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राजद्रोह-कानूनः लोकतंत्र का कलंक

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sedition law : सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से अपील की है कि वह राजद्रोह के कानून ( sedition law ) को अब खत्म करे। भारतीय दंड संहिता की धारा 124-ए अंग्रेजों ने बनाई थी ताकि किसी भी सत्याग्रही पर बगावत या आतंक का आरोप लगाकर उसे जेल में ठूंस दिया जाए। गांधीजी पर भी यह लागू हुई थी। इसी धारा को आधार बनाकर अंग्रेज सरकार ने बाल गंगाधर तिलक को म्यांमार की जेल में निर्वासित कर दिया था। इस धारा का इस्तेमाल स्वतंत्र भारत में अब भी जमकर इस्तेमाल होता है।

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अंग्रेज तो चले गए लेकिन यह धारा नहीं गई। इस धारा के तहत 2014 से 2019 तक 595 लोग गिरफ्तार किए गए लेकिन उनमें से सिर्फ 10 लोगों को दोषी पाया गया। इसी तरह की एक धारा हमारे सूचना-कानून में भी थी। इस धारा 66 ए को कई साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने रद्द कर दिया था लेकिन पुलिस अपनी आदत से मजबूर है। वह इसी धारा के तहत लोगों को गिरफ्तार करती रहती है। ये धाराएं भारतीय लोकतंत्र का कलंक हैं।

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अभिव्यक्ति की आजादी की हत्या है। हाल ही में पत्रकार विनोद दुआ, आंध्रप्रदेश के दो टीवी चैनलों और मणिपुर के पत्रकार वांगखेम को भी राजद्रोह में आरेाप में फंसाने की कोशिश की गई थी। यदि कोई व्यक्ति किसी नेता या उसकी सरकार के खिलाफ कोई अश्लील, हिंसा-उत्तेजक, दंगा भड़काऊ या अपमानजनक बयान दे या लेख लिखे तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई के लिए दर्जनों तरीके हैं लेकिन ऐसे किसी काम को राजद्रोह कह देने का अर्थ क्या है ? इसका अर्थ यही है कि हमारे नेता अपने को राजा या बादशाह समझ बैठते हैं। जो जनता के सेवक हैं, वे यदि मालिक बन बैठें तो इसे क्या आप लोकतंत्र कहेंगे ?

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सत्ता पक्ष का विरोध करना विपक्ष का राजधर्म है। इस पर यदि आप विपक्षियों को गिरफ्तार कर लेते हैं तो इसका अर्थ क्या हुआ ? आप लोकसेवक नहीं, आप राजा हैं। राजा के खिलाफ बोलना राजद्रोह हो गया। इस तरह के कानूनों का जारी रहना यह सिद्ध करता है कि भारत अब भी औपनिवेशिक मानसिकता में जी रहा है। इस कानून पर पुनर्विचार करने की राय अगस्त 2018 में विधि आयोग ने भी भारत सरकार को दी थी। इस बार सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस पर मोहर लगा दी है।

लेकिन एटार्नी जनरल (सरकारी वकील) ने इस कानून की उपयोगिता सिद्ध करने के लिए कई तर्क पेश किए। सरकार की चिंताएं वाजिब हैं लेकिन उनका समाधान इस कानून के बिना भी हो सकता है। आजादी के बाद देश में बनी सरकारों में लगभग सभी राष्ट्रीय पार्टियां रही हैं। उनमें से किसी की भी हिम्मत नहीं हुई कि इस कानून को खत्म करे तो क्यों नहीं हमारा सर्वोच्च न्यायालय ही इसे असंवैधानिक घोषित कर दे?

By वेद प्रताप वैदिक

हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले पत्रकार। हिंदी के लिए आंदोलन करने और अंग्रेजी के मठों और गढ़ों में उसे उसका सम्मान दिलाने, स्थापित करने वाले वाले अग्रणी पत्रकार। लेखन और अनुभव इतना व्यापक कि विचार की हिंदी पत्रकारिता के पर्याय बन गए। कन्नड़ भाषी एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने उन्हें भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी डॉक्टर वैदिक ने निभाई। डॉक्टर वैदिक ने हिंदी को साहित्य, समाज और हिंदी पट्टी की राजनीति की भाषा से निकाल कर राजनय और कूटनीति की भाषा भी बनाई। ‘नई दुनिया’ इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत और फिर दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ से लेकर ‘भाषा’ के संपादक तक का बेमिसाल सफर।

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