इजरायल-यूएई समझौता और अरब देशों की परेशानी - Naya India
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इजरायल-यूएई समझौता और अरब देशों की परेशानी

दशकों तक इजरायल को अपना कट्टर दुश्मन मानते आए दुनिया के पाकिस्तान समेत तमाम इस्लामी राष्ट्र इस समय इजरायल व संयुक्त अरब अमीरात के बीच हुए शांति समझौते को लेकर काफी परेशान हैं। इस समझौते के बाद दोनों देश आपसी दुश्मनी भुला कर अपने बीच कूटनीतिक संबंध स्थापित करने के लिए तैयार हो गए हैं। इजरायल द्वारा उठाया गया सबसे बड़ा कदम यह है कि वह लंबे अरसे तक वेस्ट बैंक को अपना क्षेत्र मानते हुए अपने देश का आधिकारिक हिस्सा बनाने के लिए कटिबद्ध नजर आ रहा था, लेकिन उसने फिलहाल यह इरादा स्थगित कर दिया है।

पाकिस्तान के अखबारों व उनमें छपने वाली रिपोर्टों को पढ़ कर पता चलता है कि वहां के लोग इस शांति समझौते को लेकर बहुत नाराज हैं। उनके लिए मानों यह समझौता अंतरराष्ट्रीय खास कर खाड़ी जगत में बाबरी मस्जिद बन चुके वेस्ट बैंक को लेकर हिंदू व मुसलमानो में समझौता कर लेने जैसा कदम है। पाकिस्तान के आम आदमी को सबसे ज्यादा दुख इस बात का है कि उसके आका रहे सऊदी अरब समेत खाड़ी के तमाम इस्लामी देशों ने इस समझौते का विरोध क्यों नहीं किया है, जबकि वे लोग हमेशा इजरायल विरोधी रहे हैं।

ऐसा सोचते समय वे लोग यह भूल जाते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में मध्य-पूर्व में जिस तरह से इस्लामिक स्टेट का उभार हुआ उसके साथ ही राजनीतिक बदलाव की आंधी चली, उससे वहां का राजनीतिक नक्शा व सोच बदल गई है। तभी अरब देशों को यह महसूस होने लगा है कि उन्हें इजरायल से कहीं ज्यादा अपने पड़ोसी इस्लामी देशों से खतरा है। इराक-सीरिया के बीच चल रहा टकराव इसका नवीनतम उदाहरण है। पाकिस्तान को सबसे ज्यादा धक्का इस्लामी देशों के अंतरराष्ट्रीय संगठन ओआईसी की चुप्पी से लगा है। अरब संगठन के लिए इजरायल तो वैसा ही रहा जैसे कि पाकिस्तान के लिए जम्मू कश्मीर। पर इन देशों ने कश्मीर से लेकर इजरायल तक में शांति समझौते पर चुप्पी ठान ली। उसका अब तक यह मानना रहा था कि इजरायल के कब्जे वाले इलाके में फिलस्तीनी लोग दमन व आतंक के साये में रह रहे हैं।

मजेदार बात यह है कि परमाणु बम तैयार करने की क्षमता हासिल कर चुका ईरान अब अपने पड़ोसी देशों को ही शक की नजर से देखा जा सकता है। खासतौर पर सऊदी अरब व संयुक्त अरब अमीरात को इजरायल की तुलना में ईरान से कहीं ज्यादा खतरा नजर आता है। सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था तो पूरी तरह से अमेरिका के हाथ में हैं व अमेरिका ईरान को अपना दुश्मन मानता है। इन देशों को लगता है कि इराक में पृथकतावादियों द्वारा द्वारा चलाए जा रहे सशस्त्र संघर्ष के पीछे ईरान का पूरा हाथ है व वह उन्हें इसके लिए पैसा उपलब्ध करवा रहा है। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान पहले कई बार ईरान व सऊदी अरब के बीच शांति वार्ता करवाने के लिए असफल प्रयास कर चुके हैं। कमोबेश इजिप्ट भी तुर्की व लीबिया के साथ बेहद खराब संबंधों का सामना कर रहा है। वहीं कतर सरीखे छोटे देशों का मानना है कि उनके पड़ोसी अरब देश उन पर नजरें लगाए हुए हैं। खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका की मौजूदगी के बावजूद वे कभी भी गड़बड़ी कर सकते हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि अमेरिकी सेंट्रल कमांड कतर द्वारा इजिप्ट में चलाए जा रहे मुस्लिम ब्रदरहुड को मदद देने में तुर्की का साथ देने से उसे शक की नजरो से देख रहा है। इस संगठन द्वारा खाड़ी के क्षेत्र में 2010-12 के बीच लाई गई बदलाव की आंधी राजशाही चलाने वाले परिवारों को आतंकित कर दिया। अब यह संगठन लोकतंत्र लाने की बातें कर रहा है।

वहां फंसा अमेरिका अफगानिस्तान की तरह खाड़ी क्षेत्र से भी.फ्री होकर अपनी जान छुड़ाना चाहता है। मगर ऐसा करने के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कुछ ऐसा करना चाहते हैं कि देश में होने वाले चुनावों के बाद भी वहां अमेरिका के हितों की खबर हो सकें। यहीं बात है कि इजरायल व संयुक्त अरब अमीरात के बीच शांति समझौता करवाने में उनकी अहम भूमिका रही। इसके तहत यह तय किया गया कि इजरायल का अपनी राजधानी के रूप में यरूशलम पर नियंत्रण रहेगा व यरूशलम एकीकृत हो जाए व यह सुनिश्चित किया जाएगा कि इजरायल वेस्ट बैंक में किसी भी फिलस्तीनी को न उजाड़े व न ही उनके घर ध्वस्त करे। इस मुद्दे के कारण दोनों के बीच लंबे अरसे से लगातार टकराव होता आया था। अब दोनों देश एकीकृत यरूशलम को अपना मानते हुए एक साथ जीवन बिताएंगे व उसकी सुरक्षा करना इजरायल की जिम्मेदारी होगी।

इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि फिलस्तीन अपनी सेना नहीं रखेगा। इजरायल वेस्ट बैंक में बने मकानों व दूसरे निर्माण को कानूनीजामा पहनाते हुए उन्हें नियमित कर देगा। मालूम हो कि वेस्ट बैंक की करीब एक तिहाई जमीन पर फिलस्तीनियों ने अपने घर बनाए हुए हैं। इसके लिए अमेरिका नया फिलस्तीन बनाने के लिए उन्हें 50 अरब डॉलर का निवेश उपलब्ध करवाएगा। वह दोनों देशों में अपने दूतावास भी खोलेगा। मजेदार बात तो यह है कि अपेक्षा से विपरीत इस्लामी देशों ने इसका विरोध नहीं किया। जब राष्ट्रपति ट्रंप ने रात्रि भोजन का ऐलान किया तो मंच पर उनके साथ इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के साथ संयुक्त् अरब अमीरात,, ओमन व तहरीन के आला नेता मौजूद थे।

हालांकि अभी तक इजरायल ने फिलस्तीन को एकीकृत भाग में अपने देश के साथ मिलाने का कदम नहीं उठाया है। इस बीच भारत और इजरायल के संबंध बेहतर हो रहे हैं। इसके कारण पाकिस्तान का परेशान होना स्वाभाविक है। वहीं तुर्की के शासक रेटेप ताय्यिप एर्दोआन चाहते हैं कि 14वीं सदी से 20वीं सदी तक पश्चिम एशिया से उत्तरी अफ्रीका तक राज्य कर चुके ऑटोमान साम्राज्य की तरह वे भी इस्लामी दुनिया में खुद को स्थापित कर सकें। बहरहाल, यह समझौता कहां तक सफल होगा, हमें इसे देखना होगा क्योंकि अफगानिस्तान में आतंकवादी संगठनों के साथ हुआ अमेरिका का शांति समझौता बहुत सफल नहीं हुआ है।

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