बैटरी के बिना जीवन क्या अब संभव?  

आज बैटरी हमारे जीवन की इतनी अहम वस्तु हो गई है कि हम लोग उसके बिना जीवन की कल्पना ही नहीं कर सकते हैं। बच्चो के खिलौने से लेकर सेलफोन और कार तक बैटरी के सहारे ही चल रहे हैं। असल में बैटरी शब्द अंग्रेजी में सेनाओं के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द बैटरी से लिया गया है। जिसका मतलब होता है (टुकड़ी)। अब हाल में रसायन शास्त्र के लिए तीन वैज्ञानिको को दिए गए नोबेल पुरस्कार ने फिर से सेल और बैटरी की यादें ताजा करवा दी है।

आज हम बैटरी के जरिए बिजली भले ही प्राप्त कर रह हो मगर यह शब्द बिजली का इस्तेमाल किए जाने के पहले अस्तित्व में आ चुका था। सबसे पहले बिजली की खोज करने वाले वैज्ञानिक बेंजामिन फ्रैंकलिनने इस शब्द का इस्तेमाल किया था। तब तक लोगों को यह पता चल चुका था कि कपड़े या कागज को कांच के साथ रगड़ने से बिजली पैदा होती है। मगर उन्हें यह नहीं पता था कि इसका संरक्षण कैसे किया जाए। हालांकि 1745 में कुछ यूरोपीय वैज्ञानिको ने लीडन जार नामक चीज विकसित करके इसका संरक्षण शुरू कर दिया था।
बेंजामिन फ्रैंकलिन का मानना था कि लीडन जार तोप जैसा था जोकि उसकी तरह छुए जाने पर चिंगारी छोड़कर झटका देता था। उस समयकई तोपो का इस्तेमाल करने वाले समूह को सैना में बैटरी कहा जाता था। हालांकि इसके कई वर्ष बाद 1800 में बोल्टा ने असली बैटरी विकसित की जिसे वोल्टेइन पाइल के नाम से जाना जाता था।

इसमें तांबे व जिंक के टुकड़ो को आपस में जोड़कर उन्हें कपड़े या कार्डबोर्ड से अलग रूटकेस इलेक्ट्रो नाइट में अलग-अलग रखा जाता था। इन्हें बिजली पैदा करने वाले जैनरेटर या इलेक्ट्रिक ग्रिड का अविष्कार होने के पहले से बना लिया गया था। टेलीग्राफ व टेलीफोन का विकास होने के साथ-साथ ही इसकी मांग बढ़ती गई। पोर्टेबल कंप्यूटर, मोबाइल फोन व इलेक्ट्रिक कार्डो के निर्माण केसाथ इस क्षेत्र में तो मानो क्रांति ही आ गई।

शुरू में वैज्ञानिको ने वैटसेल या गीली सेल बनाई। इनके एक जार में इलेक्ट्रोलाइट भरा होता था व उसमें धातु के इलेक्ट्रोड होते हैं जोकि आपस में जोड़े जाने पर बिजली पैदा करते थे। इस्तेमाल के कारण ये् इलेक्ट्रोड गल जाते थे तब धातु धुले इलेक्ट्रोलाइट को अलग कर उसमें नया इलेक्ट्रोलाइट व धातु के इलेक्ट्रोड लगा दिए जाते थे। चीनी मिट्टी या कांच के इस कंटेनरो का इस्तेमाल टेलीफोन व टेलीग्राफ प्रणालियों में किया जाता था। इसकी एक और रोचक कथा है।

कहते हैँ कि 1780 में लुइगी गलवानी नामक वैज्ञानिक एक मेढ़क की चीरफाड़ कर रहा था जोकि धातु की एक पिन से बोर्ड पर चिपका हुआ था। जब लुइगी ने उसको अपने धातु के चाकू से छुआ तो उसकी टांग सिकुड़ गई। लुइगी का मानना था कि मेढ़क की आतंरिक बिजली के कारण ऐसा हुआ था। हालांकि उसका वैज्ञानिक दोस्त एलेसेंड्रो वोल्टा उसकी इस राय से सहमत नहीं था। उसका मानना था कि गीले माहौल में अलग दो धातुओं के छू जाने से यह करंट पैदा हुआ था।

उसने इसे लेकर धातुओ के दो अलग-अलग टुकड़े लेकर प्रयोग किए व अपनी खोज का खुलासा किया। उसने पहली बैटरी का अविष्कार किया जिसे कि वोल्टेइक पाइल के नाम से जाना जाता है। इसमें एक ब्राइन इलेक्ट्रोलाइट में जस्तेद व तांबे के दो टुकड़ो को आपस में जोड़कर करेंट पैदा किया जाता था।
उसके बाद उसकी खोज की गई बैटरी को बेहतर बनाने के लिए दूसरे वैज्ञानिक खोज करते गए। जैसे 1859 में गैस्टन प्लेन्टी नामक वैज्ञानिक ले लेड-एसिड बैटरी विकसित की जिसमें उलटा करेंट भेजने पर उसे चार्ज किया जा सकता था। आज हमारी कारों में इसका ही इस्तेमाल किया जाता है क्योंकियह काफी भरी होती है। इसको प्राइमरी सेल भी कहते हैं।

जिन तीन वैज्ञानिको को संयुक्त रूप से नोबल पुरुस्कार दिया गया है उनके प्रयासों के कारण अब लैपटॉप व मोबाइल फोन में लिथियम आयरन बैटरी काम कर रही है।लिथियम एक ऐसी धातु होती है जिसका घनत्व काफी कम होता है मगर उसकी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक क्षमता काफी ज्यादा होती है। मतलब यह बहुत कम भार में बहुत कम ऊर्जा दे सकती हैं। काफी हल्की होने के कारण इसका इस्तेमाल बैटरी में किया जाने लगा। हालांकि इसकी खोज 1912 में ही कर ली गई थी मगर बाजार में इससे बनी बैटरी 1970 में ही आई।

अगले दशक में इससे भी बड़ी खोज हुई व अमेरिका के जॉन बी. ने की। जिन तीन वैज्ञानिको को नोबल पुरुस्कार मिला है उनके नाम इस प्रकार है- जॉन बी. गुडइनफ जर्मनी में पैदा हुआ 97 साल का यह वैज्ञानिक अमेरिका की टेक्साइस यूनिवर्सिटी में इंजीनियरिंग का प्रोफेसर है। दूसरे वैज्ञानिक है ब्रिटिश अमेरिकन केमेस्ट्री प्रोफेसर एम. एम स्टेनली विटिंगम। 77 वर्षीय यह प्रोफेसर न्यूयॉर्क स्टेट यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर हैं। तीसरे 71 वर्षीय वैज्ञानिक अकिरा योशिना जापान के मेंइजो विश्वविद्यालय के साथ वहां की रासयनिक कंपनी अशाई कासाई कारपोरेशन से भी जुड़े हुए हैं। उनके प्रयास ने जहां ऊर्जा का संरक्षण किया। इनसे कंप्यूटर, इलेक्ट्रॉनिक कारों आदि में नई जान फूंक दी वह भी प्रदूषण फैलाए बिना ही। क्योंकि इन बैटरियो को रिचार्ज किया जा सकता है।

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