में घुस आए और बिना पूछे बच्चो के सामने सौफे पर बैठ गए। एक ने अपना बैग खोला जिसमें 25,000 रुपए रखे थे। उसने उसे दिखाते हुए कहा कि कल करीम लाला ने सबके सामने आपको थप्पड़ मारा था यह उसका मुआवजा है। उन्होंने कहा है कि अगर आप पैसा लेने से मना कर देते हैं तो इसी बैग में हम लोग आपकी गरदन काट कर ले आए। अब क्या आदेश है हम लोग पैसे छोड़ जाए‌? यह सुनते ही पूरे परिवार की हालत देखने वाली थी।

इसी तरह से महाराष्ट्र के एक मुख्यमंत्री ने वर्धाराजन उर्फ वर्धा भाई का कोई काम रूकवा दिया। वह बहुत प्रभावशाली व्यक्ति था व वहां दुर्गा व गणेश पूजा करवाता था। उसने नाराज होकर मुख्यमंत्री को फोन किया। बताते हैं कि उसने मुख्यमंत्री से कहा कि तू अपने को महाराष्ट्र का मालिक समझता है। मैं तुझे 24 घंटे का समय देता हूं या तो मेरा काम कर दे अन्यथा मैं तेरे हाथ पैर काट कर दीक्षा मांगने वाली पहिएवाली कुर्सी पर बैठाकर इंडिया गेट पर छोड़ दूंगा।

किवदंती है कि मुख्यमंत्री ने अपने किसी मुस्लिम तस्कर की मदद से उस तक संपर्क कर अपनी जान बचाई थी। हाजी मस्तान भी अपने समय का जाना-माना तस्कर था। अमिताभ बच्चन ने तो उसके जीवन पर बनी कुली फिल्म में काम किया था। उन दिनों तस्करी व तस्करो पर तमाम फिल्में बनती थी। जब वीपी सिंह ने अपना चुनाव प्रचार शुरू किया तो व्यासजी ने जनसत्ता से मुझे उनके साथ लगा दिया। टाइम्स ऑफ इंडिया के भारत भूषण उसे कवर कर रहे थे। जब हम लोग हवाई अड्डे पर पहुंचे इंतजार कर रहे थे तो भारत भूषण ने मुझसे धीरे से कहा कि तुम सामने खड़े व्यक्ति को जानते हो। यह हाजी मस्तान है।

सामने एक लंबा-सा सीधा-सादा सा आदमी खड़ा था। कुछ देर बाद मैंने भारत भूषण से उसके पास चलने को कहा और मस्तानजी नमस्ते कहकर उसे अपने परिचय दिया। उससे पूछा कि आप अंतर्राष्ट्रीय व्यापारी है। यह जो प्रधानमंत्री पर बोफोर्स तोप खरीद में दलाली के आरोप लग रहे हैं उसके बारे में आपका क्या कहना है। वह ठहाका लगाकर हंसते हुए बोला ‘बहुत तेज हो’ मुझे अंतर्राष्ट्रीय व्यापारी कहते हो।

जाहिर था कि मैं उसके लिए तस्कर शब्द का इस्तेमाल नहीं करना चाहता था। वह बोला कि विदेशी रूमाल खरीदने में कोई बुराई नहीं है। मगर मेरा मानना है कि देश के साथ न तो दलाली करनी चाहिए और न ही दलाली का पैसा विदेश में रखना चाहिए। पटना पहुंचकर हम दोनों ने अपने इंटरव्यू भेजे जोकि जनसत्ता व टाइम्स ऑफ इंडिया के पहले पृष्ठो पर छपे।

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