गोडावण पक्षी को बचाने की सुध

कभी इस बात की कल्पना भी नहीं की थी कि इंसानो की देख-रेख में एक पक्षी के अंडों से 9 चूजे पैदा करने की खबर पढ़ने को मिलेगी। हम पक्षियों को भले ही ज्यादा अहमियत न देते हो मगर यह खबर सचमुच बहुत अहम है। इस पक्षी का नाम द ग्रेट इंडियन बस्टर्ड या गोडावण, सोन चिरैया है। यह पक्षी आमतौर पर हमें गानों व कहानियों में ही सुनने में मिलता रहा है। अब यह चिडि़या विलुप्त होने के कगार पर है। देश के सूखे रेतीले इलाकों में पाई जाने वाली, यह उड़ने वाली दुनिया की सबसे बड़े आकार वाली चिडि़या है जोकि लगभग एक मीटर तक ऊंची व देखने में शुतुरमुर्ग सरीखी होती है। आज दुनिया में सिर्फ 150 चिडि़या ही बची हैं। इसका जमकर शिकार किया जाता रहा है। पहले मुगलो ने इसका शिकार कर इसे खाया। बाबर ने तो बाबरनामा में इसके स्वाद का खासतौर पर जिक्र किया है।

आज भी अरब देशों में माना जाता है कि इसका मांस बहुत स्वादिष्ट होने के साथ-साथ सेक्स शक्ति को बढ़ाता है। कभी यह चिडि़या लाखों की संख्या में पाई जाती थी। मगर जब इंसान इसका शिकार करने में जुट गया तो इसकी संख्या घटकर मात्र 150 रह गई। आमतौर पर यह पक्षी अपनी ही तरह से लुप्तप्राय हो रहे काले हिरण के साथ घूमता पाया जाता है। भारत सरकार ने वन्यजीव संरक्षण कानून 1972 के तहत उसे संरक्षित पक्षी घोषित किया था।

इसकी गर्दन के पंख भी काले होते हैं जोकि टोपी की तरह लगते हैं। यह सूखे इलाको जैसे राजस्थान व गुजरात के रेतीली, कच्छवाले इलाके में रहना पसंद करता है। इन्हें ज्यादा प्यास नहीं लगती है व उसकी कमी यह कीडे खाकर पूरी कर लेते हैं। यह मूंगफली, दालो की फसलो को बहुत स्वाद से खाते हैं। जब इन्हें किसी तरह का खतरा पैदा होता है तो अपने चूंजो के अंडे पंख फैलाकर उनके नीचे छुपा लेते हैं व कई पक्षी मिलकर उनको चारो और घेरा बना लेते हैं। यह बहुत तेजी से दौड़ता है व इस कारण इसका जीप पर चढ़कर शिकार किया जाता है।

इसे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लुप्तप्राय चिडि़या घोषित कर दिया गया था। उसके बाद भारत व पाकिस्तान दोनों ही देश की सरकारों ने इसके शिकार पर रोक लगा दी। पिछले कुछ वर्षों में जब तक भारत ने इसके शिकार पर रोक लगाने के नियम सख्त नहीं बनाए तो अरब देशों के पैसे वाले अपने विमानों पर इसका शिकार करने के लिए राजस्थान पहुंचते रहे व अखबारों में इस तरहकी खबरे छपती रही। पाकिस्तान ने अरबों के साथ अपने संबंधों को मधुर बनाए रखने के लिए सीमित संख्या में इनके शिकार के लाइसेंस जारी किए। पाकिस्तान हर साल 25-30 शिकारी लाइसेंस जारी करता था व एक माह के अंदर 30-40 पक्षी मारे जाते थे। मगर अरब के शाह कई महीने तक इनके आधार पर मनमानी संख्या में गोडावण मारते थे। वे हजारो पक्षी मारकर पकाकर खा जाते थे। वे अपने साथ शिकार करने के लिए प्रशिक्षित बाज लेकर आते थे व उनके जरिए इस पक्षी को मार डालते थे। वे अपने पैसे व रसूख के आधार पर नियम कानूनों की धज्जियां उड़ाते रहे।

गोडावण पक्षी के लुप्तप्राय होने में इंसान की बहुत बड़ी भूमिका रही है। जैसे-जैसे विकास के कारण गांवों, जंगलो में सड़के बनी, बिजली के टावर बने उनके आवास व शिकार की जगह कम होने लगी। यह पक्षी बहुत शर्मीला होता है व ऊंची घास के मैदानो में छिप कर रहता है। घास के मैदान साफ होने लगे। जब राजस्थान में इंदिरा गांधी नहर आई तो इसके आवास की जगह काफी कम हो गई। यह पक्षी जमीन पर घोंसला बनाकर उसमें अपने अंडे देता है। वह साल में एक बार एक अंडा देता है जबकि उसके बच्चे कुत्ते सरीखे जानवरो के शिकार हो जाते हैं व बड़ी संख्या में शिकार के कारण गोडावण की जनसंख्या नहीं बढ़ पाती।

गोडावण प्रोटीन से भरपूर अनाज व कीडे मकौडे खाते हैं। ऐसा माना जाता है कि कृषित बागवानी के क्षेत्र में भारी मात्रा में कीटनाश के इस्तेमाल के कारण इन पक्षियों की अंडा पैदा करने की क्षमता पर भी असर पड़ा है। हाल ही में पर्यावरण व वन मंत्रालय ने इनके संरक्षण के लिए 33 करोड़ रुपए आवंटित किए हैं। जिसकी मदद से जैसलमेर के इनक्यूबेशन सेंटंर(अंडे लेने का केंद्र) स्थापित किया गया। मंत्रालय ने देश में ऐसे 14 स्थानों का पता लगाया है जहां के वातावरण व माहौल के कारण यह पक्षी अपनी तादाद बढ़ा सकेगा।

नर जब 4-5 साल का हो जाता है तब वह बच्चे पैदा करता है जबकि मादा चारसाल की आयु में इसके योग्य बनाती है। एक पक्षी 14-15 साल तक जीता है। पहले यह चिडि़या कच्छ, नागपुर, अमरावती, सोलापुर, बिलारी में काफी तादाद में मिला करती थी। यह पक्षी ज्यादा दूर तक नहीं देख पाता हैं व जंगलों व मैदानों से गुजरनेवाली बिजली के तार इसके लिए जानलेवा साबित होते हैं। यह पक्षी उड़ते समय उनसे टकरा जाता है व घायल होकर मर जाता है।

जैसलमेर में भी काफी पक्षी इनके कारण मारे जाते हैं। अब देखना यह है कि इंसान द्वारा बरबाद की जा रही इस चिडिया को बचाने में इंसानों की कोशिशें कितनी कामयाब साबित होती हैं। एक बारतो इसे हमारा राष्ट्रीय पक्षी तक घोषित किया जाने वाला था। बहुचर्चित पक्षी प्रेमी व विशेषज्ञ डा सलीम अली ने ऐसा करवाने की बहुत कोशिश की थी मगर बोलने व लिखने में होने वाली गलतियों की आशंका के कारण उसकी जगह मोर को राष्ट्रीय पक्षी घोषित कर दिया गया।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Shares