सब देख सुन मन विरक्त

कोरोना काल में उसकी विभीषिका से गुजरे मेरे दो अभिन्न लोगों ने मुझे जो कुछ आप बीती सुनाई तो उन बातों को सुन मुझे आत्म ज्ञान मिला है। मेरी दोनों आंखे खुल गई है। जब व्यासजी द्वारा संतोष भारतीय को दिए इंटरव्यू के बाद उनकी बेबाकी की तारीफ करने वालों के मेरे पास फोन आने शुरु हुए तो मैंने उन मित्रों से भी बहुत बात की।  आमतौर पर व्यासजी को जानने वाले पत्रकार व अहम नेता आदि जब उनके बारे में अपने विचार प्रगट करना चाहते हैं तो उनसे सीधे बात करने की बजाय उसे मेरे कानों तक पहुंचा देते हैं।

व्यासजी से फोन पर बातचीत के दौरान उन्होंने व भाभीजी ने बताया कि नीरज शर्मा वायरस से बीमार है व कुछ रोज पहले ही अस्पताल से वापस घर आया है तो मुझे हैरानी हुई। आमतौर पर नीरज मुझे नियमित रुप से बताता रहता था कि वह आज कल क्या कर रहा है। काफी दिनों से उसकी कोई खबर नहीं आयी थी। जब उससे बात हुई तो नीरज ने बताया कि उसे गंभीर रुप से कोरोना हो गया था। वह किसी सरकारी बैठक में हिस्सा लेने गया था। वहां उसे बुखार महसूस होने पर अपनी जांच करवाई तो पता चला कि उसे कोरोना हो गया है व ऐसा हुए काफी समय बीत चुका है। वह अस्पताल में भरती हुआ व लंबी अवधि तक वहां रहने के बाद कुछ समय पहले ही वहां से डिस्चार्ज होकर घर आया है।

उसने जब पूरे परिवार का परीक्षण करवाया तो पता चला कि उसकी पत्नी व हमारी भाभीजी को भी कोरोना हो गया था। आज कल वह घर पर ही एकांतवास में रह रहा है। मगर उसने अपने कोरोना काल के बारे में जो कुछ बताया वह उल्लेखनीय है। मैंने कई बार लिखा था कि नीरज अपने इलाके के लोगों को इंसाफ दिलवाने के लिए आज कल पूजा पाठ कर रहा है। श्रमिक बाहुल्य फरीदाबाद के एनआईटी (फरीदाबाद) से कांग्रेस की टिकट पर विधायक चुना गया है।

नीरज ने पहले अपने इलाके के फैक्टरी मालिकों को सदबुद्धि देने की लिए रामचरित मानस व सुंदरकांड का पाठ करवाया था। नीरज बताता है कि उसने बीमारी के दौरान अस्पताल में अपने ये पाठ जारी रखे। कोरोना काल के दौरान उसने अपने इलाके के लोगों के बीच राशन व खिचड़ी के अलावा चेहरे पर लगाए जाने वाले मास्क भी बंटवाए थे। उसकी पूजा पाठ काम आयी व बहुत बड़ी तादाद में छंटनी किए गए कामगारों को उनकी कंपनी ने वापस काम पर ले लिया गया।

वह बताता है कि इस दौरान उसे जितनी भी आर्थिक मदद मिली वह सब उसने लोगों में बंटवा दी। वह दावा करता है कि जितना बीमार था उसे देखकर तो यह लगता है उसे लोगों की दुआओं के कारण ही नई जिंदगी मिली है। सांसरिक सुखों की असलियत खुल गई। उसने इस दौरान न तो किसी से कोई धन कमाया और ना ही भविष्य में ऐसा करने का फैसला किया है। उसे पता चल गया कि जीवन तो वास्तव में मिथ्या है। हम बेकार में ही धन संपदा एकत्र करने में व्यस्त रहते हैं जबकि दूसरों की परेशानियां दूर करने में उनकी दुआओं से जो सुख मिलता है वह अतुलनीय है।

वह पहले अक्सर मेरे साथ बैठकर एकाध पैग के साथ बढ़िया नानवेज खा लेता था मगर अब सब कुछ मेरी तरह से ही छोड़ दिया है। मैंने तो यह सब पसंद न आने के कारण छोड़ा है जबकि नीरज ने अपनी अनुभवों के कारण यह कदम उठाया है। मेरा मानना है कि एक नेता व अच्छा इंसान होना दो अलग अलग चीजे हैं। नीरज इसका मिला जुला रुप है। वह स्वभावतः लोगों की काफी मदद करता है व अपने विरोधी तक के प्रति कभी कोई दुर्भावना नहीं रखता है। खुद कांग्रेस में होने के बावजूद सत्तारुढ़ भाजपा सरकार के खिलाफ नहीं बोलता व उनकी मदद के लिए सबसे अच्छे संबंध बनाकर रखता है।

इसका जीता जागता उदाहरण हाल में लोगों की भावना को ध्यान में रखते हुए फरीदाबाद की नए मेट्रो आई तो आमूल चूल परिवर्तन करवाना है। एक पत्रकार के रुप में मेरा मानना है कि किसी की आलोचना करना बहुत आसान होता है मगर जब उसके बारे में सकारात्मक लिखना हो तो बहुत दिक्कत आती है। इसकी वजह मेरा जिंदगी भर सत्ता विरोधी संगठनों में काम करते रहना है। हो सकता है वह स्वभावतः लोगों की मदद करने के लिए तैयार रहता है व पहली बार की भेंट के दौरान ही ऐसी छाप छोड़ता है कि बार-बार उससे मिलने का मन करता है।

मेरे परिचित तमाम आला अधिकारी जब प्रेस क्लब या घर पर चाय पीने आते तो उनकी वहां नीरज को जरुर बुलवाने की मांग होती। इसकी वजह उसका तर्कसंगत बातें करना व ज्ञानवर्धक समीक्षाएं करना होता था। आज कल हम लोगों का मिलना जुलना बंद है व जब हालात बदले तो एक दिन फिर नीरज समेत तमाम पुराने अभिन्न मित्रों को घर पर बुलाकर चाय पिलाऊंगा। उसने हमें सिखा दिया कि आज जो हालात है उसमें केवल ईश्वर ही हमारी मदद कर सकता है व इस हालात में भी लोगों की मदद करने से पीछे नहीं हटना चाहिए।

इसका अनुभव मुझे मेरे बचपन के दोस्त छोटे से हुआ। छोटे या राघवेंद्र वाजपेयी से मेरी मित्रता तब हुई थी जब मैं नवीं कक्षा में पढ़ता था। हमारे साथ उनके बड़े भाई रवीद्र भी पढ़ते थे। हमारी दोस्ती इतनी बढ़ी कि हम एक दूसरे की काफी करीब आ गए। साथ-साथ सायकिलों पर स्कूल जाने, साथ में लंच करने व खेलते कूदते थे। मुझे याद है कि जब नवीं की गर्मियों की छुट्टियां हुई तो लखनऊ स्थित अपनी नानी के घर छुट्टियां बिता कर लौटते समय छोटे मेरे लिए एक पहिएदार तोप का खिलौना लाया था। जाहिर है उसे अपनी जेब खर्च की रकम बचाकर ही खरीदा होगा।

जब मेरे माता पिता अपनी बीमारी के कारण कानपुर से दिल्ली इलाज के लिए मेरे भैय्या के पास रहने लगे थे तब छोटे मेरे साथ घर पर ही रहने लगा व हम लोग मिलकर खाना बनाते व उसके बड़े भाई के पेसिंल बाक्स में रखे गए 20-20 पैसे के सिक्के चोरी कर हलवाई की दुकान पर जाकर उनसे समौसे व जलेबी खाते थे। कानपुर के एक केंद्र सरकार के कार्यालय में अफसर छोटे की पत्नी हमारी भाभीजी की अचानक बीमार पड़ने की खबर आयी। इससे पहले कैंसर व फिर कोरोना हो गया।

मैंने उनकी बीमारी व इलाज के दौरान पेश आयी दिक्कतों पर दिल्ली में अपने मित्रों द्वारा मिली मदद के बारे में लिखा था। मगर आज जब उससे फोन पर बातें सुनी तो मन बहुत विचलित हो गया। भाभीजी उसका बेहद ध्यान रखती थी। कानपुर में 500 गज में उसकी विशाल कोठी है। जहां वह अकेला रह जाएगा। उसकी एक बेटी नोएडा में शादी के बाद पति के साथ रह रही है व दूसरी अमेरिका में है। सबसे छोटा बेटा कुछ दिनों बाद अपनी पढ़़ाई के लिए जर्मनी जाने वाला है।रिटायरमेंट के बाद छोटे को उसके दफ्तर ने सलाहकार के रुप में नौकरी दे दी थी। मगर उसने अब अपना इस पद से इस्तीफा दे दिया है। उसका कहना है कि अब उसका दुनिया से मन भर गया है। वह यह नहीं सोच पाता कि भाभीजी के जाने के बाद व दफ्तर आते जाते समय वहां दरवाजा बंद करवाने, ताला लगाने व खोलने का काम करेगा। उसे कुछ खाना बनाना भी नहीं आता है।

सबसे बड़ी समस्या तो उसके बच्चों के व्यवहार में आया परिवर्तन है। उसने दुखी होकर बताया कि उसकी दोनों बेटियों का उसके प्रति व्यवहार बदल गया है। उसकी मां की मौत के लिए वे लोग उसे जिम्मेदार ठहराते हैं। हाल में जब उसके खानदानी पंडित घर में गरुड़ पुराण का पाठ कर रहे थे तो उसकी बेटी ने उन्हें टोकते हुए कहा कि वह गलत पढ़ रहे हैं। उसकी बेटी ने उपनिषद पढ़ रखा है। घर आए मेहमान वह भी पंडित से इस तरह से बातें करना उसे अच्छा नहीं लगा व उसका मन टूट गया। जिस परिवार व घर का वह खुद को मालिक समझता था वह आज उससे दूर जाता प्रतीत हो रहा है।

उसने कहा कि जब पत्नी मरती है तो घर व परिवार टूट जाता है। मगर जब पिता मरता है तो परिवार को आर्थिक दिक्कतों का सामना करना पड़ता है। वह अब चाहते है कि किसी तरह से पत्नी की तेरहवीं का मामला निपट जाए उसके बाद उसने अपना जीवन कुछ अलग तरह से बिताने का निर्णय लिया है। वह कहता है कि बच्चों के चले जाने के बाद वह शहर के वृद्धाश्रम में जाकर लोगों की मदद करना चाहता है व उन्हें दवाएं व कपड़े आदि प्रदान कर उनकी सेवा करेगा।जो कुछ हो रहा है उसे देखकर उससे लगने लगा है कि जीवन तो एक मिथ्या है। सब कुछ भ्रम के अलावा कुछ भी नहीं है। अब उसकी खबर आयी है कि उसका बेटा जो कि आगे की पढ़ाई के लिए जर्मनी जाने वाला था अचानक घर से नाराज होकर कहीं बिना कुछ बताएं चला गया है। इस बारे में उसकी दोनों बड़ी बहने भी जवाब नहीं दे रही है। अभी तक भाभीजी की तेरहवीं नहीं हुई है व घर के हालात बहुत खराब हो चुके हैं। जब मैंने उसे इस पूरे प्रकरण के बारे में एसएमएस किया तो उसका इतना ही जवाब आया कि जो है वह रामजी की इच्छा। सब देख सुनकर दुनिया से मन पूरी तरह से विरक्त हो गया है।

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