लूली-लंगड़ी सूचना का अधिकार

सूचना के अधिकार पर सर्वोच्च न्यायालय ने जो फैसला दिया है, उसकी इतनी वाहवाही क्यों हो रही है, मुझे समझ में नहीं आया। यह ठीक है कि सर्वोच्च न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय के 2010 के फैसले पर मुहर लगाई

और यह कहा कि अब देश की सबसे बड़ी अदालत और उसके मुख्य न्यायाधीश भी ‘सूचना के अधिकार’ के अंतर्गत होंगे। बस, इसी बात पर सारे अखबार और टीवी चैनल फिदा हो रहे हैं।

मैं भी महान जनसेवक सुभाष अग्रवाल को हार्दिक बधाई देता हूं कि उन्होंने यह याचिका लगाई और वे न्यायपालिका को भी कम से कम औपचारिक तौर पर सूचना के अधिकार के अन्तर्गत ले आए

लेकिन उनकी याचिका का फैसला सर्वोच्च न्यायालय के जजों ने इतनी चतुराई से किया है कि वे अपने बारे में किसी भी सूचना को देने से इंकार कर सकते हैं और

अगर वे देंगे तो, आप घास के ढेर में सुई ढूंढते रह जाएंगे। जजों की नियुक्ति, उनका तबादला, उनकी पदोन्नति, उनकी चल-अचल संपत्ति आदि मामले ऐसे हैं,

जिन पर आप उनसे सवाल तो पूछ सकते हैं लेकिन इन सवालों का जवाब वे यह कहकर टाल सकते हैं कि इनकी वजह से न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निजता भंग हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा है कि वे अपना जवाब देने के पहले सवाल कैसा है, क्यों पूछा गया है, उसका पूछनेवाला कौन है, उसका इरादा क्या है, उससे कोई खतरा तो पैदा नहीं होगा, उसके पीछे जासूसी का इरादा तो नहीं है, इन सब कोणों से भी सोचेंगे।
याने वे चाहें तो अपने ही उक्त फैसले पर पानी फेर देंगे। हमारी अदालत की भी क्या अदा है ? खूब पर्दा है कि चिलमन से लगे बैठे हैं। साफ छुपते भी नहीं, सामने आते भी नहीं। सुभाष अग्रवाल जैसे लोकतंत्र के जागरुक पहरेदारों से मैं उम्मीद करुंगा कि वे अदालतों का ही नहीं, हमारे राजनीतिक दलों का भी पर्दाफाश करें ताकि देश का समाज सही मायनों में स्वच्छ बने।
यदि हमारे न्यायाधीशों और हमारे नेताओं के भ्रष्टाचार को हम उजागर कर सकें तो अगले कुछ ही वर्षों में भारत महासंपन्न और महासबल बन सकता है। यह काम आसान नहीं है। बेहद कठिन है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह लूला-लंगड़ा फैसला देने में भी 8 साल लगा दिए और राजनीतिक दलों ने सूचना के अधिकार के खिलाफ अंगद का पांव अड़ा रखा है।

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