ऊंट भी इन दिनों मंदी के शिकार!

हाल में जब राजस्थान के प्रसिद्ध पुष्कर मेले में ऊंट की गिरती कीमत के बारे में पढ़ा तो मुझे इस जानवर की याद आ गई। मैंने अपने जीवन में सबसे पहला ऊंट 1960 दशक में देखा था।

तब हमारे कानपुर शहर के स्वरूप नगर में रहने वाले जाने-माने उद्योगपति (जुग्गीलाल कमलापति) के घर के बाहर राजस्थान से लाकर एक ऊंटनी को फुटपाथ पर बांधा गया था क्योंकि वैद्यो ने उन्हें ऊंट का दूध पीने की सलाह दी थी।

वैसे मेरे फोटोग्राफर मित्र सुभाष भारद्वाज कहावतो व जन स्मृतियों का खजाना थे। वे तब कहते थे कि कोड़ी भाव ऊंट बिक रहा है मगर कौड़ी कहा से लाए? यह कहावत किसी बहुत महंगी व सस्ती हो जाने के बावजूद उसे खरीद न पाने की स्थिति को बयान करती थी।

वह ऊंट को तीन बाई तेरह मानते थे। मतलब ऐसे जानवर जिसमें कुछ भी अनुपातित न हो। मुझे भी कई बार लगता था कि जब भगवान जीवित प्रणियो का सृजन करते-करते थक गया होगा तो अपनी बच्ची खुची मिट्टी इधर-उधर चिपकाते हुए ऊंट बना दिया होगा क्योंकि कहीं उसका कूबड़ होता है

तो कहीं लंबी सी गर्दन। पहले मैं मानता था कि ऊंट काफी महंगा जानवर होता होगा। दुनिया में सिर्फ भारत में ही अर्धसुरक्षा बल बीएसएफ ऊंट की सेना का इस्तेमाल करता है जिसमें उसके पीठ पर चलाई जा सकने वाली तोपे लगाई गई है।

हालांकि ऊंट बहुत पहले से घरेलू पशुओं के रूप में इस्तेमाल किया जाने वाला जानवर है। उसकी पीठ पर चरबी के इकट्ठा होने के कारण कूबड़ बन जाता है। उसका सवारी, खाने व दूध, खाल आदि के लिए इस्तेमाल किया जाता है। रेगिस्तान में तो यह परिवहन का बेहद अहम साधन है जोकि रेत पर काफी लंबे अरसे तक गर्मी में बिना पानी पिए सफर कर सकता हैं।
दुनिया में 94 फीसदी ऊंटो का एक कूबड़ व 6 फीसदी के दो कूबड़ होते हैं। आमतौर पर 6 से 7 फीट ऊंचा यह जानवर 40-50 साल जीवित रहता है और 65 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से चल सकता है। उनके पेट में एक बड़ी थैली होती है जिसमें वे काफी दिनो के लिए पानी एकत्र कर लेते हैं।

वे 10 दिनों तक पानी पिए बिना रह सकते हैं। इस जानवर को रेगिस्तान का जहाज भी कहते हैं। हमारे देश में राजस्थान में ऊंटो का जमकर इस्तेमाल होता है व वहां उनके चमड़े से बनी जूतियो से लेकर फर्नीचर तक मिल जाता है। हाल ही में ऊंटो के खबर में आने की वजह से इस राज्य के पुष्कर शहर में सालाना लगने वाला विश्व प्रसिद्ध जानवरों का मेला था।

जहां हर साल नौ दिन तक चलने वाले इस मेले के दौरान देशभर के लोग अपने पशु खरीदने व बेचने आते हैं। इनमें दुधारू पशुओं से लेकर ऊंट, हाथी, बैल, बकरी भेड़ आदि तक होते हैं। इस साल वहां आने वाले ऊंटो की बिक्री व दाम में बहुत कमी देखी गई। इसकी वजह यह बताते हैं कि 2014 में राज्य सरकार ने जिसका राजकीय पशु ऊंट है इनके मारने, इनको राज्य के बाहर किसी और काम के लिए इस्तेमाल में लाए जाने पर रोक लगा दी थी।

बाद में सरकार ने हर ऊंट के बच्चे के लिए उसके मालिक को 10,000 रुपए देने शुरू कर दिए। इस योजना को बाद में बंद कर दिया और ऊंट पालने व बेचने के प्रति लोगों का आकर्षण कम होने लगा। जो ऊंट कभी 10-15,000 रुपए तक के बिकते हैं इस बार 4000 रुपए तक के नहीं बिक पाए। इनके तमाम मालिको अपने जानवरो को बिना बिके ही उनके साथ वापस खाली हाथ लौटना पड़ा।

इस बार तो हर साल की तुलना में एक चौथाई ऊंट ही बिक पाएं। दरअसल परिवहन व सामान लाने-ले जाने के लिए ऊंट का सदियो से इस्तेमाल होता आया है। चीन के व्यापारी सिल्क रूट पर ऊंटो पर लादकर अपना सामान दूसरे देशों को बेचने ले जाते थे। मरूस्थल वाले अरब देशों में तो ऊंट परिवहन से लेकर भोजन तक का अहम साधन था। पाकिस्तान में तो ऊंट की निदारी नामक व्यंजन बनता है।

खाड़ी के देशों में ऊंटों की दौड़ बहुत चर्चित थी। इसमें छोटे-छोटे बच्चो को उसकी पीठ पर बांध कर उन्हें दौड़ाया जाता था। जब बच्चे डरकर चीखते तो ऊंट और तेजी से दोड़ता। अक्सर यह बच्चे दो साल तक के होते थे जिन्हें पाकिस्तान या दूसरे देशों से चुरा कर लाया जाता था व वे दौड़ के दौरान ऊंट से गिरकर मर जाते थे।

उन्हें ऊंटो के बाडे में ही रहना होता था। इसकी दुनिया भर में आलोचना हुई। संयुक्त अरब अमीरात ने 2012 में इस दौड़ पर रोक लगा दी थी। कुछ देशों में तो बकरीद के दौरान ऊंट की बलि भी दी जाती है। हालांकि यह उपयोगी जानवर आस्ट्रेलिया की बहुत बड़ी समस्या बन गया है। वहां एक फ्रेथ/डेनिश फोटोग्राफर 1822 में परिवहन के लिए ऊंट लेकर गया था।

फिर भारतीय, अफगानी, थाईलैंड के लोग सवारी के लिए ऊंट लेकर आने लगे। देखते ही देखते उनकी जनसंख्या काफी बढ़ने लगी। जब 1920 के दशक में अंग्रेज वहां कारे लेकर आए तो ऊंट का इस्तेमाल बंद कर दिया व उन्हें लोगों ने जंगलों में छोड़ दिया। ऊंट ऐसा जानवर है जोकि 80 फीसदी तरह की वनस्पतियां खा जाते हैं।

उन्होंने वहां की वनस्पति बरबाद कर दी क्योंकि वे जंगलों में छुट्टा घूमते थे। जब वहां अकाल पड़ा तो ऊंटो ने पानी की तमाम स्त्रोत बरबाद कर दिए। जंगल के करीब बसे घरो में नल्को व दूसरे पशुओं की हौदी को तोड़ डाला। पिछले साल उनकी संख्या 20 लाख तक पहुंच गई व वहां की सरकार को उस साल करीब 3 लाख ऊंट मारने पड़े।

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