बतौर प्रकाशक श्याम सुंदरजी

जब दिल्ली आया था तब एक बुजुर्ग परिचित ने मुझे सलाह दी थी कि जब कभी किसी से निकटता बढ़ानी हो या दोस्ती करनी हो तो इस बात का ध्यान रखना कि वह व्यक्ति अपने परिवार व दोस्तों के साथ कैसे संबंध रखता है। अगर वह उनका सम्मान करता है व उनके साथ अच्छे संबंध रखता होगा तो वह तुम्हारे साथ भी ऐसा ही करेगाक्योंकि वह व्यक्ति संस्कारी होगा।

जब मैं करीब दो दशक पहले प्रभात प्रकाशन के प्रभातजी से मिला तो उनसे मिलकर मुझे बहुत अच्छा लगा। पूरा परिवार बेहद मान-सम्मान करता था। अति व्यस्त होने के बावजूद उन लोगों ने कभी मुलाकात के लिए समय तय करते हुए यह नहीं कहा कि कब आना है। मैं जब भी आसफ अली रोड स्थित उनके कार्यालय जाता तो वेऔरपीयूष बड़े हाल में बैठते थे। उनके बड़े भाई पवन से मेरी नहीं के बराबर मुलाकाते है। हां, उनके पिता व प्रभात प्रकाशन के संस्थापन श्याम सुंदरजी अपने केबिन का दरवाजा खोल कर बैठे नजर आ जाते हैं। व मैं उन्हें प्रणाम करता हुआ आगे बढ़ जाता था।

अतः जब यह खबर मिली कि श्याम सुंदरजी इस दुनिया में नहीं रहे तो बेहद धक्का लगा। इसकी मूल वजह यह रही कि उन्होंने न केवल साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट चीजें देकर मानक स्थापित किए बल्कि अपने बच्चो को संस्कारों से भर दिया। सच कहा जाए तो पूरा परिवार ही विनम्र शब्द का जीता-जागता उदाहरण है।

जब शाम को श्याम सुंदरजी की श्रृंद्धाजलि (श्यामांजली) कायर्क्रम में गया तो वहां मौजूद लेखक, साहित्यकारों, नेताओं की भीड़ देखकर लगने लगा कि किसी व्यक्ति ने अपने जीवन में क्या हासिल किया। इसका पता उसके पारिवारिक समारोह, खासतौर से उसके दुनिया से जाने के बाद ही पता चलता है। श्याम सुंदरजी के बारे में कहा जा सकता है कि वे सरस्वती ही नहीं लक्ष्मी के भी पुत्र थे। उन्होंने अपने जीवन में नाम व नामा दोनों ही कमाएं। हालांकि कभी उनसे बातचीत के दौरान यह आभास नहीं हुआ कि वे पैसे को महत्व देते थे।

वे मूलरूप से मथुरा के रहने वाले थे व बाद में दिल्ली आकर बस गए थे व उन्होंने चावड़ी बाजार में अपना प्रकाशन शुरू करने के बाद आसफ अली रोड़ पर एक भव्य कार्यालय बनाया जोकि सरस्वती पुस्तको व ज्ञान के धन से भरा हुआ है। उन्होंने 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद हमारे शहीद व वीर सैनिको के बारे में पुस्तकें छापी। अनेक राष्ट्रवि, नोबल पुरुस्कार विजेताओं के साहित्य को हिंदी में छापकर आम जनता को उपलब्ध करवाया।

जब बैनेट एंड कोलमैन याकि टाइम्स ऑफ इंडिया प्रकाशन ने अपनी बहुचर्चित साहित्यिक पत्रिका सारिका प्रकाशन बंद कर दिया था तब पैसे की चिंता न करते हुए उन्होंने 25 साल पहले  ‘साहित्य अमृत’ नामक पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया जोकि आज देश कि सबसे बड़ी साहित्यक पत्रिका है। श्यामांजली के मौके पर धर्मिक व सुंदर भजनों के कार्यक्रम के साथ वहां आने वालों को एक पुस्तक भी भेंट की गई जिसमें श्यामजी के बारे में उनके परिचित व करीबी लोगों के द्वारा व्यक्त किए गए  विचारों व भावों के अलावा चर्चित भक्ति गीतों का संग्रह भी मौजूद था। इसे पढ़कर श्यामजी के बारे में कई बातें मालूम हुई।

उनके मित्र रामदरश मिश्र ने लिखा कि वैचारिक व राजनीतिक रूप से अलग होने के बावजूद उनके संबंध मनुष्यता के आधार पर थे। ध्यान रहे कि श्यामजी कट्टर संघी थे व रज्जू भैया के काफी करीब माने जाते थे। उनके मुताबिक उनके आसफ अली रोड़ स्थित कार्यालय में सभी विचारधाराओं वाले कवि साहित्यकार आते थे व खुलकर चर्चा होती थी। वे बहुत संस्कारी व्यक्ति थे। गोवा की राज्यपाल रही मृदुला सिन्हा तो उन्हें सगे भाई की तरह मानती थी। यही बात उनके बच्चे में देखने को मिलती है। उनके बच्चे रामदरश मिश्र त्रिलोकीनाथ चतुर्वेदी को ताऊजी व मृदुला सिन्हा को बुआजी कहकर अपने रिश्तो का परिचय देते।

वे नए लेखकों को मौका देते थे व नवोदित लेखकों को भी सीख देते थे कि वे पुस्तके छपवाने की जल्दी नहीं करे और उसे बार-बार पढ़े। वे किसी पुस्तक की भूमिका किसी बड़े साहित्यकार से लिखवाने पर जोर नहीं देते थे। उनका मानना था कि क्या पता इस पुस्तक का लेखक या लेखिका एक दिन उस साहित्यकार से भी बड़ा हो जाए जिसने भूमिका लिखी है। वहीं डा कमल किशोर गोयनका ने उन्हें अपना बड़ा भाई व मार्गदर्शक बताते हुए कहा कि जब उन्होंने प्रेमचंद विश्व कोष तैयार किया तो नामवर सिंह सरीखे बड़े साहित्यकारों ने मिथ्या आरोप लगाते हुए श्याम सुंदरजी पर उसे प्रकाशित न करने के लिए दबाव डाला। मगर उन्होंने सांस्कृति, राष्ट्रवादी, नैतिकतावादी नीति का पालन करते हुए अपने संस्कारों का परिचय दिया व अंततः इसके कारण प्रेमचंद जन्म शताब्दी पर तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने मुझे सर्वेश्रेष्ठ पुस्तक का पुरुस्कार दिया।

वे विरोध के बावजूद नम्रता व तर्क के साथ ईश्वर में विश्वास रखते हुए बात करते थे जबकि डा वेदप्रताप वैदिक ने बताया कि उनकी ‘;अंग्रेजी हटाओं क्यों और कैसे’ पुस्तिका को बिना किसी मुनाफे के लाखों लोगों तक पहुंचाने में उन्होंने कितनी गंभीर भूमिका अदा की। लेखिका डा कुमुद शर्मा के मुताबिक उन्होंने अपने दफ्तर को ही नहीं पूरे परिवार को अनुकरणीय बना रखा था।

एक आम बात जोकिसब साहित्यकारों से सुनने को मिली वह यह कि सबने एक स्वर में तीनों पुत्रों पवन, प्रभात व पीयूष पर आशा बताई कि भविष्य में वे लोग संस्था को आगे ही बढ़ाएंगे। श्याम सुंदरजी ने पंडित विद्यानिवास मिश्र, डा लक्ष्मीमल सिंघवी, डा त्रिलोकीनाथ को जोड़कर साहित्य अमृत शुरू की थी मगर उन्होंने उसमें कभी अपनी किसी पुस्तक की समीक्षा प्रकाशित नहीं की। वे एक साहित्यिक प्रकाशक नहीं थे बल्कि उन्होंने साहित्य को जिया भी था।

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