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Saturday, April 17, 2021
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आरक्षण मिलेगा, नौकरी भले न मिले!

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अजीत द्विवेदीhttp://www.nayaindia.com
पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री रहते ऐसा सोचना भी पाप है कि आरक्षण की व्यवस्था खत्म हो जाएगी। आखिर उन्होंने कहा हुआ है कि वे अपनी जान की कीमत पर आरक्षण की व्यवस्था को बचाए रखेंगे। जब 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव के समय राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन राव भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की बात कही थी तब मंडल राजनीति से निकली पार्टियों के पुरोधा नेताओं- लालू प्रसाद और नीतीश कुमार ने इसे चुनावी मुद्दा बनाया था। उसी समय इसका जवाब देने के लिए नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उनके जीते-जी आरक्षण की व्यवस्था खत्म नहीं हो सकती। उन्होंने बाद में इसे साबित भी किया, जब आर्थिक रूप से गरीब सवर्णों के लिए 10 फीसदी आरक्षण का कानून बनाया।

तब फिर क्यों चौतरफा शोर मचा है कि आरक्षण का विचार खतरे में है और इसे बचाने के लिए सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े, दलित, आदिवासी और आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को एक हो जाना चाहिए? साथ मिल कर आरक्षण की रक्षा करनी चाहिए! क्या इन सबको प्रधानमंत्री की बात का भरोसा नहीं है? सवाल है कि अगर इतने बड़े समूह को प्रधानमंत्री पर भरोसा नहीं है तो फिर प्रधानमंत्री की पार्टी एक के बाद एक सारे चुनाव कैसे जीतती जा रही है? क्या यह माना जाए कि आरक्षण खत्म होने की चिंता और मतदान का व्यवहार दोनों अलग अलग चीजें हैं? यह अलग से विश्लेषण का विषय है क्योंकि यह मौजूदा समय की सबसे खास और दिलचस्प परिघटना है कि महंगाई बढ़ रही है, रोजगार घट रहा है, कमाई खत्म हो रही है, व्यापार बंद हो रहा है, कर्ज बढ़ रहा है, बैंक डूब रहे हैं, सरकारी कंपनियां बिक रही हैं, सीमा पर चीन हमारी जमीनें खा रहा है, पड़ोसी देश आंखें दिखा रहे हैं फिर भी सत्तारूढ़ दल का वोट बढ़ रहा है!

बहरहाल, जहां तक आरक्षण की व्यवस्था या आरक्षण के विचार का सवाल है तो वह खतरे में इसलिए दिख रहा है क्योंकि प्रधानमंत्री ने देश की सर्वोच्च पंचायत संसद में खड़े होकर संकल्प किया कि थोड़ी सी कंपनियों को छोड़ कर बाकी सारी कंपनियां बेच दी जाएंगी। उन्होंने यह भी संकल्प जताया है कि बिजनेस करना सरकार का बिजनेस नहीं है। उनकी एक चेतावनी यह भी है कि वोट की राजनीति के लिए निजी कंपनियों को निशाना बनाना बरदाश्त नहीं किया जाएगा। यानी लगभग सभी सरकारी कंपनियों को बेच कर देश के हर कारोबार का निजीकरण करना उनका संकल्प है। सवाल है कि जब सारी सरकारी कंपनियां बिक जाएंगी और सब कुछ निजी हो जाएगा तो आरक्षण की व्यवस्था कहां लागू होगी? प्रधानमंत्री अपनी जान भी दांव पर लगा दें तो वे कहां रोजगार दिलवाएंगे?

क्या प्रधानमंत्री निजी सेक्टर में आरक्षण की पहल करेंगे? देश के कई नेता निजी सेक्टर में आरक्षण की मांग करते रहे हैं। लेकिन कंपनियों के हित को लेकर सदैव चिंता में रहने वाले प्रधानमंत्री क्यों निजी कंपनियों को बाध्य करेंगे कि वे अपने यहां आरक्षण की व्यवस्था लागू करें या सरकार के श्रम कानूनों को लागू करें या न्यूनतम वेतन की नीति को लागू करें? यह तो कंपनियों का काम है वे कैसे अधिकतम मुनाफा कमाती हैं। निजी सेक्टर में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है तब भी उनका काम कोई बहुत महान किस्म का नहीं है। वे कोई शोध या आविष्कार नहीं कर रहे हैं और न किसी बड़ी योग्यता का प्रदर्शन कर रहे हैं। उनका मुनाफा बढ़ रहा है तो कारण सरकारी अनुकंपा है। अगर आरक्षण नहीं होना निजी सेक्टर के लिए वरदान होता तो हजारों की संख्या में कंपनियां दिवालिया होकर एनसीएलटी और एनसीएलएटी में लाइन लगा कर नहीं खड़ी होतीं! हकीकत यह है कि भारत में सरकारी कंपनियां जिस किस्म के भ्रष्टाचार और प्रतिभाहीनता की शिकार हैं वैसी ही निजी कंपनियां भी हैं। आईसीआईसीआई बैंक की प्रमुख के भ्रष्टाचार में शामिल होने और यस बैंक, आईएलएंडएफएस व डीएचएफएल के दिवालिया होने की घटना से इस बात को समझा जा सकता है।

बहरहाल, हकीकत यह है कि धीरे धीरे लगभग सभी सरकारी कंपनियां बिक जाएंगी। चार रणनीतिक सेक्टर की एक चौथाई कंपनियां ही सरकारी रहेंगी। बाकी रणनीतिक सेक्टर की तीन-चौथाई और गैर रणनीतिक सेक्टर की सौ फीसदी कंपनियां बिक जाएंगी। सो, सरकारी नौकरियां अपने आप कम हो जाएंगी। मिसाल के तौर पर भारत सरकार बीपीसीएल को बेचने जा रही है, इसमें 11,894 कर्मचारी हैं, जिनमें साढ़े चार हजार से ज्यादा आरक्षित वर्ग के हैं, जिनकी नौकरी खत्म हो जाएगी। रणनीतिक और गैर रणनीतिक सेक्टर में कुल तीन सौ कंपनिया हैं, इनमें से 25 को छोड़ कर बाकी 275 कंपनियां बिकने वाली हैं, बशर्ते कि खरीदार मिल जाए। एक आकलन के मुताबिक सरकारी कंपनियों के बिकने से आरक्षित वर्ग की सात लाख नौकरियां खत्म होंगी।

ऐसा नहीं है कि सिर्फ सरकारी कंपनियों बेचने भर से आरक्षण का विचार खतरे में आया है। सरकार के शीर्ष पदों पर लैटरल एंट्री के जरिए निजी कंपनियों के विशेषज्ञों को बहाल करने की नीति भी आरक्षण के विचार को कमजोर करेगी। सरकार लैटरल एंट्री के जरिए निदेशक और संयुक्त सचिव के स्तर पर बहाली कर रही है। एक तरफ संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी की परीक्षा के जरिए होने वाली बहाली कम हो रही है और दूसरी ओर लैटरल एंट्री के जरिए बहाली बढ़ाई जा रही है। वैसे भी प्रधानमंत्री ने कहा हुआ है कि आईएएस हो गया तो क्या देश उसके हाथ में सौंप देंगे! तभी जिस यूपीएससी ने मनमोहन सिंह के कार्यकाल के आखिरी वर्ष में 1,236 वैकेंसी निकाली थी, उसने 2018 में सिर्फ 759 वैकेंसी निकाली। इसका लगातार घटते जाना तय है क्योंकि सरकार को ज्यादा आईएएस, आईपीएस आदि की जरूरत नहीं है। अगर जरूरत होगी तो निजी क्षेत्र के कथित विशेषज्ञ को बहाल कर लिया जाएगा।

सोचें, एक तरफ सरकारी नौकरियां लगातार कम हो रही हैं, वैकेंसी कम निकाली जा रही है, वैकेंसी निकल भी रही है तो या तो परीक्षा नहीं हो रही है या अंतिम नतीजे नहीं आ रहे हैं और जहां अंतिम नतीजे आ गए हैं वहां नियुक्ति नहीं हो रही है। दूसरी ओर लैटरल एंट्री के जरिए निजी क्षेत्र के कथित विशेषज्ञों को सरकार में शीर्ष पद पर लाने की योजना पर अमल हो रहा है। इसके बाद सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में जो नौकरियां थीं, वह उन उपक्रमों की बिक्री के साथ ही निजी क्षेत्र में चली जाएंगी। उसके बाद क्या बचेगा?

नौकरी बचे या नहीं आरक्षण बचा रहेगा! जान पर खेल कर उसकी रक्षा की जाएगी! न सिर्फ रक्षा की जाएगी, बल्कि उसका दायरा भी बढ़ाया जाएगा। जैसे पहले पिछड़ी जातियों, एससी और एसटी के लिए आरक्षण की व्यवस्था थी वैसे ही गरीब सवर्णों के लिए भी आरक्षण की व्यवस्था कर दी गई है। इनके लिए सरकार ने सीमा रखी है कि आठ लाख से कम आमदनी वाले सवर्ण गरीब माने जाएंगे। इसका नतीजा यह हुआ है कि करीब 95 फीसदी सवर्ण आरक्षण के दायरे में आ गए हैं। इस तरह देश में थोड़ी सी आबादी को छोड़ कर लगभग पूरी आबादी को आरक्षण के दायरे में ला दिया गया है। सो, आरक्षण सबको मिलेगा, नौकरी मिले या न मिले!

पुनश्चः सोशल मीडिया में किसी ने निजीकरण के तीन फायदे बताए हैं। पहला, आरक्षण की व्यवस्था अपने आप खत्म हो जाएगी। दूसरा, कोई सरकारी नौकरी नहीं मांगेगा यानी नौकरी के लिए कोई आंदोलन नहीं होगा। और तीसरा, सरकारी नौकरी के नाम पर मोटा दहेज मांगने की प्रथा भी पूरी तरह से खत्म हो जाएगी।

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