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मुद्दे से भटकी बात

रुपया डॉलर से कमजोर हुआ है, लेकिन साथ ही वह पाउंड, यूरो और येन की तुलना में मजबूत हुआ है। लेकिन यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संतोष का पहलू नहीं हो सकता।

बेशक वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने डॉलर की तुलना में रुपये की ताकत पर हलकी बात कही। हलकी इसलिए कि उसमें कोशिश समस्या को हलका करके दिखाने की थी। लेकिन इसमें कोई हैरत की बात नहीं है, क्योंकि वर्तमान सरकार समस्या चाहे जो भी हो, पहले तो उसे स्वीकार नहीं करती- या करती है तो उसके भीतर सकारात्मक पहलू ढूंढने की कोशिश करती है। इसलिए ऐसे बयानों पर देश में कड़ी प्रतिक्रिया होना स्वाभाविक है। मगर दिक्कत यह यह कि जो सरकार विरोधी खेमा है, वह इस पर गंभीर विमर्श करने के बजाय जुमले का जवाब जुमले से देने में लग जाता है। वह अपनी पूरी प्रतिभा उस टिप्पणी पर कटाक्ष करने में लगा देता है। वित्त मंत्री ने कहा कि रुपया कमजोर नही हुआ है, बल्कि डॉलर मजबूत हो रहा है। तो सरकार विरोधी लोगों ने इस पर अपनी पूरी प्रतिभा तरह-तरह के जुमलों से इसका मजाक उड़ाने में लगा दी। जबकि सरकार समर्थक लोगों के पास ऐसे जुमलों का जवाब देने के तर्क हैं।

मसलन, यह तो सच है कि रुपया डॉलर से कमजोर हुआ है, लेकिन साथ ही वह पाउंड, यूरो और येन की तुलना में मजबूत हुआ है। लेकिन यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संतोष का पहलू नहीं हो सकता। अगर दुनिया का ज्यादातर कारोबार डॉलर में होता है, तो उसका भुगतान तो डॉलर में ही करना पड़ता है। उसका दुष्प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर हो रहा है। इसलिए रुपये की ऐसी मजबूती मामली फायदे की ही बात है। असल प्रश्न यह होना चाहिए कि अगर डॉलर मजबूत हो रहा है और उसके दुष्प्रभाव हमें झेलने पड़ रहे हैं, तो इस समस्या से निपटने की सरकार की क्या रणनीति है? डॉलर के बाहर रहते हुए अंतरराष्ट्रीय व्यापार करने की चल रही कोशिशों पर उसकी क्या है और क्या वह इसे एक उचित प्रयास रूप में देखती है? बहस इन प्रश्नों पर होनी चाहिए। इन सवालों पर विपक्ष की राय भी पूछी जानी चाहिए, क्योंकि वह भी आलोचना के अलावा कोई समाधान प्रस्तुत करने में अब तक विफल रहा है। दुनिया में एक गंभीर मसला खड़ा हुआ है और जरूरी इस बात की है कि हर पक्ष उसे उतनी ही गंभीरता से ले।

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