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हमें क्या फायदा?

एक बार मैंने टीवी पर अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन को किसी सभा में यह कहते हुए सुना था कि अगर आपको अपने खानदान का पता लगाना हो तो चुनाव लड़ लेना चाहिए। आपके विद्रोही तो आपकी तीन पीढ़ियों का इतिहास निकाल लाएंगे। आज भी यही कुछ है।… तब मैंने पापाजी के नाम से एक उक्ति गढ़ दी कि ‘हमें क्या फायदा’। आज वह उक्ति फिर से याद आ रही है। ऋषि कुछ भी हो जाए उनसे खुद को जोड़ने का हमें क्या फायदा।

पहले दो साल तक दिलो दिमाग पर कोरोना हावी रहा तो इसका डर खत्म होने के पहले ही अखबारों व टीवी चैनलों पर रूस-यूक्रेन का युद्ध हावी है। तमाम बड़े बड़े चैनल इसके तीसरे विश्व युद्ध में बदलने व परमाणु बम के इस युद्ध में इस्तेमाल किए जाने की घोषणा कर रहे है। ऐसा लगता था कि उनके रिपोर्टर मानो पुतिन के यहां घर में चाय पिलाने का काम कर रहे हों जो कि पुतिन के चाय पिलाने के समय उनके पास खड़े होकर फोन पर उनके द्वारा अपने सिपहसलारों से की जाने वाली सारी बातचीत सुनकर अपनी रिपोर्ट तैयार करते होंगे।

यूक्रेन युद्ध का मामला ठंडा भी नहीं पड़ा था ऋषि सुनक के ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनने का मुद्दा अखबार, टेलीविजन से लेकर हर एशियाई की जुबान पर चढ़ा हुआ है। पाकिस्तान समेत भारत ही नहीं एशिया में हर व्यक्ति की एक खूबी यह होती है कि वह हर चर्चित नाम व व्यक्ति से खुद को किसी न किसी रुप से जोड़ना चाहता है। अब भारत से लेकर पाकिस्तान तक ऋषि सुनक के अपना होने के दावे कर रहे हैं। वह खुद तो ब्रिटेन में पैदा हुए थे पर उनके दादा जो कि भारतीय मूल के थे व फिर वे अफ्रीका में बस गए थे। उनके कारण उन्हें भारतीय मूल का माना जा रहा है। लोगों से जुड़ने की यह आदत कितनी गहरी है इसे याद दिलाने के लिए एक किस्सा सुनाता हूं।

मेरे एक मित्र प्रधानमंत्री कार्यालय में सूचना अधिकारी थे। उन्हें केंद्र सरकार के सूचना कार्यालय में एक कमरा दिया गया था। कमरे में दरवाजे पर प्रधानमंत्री कार्यालय के सूचना अधिकारी लिखा बोर्ड भी लगा रहता था। दिवंगत एसजी लाल नामक यह अधिकारी बहुत मजाक किया करते थे। मैं उनके पास अक्सर प्रधानमंत्री कार्यालय सूचना लेने व गपशप करने चला जाता था। एक बार जब उनसे मिला था तो उनके पास एक सज्जन बैठे थे। लाल साहब उन्हें साथ लेकर अपनी कैंटीन में चाय पीने चल दिए। उन्होंने बहुत सम्मान के साथ मेरा उस व्यक्ति से परिचय करवाते हुए कहा कि आप मिस्टर राव साहब से मिलिए। यह हमारे प्रधानमंत्री नरसिंहराव के रिश्तेदार हैं। मैंने उनसे अभिवादन किया। हम लोग चाय पीकर वहां से चल दिए। वापस आ गए।

फिर मुस्कुराते हुए लाल साहब ने बताया कि जब से नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने हैं उनका काम काफी बढ़ गया है। इन सज्जन समेत दर्जन भर लोग आकर उनसे मिलकर उन्हें बता चुके हैं कि वे तो राव साहब के रिश्तेदार है। ज्यादातर लोग हरियाणा के रेवाड़ीगंज से आए थे। जो कि रावों (यादवों) का गढ़ हैं। ज्यादातर लोग यह मान रहे थे कि नरसिंहराव भी उनके यहां वाले राव (यादव) थे व वे उनके साथ रिश्तेदारी जता रहे थे।

कुछ ऐसे ही हम भारतीय सुनक के साथ जुड़ गए हैं। पाकिस्तान के लोग भी उन्हें अपना बता रहे हैं क्योंकि सुनक के पूर्वज वहां के गुजरावाला शहर से थे जो कि बंटवारे के बाद पाकिस्तान में चला गया। ऋषि सुनक की इतनी ज्यादा खबरें आ रहे हैं कि कुछ न पूछिए। मुझे तो लगता है कि अमिताभ बच्चन के कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में उनके ऊपर ही सवाल पूछने जा रहा है। खबरों से याद कर लिया कि ऋषि सुनक की दादी सुहाग रानी सुनक जब 1966 में नैरोबी से ब्रिटेन आयीं तो वे वहां केलैप्टर इलाके में किताब बेचने व काम करने लगी। किस्मत का फेर देखिए कि मुझे अपनी दादी का नाम नहीं पता है पर सुनक की दादी का नाम पता है। जब भी श्राद्ध के दौरान पूजा करवाई तो मुझे पंडित को यह बताने पर शर्मिंदगी होती है कि अपनी दादी का नाम नहीं पता सिर्फ दादी याद करके उन्हें अर्पित करता हूं पर मुझे सुनक की दादी का नाम कंठस्थ हो गया है।

 

जब भी कहीं कोई बड़ी दुर्घटना घटती है तो हम उसके साथ अपने संबंध जोड़ने लगते है। जब कल्पना चावला नासा की उड़ान पर गई तो अखबार उन्हें अपना बताने के किस्सों से भरे रहे। वे हरियाणा की थीं। ऋषि के भाई संजय से लेकर उनके मामों और बहन तक के नाम याद हो गए हैं। जब कोविड बीमारी के दौरान सुबह अखबार खोलता था तो मरने वालों के शोक व उठाने के विज्ञापनों पर छपी तस्वीरें देख कर डर से यह पता लगाने में जुट जाता था कि उनमें कहीं कोई मेरा परिचित तो शामिल नहीं था।

एक दशक पहले मैं बिठूर (कानपुर) गया। वहा एक मंदिर के पुजारी ने मुझे एक विशाल पुराना पेड़ दिखाया। उसका कहना था कि भगवान राम के पुत्र लव व कुश ने उनके द्वारा छोड़े गए घोड़े को पकड़कर इसी पेड़ से बांधा था। यह घोड़ा अश्वमेघ यज्ञ के कारण छोड़ा गया था। वह पेड़ काफी पुराना था व उसकी एक डाल सुख गई थी। यह जानकर मुझे बहुत अच्छा लगा कि मैं जिस कानपुर में रहता था वह उस बिठूर के इतना करीब है जहां कभी लव व कुश रहते थे व उन्होंने राम का घोड़ा पकड़ लिया था। अपनी इस याद को ताजा रखने के लिए मैंने मौका मिलते ही पेड़ की उस सूखी डंडी को तोड़ लिया। दिल्ली लाकर उसे एक खोल में मढ़वा दिया। जब जनसत्ता में नौकरी की तो सिखों को कवर करता था। एक बार एक सिख नेता ने मुझे एक विशेष खबर देने का दावा करते हुए मुझे अपने फोटोग्राफर के साथ गुरूद्वारे पहुंचने के लिए कहा। जब मैं वहां पहुंचा तो देखा कि गुरू पर्व पर नगर कीर्तन निकलने वाला था। भीड़ में सबसे आगे कुछ घोड़े चल रहे थे। जब घोड़ों ने लीद की तो भीड़ में शामिल कुछ महिलाओं ने उसे उठाकर सम्मानपूर्वक अपनी साड़ी के पल्लू में लपेट लिया। उन सिख ने मुझे बताया कि यह घोड़ा बहुत पवित्र है यह तो गुरुनानक जी के घोड़े के वशंज हैं। इसलिए इनका इतना अधिक सम्मान हो रहा है।

एक बार मैंने टीवी पर अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन को किसी सभा में यह कहते हुए सुना था कि अगर आपको अपने खानदान का पता लगाना हो तो चुनाव लड़ लेना चाहिए। आपके विद्रोही तो आपकी तीन पीढ़ियों का इतिहास निकाल लाएंगे। आज भी यही कुछ है। यह सब देखकर मुझे अपने अभिन्न मित्र छोटे के दिवंगत पिता की एक बात याद आती है। हमारे एक साथी बैंक में कैशियर की नौकरी करने लगे। उन दिनों बैंक की नौकरी बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती थी। वह मिठाई लेकर मित्र के घर यह शुभ संदेश देने पहुंचा। जब उसने पापाजी को मिठाई सौंपकर खुशी की वजह बताई तो उन्होंने छूटते ही कहा तो अगर हम चार बजे बैंक से पैसा निकालने जाए तो तुम हमें भुगतान कर दोंगे? उन दिनों दो बजे तक ही भुगतान होता था। तब मैंने पापाजी के नाम से एक उक्ति गढ़ दी कि ‘हमें क्या फायदा’। आज वह उक्ति फिर से याद आ रही है। ऋषि कुछ भी हो जाए उनसे खुद को जोड़ने का हमें क्या फायदा।

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