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संघ परिवार: संगठन या सराय?

तो यह संगठन किस का है, जिसे हिन्दू समाज पर पड़ती चोटों से तिलमिलाहट नहीं होती? उत्तर है – केवल अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं का, बस अपना हितचिंतक। तुलना करें:  चर्च, इस्लामी हितों को छूते ही देश में छोटे-बड़े क्रिश्चियन/मुस्लिम नेता फौरन, सड़क से संसद, हर जगह चीखते-चिल्लाते सिर पटकते हैं। बेपरवाह कि उन के पास क्या संगठन, कितने सांसद, विधायक हैं या नहीं हैं। वे सीधे अपने को झोंकते हैं।

संघ परिवार का सारा जोर ‘संगठन’ पर है। शाखा, प्रकल्प, सम्मेलन, संस्थान, भवन, आदि। किन्तु इन के कामों में कोई एकता या संगति शायद ही होती है। एक उदाहरण उन के नेताओं में परस्पर अविश्वास-ईर्ष्या-द्वेष भी है। मानो वे किसी सराय में हों। जहाँ अलग-अलग लोग अपने-अपने अच्छे, बुरे, अनर्गल काम करते रहें। संघ को ‘परिवार’ कहना भी वही है। आखिर मोहनदास, देवदास, हरिलाल, तीन तरह के चरित्र एक ही परिवार के थे।

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फिर, संघ ‘हिन्दू’ संगठन होने से इंकार करता है। अपने को ‘राष्ट्रीय’ कहते हुए मुसलमानों का भी नेता होने का मंसूबा पालता है। जो गाँधीजी ने किया था और हिन्दुओं को अपनी जेब में समझा था, कि ये कहाँ जाएंगे! इस प्रकार, हिन्दू समाज बिलकुल नेतृत्व-हीन है। इसीलिए हर चोट असहाय झेलता है। उस का बचाव कोई नहीं करता। जबकि इसी काम से संघ का आरंभ हुआ था। पर उस से संघ बहुत पहले दूर हट चुका। यहाँ तक कि हिन्दू-शिक्षा के विध्वंस, और मंदिरों पर सरकारी कब्जे पर भी चुप रहा। बल्कि अब संघ सत्ताधारी भी वही विध्वंस/कब्जे कर रहे हैं। वे दमकते मुँह से कहते हैं: ‘‘हम ने पाठ्य-पुस्तकों का एक पन्ना भी नहीं बदला’’। बल्कि बाकायदा वही नीति बना ली! उन्हें यह चेतना भी न रही कि अपने बाल-बच्चों की शिक्षा व धर्म भी नष्ट कर रहे हैं। संघ के नेता कहते हैं: ‘हम ने हिन्दुओं का ठेका नहीं ले रखा’। वे अपने को हिन्दुओं से अलग, ऊपर समझते हैं!

इसीलिए, 1990-91 में कश्मीर से हिन्दुओं को सामूहिक मार भगाने के दौरान कोई हस्तक्षेप नहीं हुआ। तब भी केंद्रीय सत्ता संघ-भाजपा के बल पर चल रही थी। वहाँ दर्जनों मंदिरों के विध्वंस पर भी चुप्पी रही। वैचारिक क्षेत्र में भी, ‘मनुस्मृति’ जलवाने वालों से किसी संघ-भाजपा नेता को प्रतिवाद करते नहीं देखा गया।

तो यह संगठन किस का है, जिसे हिन्दू समाज पर पड़ती चोटों से तिलमिलाहट नहीं होती? उत्तर है – केवल अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं का, बस अपना हितचिंतक। तुलना करें:  चर्च, इस्लामी हितों को छूते ही देश में छोटे-बड़े क्रिश्चियन/मुस्लिम नेता फौरन, सड़क से संसद, हर जगह चीखते-चिल्लाते सिर पटकते हैं। बेपरवाह कि उन के पास क्या संगठन, कितने सांसद, विधायक हैं या नहीं हैं। वे सीधे अपने को झोंकते हैं। पुलिस, जेल, फटकार, साधन-अभाव, आदि किसी आंशका या बहाने से चुप नहीं बैठते।

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मगर संघ-परिवार सभी कठिन मौकों पर नदारद मिलता है। बोलने से भी कतराता। गत वर्ष शाहीनबाग कब्जे के दौरान हजारों-हजार लोग महीनों परेशान रहे। सैकड़ों की रोजी-रोटी चली गई। कुछ हिन्दू मारे भी गए। मुद्दा इस्लामी-विशेषाधिकार का दावा ही था। पर संघ-भाजपा नेताओं, उन के सैकड़ों सांसदों में कोई एक दिन वहाँ झाँकने भी न गया! ठीक राजधानी में, जहाँ उन के सारे आला साहबान हैं। अगर यह हिन्दुओं का नेतृत्वहीन, अपने हाल पर रहना नहीं, तो क्या है?

किन्तु वही संघ-संगठन भूकंप, तूफान में खाम-खाह राहत करने की फोटो दिखा अपना गाल बजाते हैं। जबकि उस में सरकार समेत कई संस्थाएं पहले से लगी रहती हैं। यानी, संघ परिवार *निरापद* काम के बहाने आत्म-प्रचार के मौके ढूँढता है। ‘मानवीय’ प्रवचन करते हुए ‘हिन्दू’ मुद्दों से बचता है। यानी, राजनीतिक हमला, खतरा आम हिन्दू खुद झेले। उस से दूर रहकर संघ-भाजपा सस्ती वाहवाही की फिराक में कहीं और घूमते रहे। ऐसी बाल-बुद्धि राजनीति की लज्जा कब तक छिपी रहेगी?

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निस्संदेह, चेतना के बिना ‘संगठन’ के सदस्य, भवन, पद-कुर्सियाँ बेकार हैं। दशकों विविध राज्यों और तेरह-सोलह साल केंद्रीय सत्ता में संघ-परिवार का रिकॉर्ड भी यही दिखाता है। उन के सारे काम, अपने ही शब्दों में ‘इंडिया शाइनिंग’, ‘विकांस’, ‘दलितों का हित’, ‘अल्पसंख्यकों की उन्नति’, ‘स्वच्छता’, ‘बेटी बचाओ’, बैंक-एकाउंट देना, आदि हैं। यानी जो सब करने को सभी दल तत्पर हैं। अब तो संघ-भाजपा समर्थक अपने नेताओं की ‘ईमानदारी’ के सिवा किसी विशेषता का नाम भी नहीं लेते। यद्यपि वह भी पार्टी-चंदों के स्त्रोत छिपाने की जिद, चुनावी बाँड, अंधा-धुंध दलबदल कराने, आदि से संदिग्ध है।

बहरहाल, बिना आत्मबल विशाल संगठन के पतन का उदाहरण सोवियत संघ की कम्युनिस्ट पार्टी भी है। इस के पास दशकों तक अतुलनीय सत्ता, संसाधन, सदस्य थे। विश्व का विशाल भूभाग, सर्वोत्तम सेना-हथियार, पूरी दुनिया में एजेंट, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो-पावर, आदि इस के पास इतना कुछ था जो इतिहास में किसी के पास कभी न रहा। पर 1980 दशक में जब उसे नैतिक चुनौती मिली, तो सब धरा रह गया! मॉस्को में मुट्ठी भर मामूली लोगों ने उसे भंग करने की माँग की, और करोड़ों सदस्यों वाले ‘संगठन’ के मुँह से चूँ तक न निकली। बिना एक भी गोली चले वह महान पार्टी धराशायी हो गई।

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अतः वास्तविक बल विचार ही है। वही संगठन चलाता है। जैसे ट्रक को ड्राइवर चलाता है। ट्रक में टायर छः हों या छत्तीस, वे कुछ तय नहीं करते। जो टायर हैं, वे टायर ही रहेंगे। 1951 में जनसंघ पार्टी बनाते हुए श्यामा प्र. मुखर्जी ने उस का उद्देश्य ‘हिन्दू राष्ट्र’ लिखा था। पर संघ के एक नेता ने उसे हटा दिया, ताकि नेहरूजी नाराज न हों! उसी तरह, एक नेता की मर्जी से 1980 में भाजपा का उद्देश्य ‘गाँधीवादी समाजवाद’ बन गया, जिस का सिर-पैर अज्ञात है। उस का नाम कभी भाजपाई भी नहीं लेते! अब कुछ समय से किसी की तरंग से भाजपा का नारा ‘कांग्रेस-मुक्त भारत’ हो गया। जरा खोजिए: किस संगठन समिति ने ऐसा मूढ़ नारा तय किया?  कल छोड़िए, आज ही इस की जिम्मेदारी लेने वाला नहीं मिलेगा।

यह विचार-हीन संगठन की दुर्गति है। उन के नेता मनमर्जी चलते हैं। कुर्सी पर बैठे रहने के सिवा कोई निश्चित विचार नहीं। इसलिए इस्लामी वामपंथी मतवादों की सेवा और नकल करते हैं। अपनी मतिहीनता छिपाने हेतु हिन्दू समाज, हिन्दू विद्वानों, संतो-साधुओं तक को फटकारते हैं। उन्होंने सीताराम गोयल को ‘अमेरिकी एजेंट’ कहा था। जैसे आज भी स्वतंत्र लेखकों को अपशब्द कहते हैं। ताकि इस्लामी आतताइयों पर चादर चढ़ाना, ‘सुन्नी सूफियों’ को विविध उपहार, विश्वविद्यालय, आदि देना, ‘मुहम्मद के रास्ते पर चलने’ की नसीहत, ‘विकास से सब समस्याओं का समाधान’, ‘संविधान ही धर्मग्रंथ’ बताना, हिन्दू-तोड़क नीतियाँ, आदि बेखटके चलती रहे। उन की सारी कथनी-करनी में हिन्दू हित नदारद हैं।

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एक पुराने स्वयंसेवक डॉ. नीलमाधव दास के अनुसार कोई पुस्तक या घोषणापत्र नहीं, जो संघ का सिद्धांत-उद्देश्य हो। फलतः कोई नेता उसे इधर, तो कोई उधर खींच लेता है। लफ्फाजी, प्रलोभन, या भय से कार्यकर्ता जयकार भी करते रहते हैं। पर नेता के हटते, या कोई नया फन्ने खाँ उभरते ही, पिछले को बुरा-भला कहने में उन्हें संकोच नहीं होता। आज अडवाणी-जोशी को कौन पूछता है?  बलराज मधोक को कौन याद करता है? क्योंकि पैमाना सत्ता है, कोई सिद्धांत नहीं।

ऐसा संगठन समाज के लिए निरर्थक, भ्रामक है! कभी भी कोई आत्मबली दुश्मन सर्वस्व छीन ले जा सकता है। जैसे जिन्ना ले गए थे। पूरे भारत में कांग्रेस संगठन और गाँधी-नेहरू लोकप्रियता से सिन्ध, पंजाब, कश्मीर, बंगाल के करोड़ों हिन्दुओं, संस्थाओं का कुछ नहीं बचा! वही दुर्दशा स्वतंत्र भारत में बचे-खुचे कश्मीर में हुई। अब पूर्णिया, मालदा, कैराना, मराड, गोधरा, जैसे असंख्य क्षेत्रों में हो रही है। ठीक दिल्ली में कई मुहल्ले हिन्दू-विहीन हो गए। अधिकांश तो राज्य में भाजपा शासन के दौरान हुए! इन बातों पर कोई विचार-विमर्श भी हुआ? उपाय तो दूर रहा।

संपूर्ण अतीत-वर्तमान छिपाकर ‘संगठन’ का दंभ पालना खुद और समाज को भुलावे में रखना है। उस भयंकर फन्दे की ओर बढ़ना है जिस की चेतावनी सीताराम जी ने दी थी। हिन्दुओं के शत्रु अपने सिद्धांत पर टिके सक्रिय हैं। संघ-भाजपा सत्ताधारी भी उन से दबे-दबे रहते, उन्हें खुश रखने की तरकीबें करते, बातें बदलते रहते हैं। तब बड़ा कौन – संगठन या सिद्धांत?

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पूरे इतिहास का सबक यही कि विचार और विवेक सर्वोपरि है। इन गुणों से हीन संगठन किसी के भी सामने झुकने के लिए अभिशप्त है। चाहे वह अपना हो या पराया।

By शंकर शरण

हिन्दी लेखक और राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। जे.एन.यू., नई दिल्ली से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी पर पीएच.डी.। महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में राजनीति शास्त्र के पूर्व-प्रोफेसर। ‘नया इंडिया’  एवं  ‘दैनिक जागरण’  के स्तंभ-लेखक। भारत के महान विचारकों, मनीषियों के लेखन का गहरा व बारीक अध्ययन। उनके विचारों की रोशनी में राष्ट्र, धर्म, समाज के सामने प्रस्तुत चुनौतियों और खतरों को समझना और उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए लेखन का शगल। भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन, मुसलमानों की घर वापसी; गाँधी अहिंसा और राजनीति;  बुद्धिजीवियों की अफीम;  भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद; जिहादी आतंकवाद;  गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग;  आदि कई पुस्तकों के लेखक। प्रधान मंत्री द्वारा‘नचिकेता पुरस्कार’ (2003) तथा मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नरेश मेहता सम्मान’(2005), आदि से सम्मानित।

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