विश्व जनमत के कठघरे में

डॉनल्ड ट्रंप की हार और जो बाइडेन की जीत के बाद दुनिया के अलग- अलग हिस्सों में अमेरिकी विदेश नीति में संभावित बदलाव को लेकर कयास लगाए जा रहे हैं। उन देशों में फिक्र खास बढ़ी है, जिनके नेताओं ने ट्रंप के साथ निजी निकटता बनाकर मानवाधिकार जैसे मुद्दों को लेकर अपने ऊपर पड़ने दबावों से अपने को मुक्त रखा था। इन देशों में सऊदी अरब है। उससे तुरंत ये ताप झेलनी पड़ रही है। वजह जी-20 देशों का दो दिवसीय शिखर सम्मेलन है, जो शनिवार से शुरू हो रहा है। इसकी मेजबानी सऊदी अरब करेगा, हालांकि कोरोना महामारी को देखते हुए सम्मेलन वर्चुअल होगा। इस संगठन में दुनिया के सबसे अमीर और उभरते हुए देश शामिल हैं। जी- 20 सम्मेलन में कोरोना महामारी से लेकर जलवायु परिवर्तन और बढ़ती असमानता तक कई मुद्दों पर चर्चा होगी। सम्मेलन में महामारी से बेहाल विश्व अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के बारे में भी बातचीत होगी।

मेजबान होने के नाते सऊदी शाह सम्मेलन की अध्यक्षता करेंगे। यमन में जारी युद्ध और अपने मानवाधिकार रिकॉर्ड समेत कई मुद्दों पर आलोचना झेल रहा सऊदी अरब कूटनीतिक नजरिए जी-20 की मेजबानी को बहुत अहमियत दे रहा है। मगर मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सऊदी जेलों में रखे गए कार्यकर्ताओं के रिश्तेदारों ने मांग की है कि मानवाधिकारों के हनन से जुड़े मुद्दे को लेकर सऊदी अरब पर अवश्य दबाव डाला जाए। पिछले महीने यूरोपीय सांसदों ने भी एक प्रस्ताव पास कर सऊदी अरब में मानवाधिकारों की खराब स्थित पर चिंता जताई थी। कुछ अमेरिकी सांसदों ने भी इस बारे में अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉम्पियो को पत्र लिखा था। उनकी मांग है कि सऊदी अरब जेल में बंद कार्यकर्ताओं को रिहा करे। उन्होंने यमन में जारी सैन्य अभियान को भी खत्म करने की मांग की है। साथ ही 2018 में इस्तांबुल के सऊदी वाणिज्य दूतावास में पत्रकार जमाल खशोगी की हत्या के मामले में भी जवाबदेही तय करने की मांग उठाई गई है। हाल के समय में सऊदी अरब ने अपनी रूढ़िवादी समाज की छवि को तोड़ने कई सुधार किए हैं। लेकिन लगता नहीं कि इससे वो मानवाधिकारों के मसले पर दुनिया को भरमा पाया है। साफ है, अब वह विश्व जनमत के कठघरे में है। लेकिन इससे उसका कुछ बिगड़ेगा, इसकी संभावना कम है। आखिर दुनिया में चीजें वैश्विक शक्ति संतुलन तय होती हैं, और वह फिलहाल सऊदी अरब के पक्ष में है।

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