पाक की मंशा पर पानी

कश्मीर मुद्दे पर सऊदी अरब की प्रतिक्रिया शुरुआत से नरम है। भारत इसका लाभ उठा सकता था, लेकिन इसकी कोई गंभीर कोशिश हुई, उसके संकेत नहीं हैं। बहरहाल, यह साफ है कि पाकिस्तान की मंशाएं सऊदी अरब ने पूरी नहीं होने दी है। इसका यह भी मतलब है कि कश्मीर मसले पर अंतरराष्ट्रीय जगत में जितनी प्रतिकूल प्रतिक्रिया हुई है, उसे पाकिस्तान की कामयाबी के रूप में नहीं देखा जा सकता। बल्कि यह भारत की विफलता है। फिलहाल सऊदी अरब के शहर जेद्दाह में नौ फरवरी को होने वाले ओआईसी मंत्रिपरिषद के सम्मेलन की तैयारियां जारी हैं। लेकिन खबरों के मुताबिक सऊदी अरब नहीं चाहता कि कश्मीर के मुद्दे पर ओआईसी के विदेश मंत्रियों की बैठक बुलाई जाए। वह पाकिस्तान की इच्छा के विपरीत इस मुद्दे पर दूसरे प्रस्ताव दे रहा है। ऐसे में इस बात की कोई संभावना नहीं है कि सम्मेलन का कोई सत्र कश्मीर पर हो, जिसकी मांग पाकिस्तान कर रहा है। पाकिस्तान में विदेश मामलों के कई जानकारों ने सऊदी अरब के रवैये पर अफसोस जताया है और सरकार से मांग की है कि वह सऊदी अरब के साथ अपने रिश्तों की समीक्षा करे। पाकिस्तान को अगर किसी देश से खास समर्थन मिला है तो वह मलेशिया है। मलेशिया ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर कश्मीर को उठाने की वजह से आर्थिक नुकसान भी उठाया है। मगर मलेशिया कश्मीर पर अपने रुख से पीछे नहीं हटा। भारत ने उससे तेल लेना बंद कर दिया, लेकिन उसने पाकिस्तान की मदद की। इसी तरह तुर्की ने भी पाकिस्तान के रुख का समर्थन किया है। ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) में दुनिया के 57 मुस्लिम देश शामिल हैं। सऊदी अरब के जेद्दाह में इसका मुख्यालय है। इस संगठन का मकसद अंतरराष्ट्रीय मंच पर मुस्लिम देशों की एक सामूहिक आवाज बनना है, लेकिन कई मुद्दों पर इस संगठन में मतभेद साफ नजर आते हैं। हाल में तुर्की, मलेशिया और पाकिस्तान मिलकर एक नई धुरी बनने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन सऊदी अरब ओआईसी के समांतर किसी अन्य संगठन के विचार को पसंद नहीं कर सकता। इसीलिए सऊदी अरब के दबाव में पाकिस्तान ने मलेशिया में होने वाले सम्मेलन से हाथ खींच लिया। सऊदी अरब पाकिस्तान को बहुत मदद देता रहा है, लेकिन कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान के बहुत से लोग सऊदी अरब के रुख से मायूस हैं। यह भारत के लिए राहत की बात है।

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