फ्रांस में शरीयत का हमला

अभी बीबीसी के ‘हार्डटॉक’ पर एंकर स्टीफन सैकर फ्रांस के सरकारी शिक्षा सलाहकार समिति की सदस्या डोमिनिक शनैपर से बात-चीत कर रहे थे। विषय था: पेरिस की सड़क पर एक मुस्लिम लड़के अब्दुल्ला द्वारा स्कूली शिक्षक सैमुएल पैटी की गला काटकर हत्या कर देने के बाद चल रहा तूफान।

सैकर ने पूछा कि फ्रांस तो पश्चिम में सेक्यूलरिज्म का अगुआ है। यूरोप में सर्वाधिक प्रखर सेक्यूलर देश फ्रांस ही है। वहाँ सरकार किसी धर्म को संरक्षण नहीं देती, न धर्म की आलोचना को रोकती है। ऐसा सभी यूरोपीय देशों में नहीं है। इंग्लैंड में ब्रिटिश क्राउन आज भी आंग्लिकन चर्च का आधिकारिक संरक्षक है।

बहरहाल, डोमिनिक ने बताया कि फ्रांस में सेक्यूलरिज्म के अर्थ में धर्म की आलोचना, उस की खिल्ली उड़ाना शामिल है। वहाँ तो क्रिश्चियनिटी का सब से अधिक मजाक बनाया जाता है। यह अभिव्यक्ति स्वतंत्रता के मूल्यों के अनुरूप है। फ्रांस दूसरों को नहीं कहता कि वही सेक्यूलरिज्म स्वीकार करे। अतः दूसरों को भी फ्रांस में उस के मूल्यों का सम्मान करना चाहिए। किन्तु सैकर कायल नहीं हुए। उन का कहना था कि जब क्लास में मुस्लिम बच्चे भी हैं, तब शिक्षक ने प्रोफेट मुहम्मद का चित्र क्यों दिखाया?

यह प्रसंग दिखाता है कि पश्चिमी समाज किस तरह इस्लाम के प्रति अपने ही अज्ञान के जाल में फँस गया है। सैकर ने पैटी के कत्ल पर कोई आक्रोश नहीं दिखाया। न यह नोट किया कि फ्रांसीसी मुस्लिम नागरिक अपनी शिकायत लेकर देश के न्यायालय नहीं गया। उस ने सीधे इस्लामी मान्यता के अनुसार शिक्षक का गला काट दिया। दूसरे, सैकर को मालूम नहीं कि मुहम्मद का चित्र नहीं बनाना, और बनाने, दिखाने वाले को मार डालना, यह सब शरीयत का निर्देश है। यह कुरान में नहीं लिखा है। सो, यदि आप शरीयत की एक, दो, तीन… माँगें पूरी करते हैं, तो उस की सारी माँगें पूरी करने के दुष्चक्र में फँसते हैं। यही इस्लाम है!  जिस के प्रति ‘संवेदना’ दिखाने की अपेक्षा सैकर जैसे अज्ञानी काफिर करते हैं।

काफिरों, यानी गैर-मुसलमानों, की सब से बड़ी भूल यही है कि वे इस्लाम को एक रिलीजन मानते हैं।  रिलीजन इस्लाम में बहुत छोटा हिस्सा है। उस का बहुत बड़ा हिस्सा राजनीति है। रिलीजन उस की राजनीति का लिफाफा मात्र है। इसीलिए अल्लाह से कई गुणा अधिक महत्वपूर्ण मुहम्मद हैं। शरीयत मुहम्मद की कथनी, करनी, निर्देशों, यानी हदीस और सुन्ना से बना है। इसीलिए कुरान भी इस्लाम को समझने, उस का पालन करने के लिए नाकाफी है। शरीयत के कानून मुख्यतः सुन्ना से बने हैं। कुरान और हदीस में अंतर होने पर भी हदीस ही मान्य है। जैसे, पाँच बार नमाज पढ़ना, जबकि कुरान में तीन बार ही कहा गया है।

इसीलिए, जब यूरोप और भारत जैसे देशों में मुसलमान शरीयत को थोपते हैं – तो वे शुद्ध राजनीतिक काम कर रहे होते हैं! उस में धर्म या ईश्वर का मामला एक पैसा भी नहीं है। वह धर्म की आड़ में अपना दबदबा बढ़ाने, और दूसरों को पीछे हटने को मजबूर करने की गतिविधि है। पर नासमझी में काफिर उसे मान कर अपने ही गले में फँदा लगाने या कसने में मदद देते जाते हैं।

यही इस्लाम की ‘ट्रिक’ है, जो सदियो से खुले तौर से चलते हुए भी काफिरों को उलझा देती है। जिस में बड़े-बड़े काफिर संपादक, नेता, विद्वान फँस जाते हैं। वे अपने धर्म की तरह, अपनी नैतिकता से, इस्लाम को भी एक और रिलीजन मान लेने मान लेने की भूल कर बैठते हैं। आँख और दिमाग खोल कर कभी इस्लामी मूल किताबों और मुस्लिम व्यवहार का अध्ययन नहीं करते, जो सारी दुनिया में एक समान है। मुस्लिम व्यवहार शत-प्रतिशत मुहम्मद के सुन्ना पर आधारित है, इसीलिए हर कहीं एक जैसा है। इस्लाम मुख्यतः राजनीति है, इसीलिए सारी दुनिया में परेशानी है। वरना यूरोप में जितने मुसलमान हैं, उतने ही बौद्ध भी हैं। क्या किसी ने बौद्धों को कहीं कोई माँग या परेशानी खड़ी करते देखा है?

इस्लामी मामले पर दूसरी भयंकर भूल है, उसे अपनी नैतिकता से देखना। यानी, समानता की भावना से जो सभी मनुष्यों के लिए एक जैसे नियम, व्यवहार, आदि मानती है। जबकि दोहरापन इस्लाम का मूल सिद्धांत है। यानी, मुसलमान के लिए एक, गैर-मुसलमान के लिए दूसरा नियम, व्यवहार, आदि। इसीलिए मुसलमानों द्वारा गैर-मुस्लिमों की हत्या, विध्वंस, उत्पीड़न, अनाचार, आदि के लिए इस्लामी कानून उन्हें दोषी नहीं ठहराता। शरीयत बिलकुल स्पष्ट है:  किसी काफिर को मार डालने के लिए मुसलमान को मृत्युदंड नहीं दिया जा सकता, चाहे काफिर नितांत निर्दोष ही क्यों न हो!

यही कारण है कि पेरिस में अब्दुल्ला द्वारा सैमुएल की हत्या पर मुस्लिम विश्व से कोई भर्त्सना नहीं सुनाई पड़ी। वही स्थिति 9/11, मुंबई, बेसलान, या कश्मीर में हुए तमाम नरसंहारों पर रही है। शरीयत के अनुसार जिहाद न केवल उचित, बल्कि सर्वोच्च मुस्लिम कर्तव्य है जिस की अनुशंसा प्रोफेट ने की थी। इस प्रकार, इस्लामी नैतिकता काफिरों को केवल अपने शिकार, संभावित शिकार, और प्रतिद्वंदी के रूप में ही देखती है, जिस के साथ सह-अस्तित्व केवल तात्कालिक लाचारी या होशियारी है। स्थाई केवल शरीयत यानी मुहम्मद के निर्देश हैं।

इसीलिए, किसी गैर-मुस्लिम देश में, काफिरों के शासन में मुसलमान सहजता से नहीं रह सकते। चाहे 90 प्रतिशत मुसलमान भी शान्तिपूर्ण हों, किन्तु 2 प्रतिशत पक्के इस्लामी भी सारी उलट-पलट करने में सदैव समर्थ हैं। शिकायतें, तरह-तरह की माँगे, हिंसक-अहिंसक कार्रवाइयाँ, आदि करने में। जो कुल मिलाकर हर कहीं शरीयत थोपने की जिद हैं, जो क्रमशः सफल होती जाती है। क्योंकि काफिर शासक, बुद्धिजीवी, अज्ञानवश इस उस मुस्लिम माँग को संतुष्ट करते जाते हैं। बिना जाने कि यह सब इस्लाम की धार्मिक नहीं, राजनीतिक गतिविधि है। जिस से अतिथि देश दिनो-दिन अपनी जमीन, अपनी संस्कृति, नैतिकता, कानून, जीवन, सब कुछ खोते जाते हैं। उन्हें मालूम नहीं कि यह प्रक्रिया तब तक चलेगी जब तक कि उन के समाज पर इस्लाम की 100 % माँगें पूरी न हो जाएं। यानी, जब तक पूरा देश इस्लामी और सारे लोग मुसलमान न बन जाएं। क्योंकि यही प्रोफेट मुहम्मद का सुन्ना है! वे तब तक संतुष्ट नहीं हुए जब तक कि अरब का एक-एक व्यक्ति मुसलमान नहीं बन गया। यही उन का अंतिम आदेश भी था। और मुहम्मद ही इस्लामी व्यवहार के अखंड, एक मात्र, स्थाई मॉडल हैं।

काफिर जगत की दुर्गति यह है कि वह तमाम इस्लामी सिद्धांत, व्यवहार, और इतिहास बिलकुल सार्वजनिक, लिखित, घोषित होते हुए भी आँखें खोलकर नहीं देखता परखता। इसीलिए, 7वीं सदी के मदीना से लेकर 20वीं सदी के लाहौर, ढाका, दिल्ली तक, सारे काफिर मुसलमानों से कई गुना अधिक सुशिक्षित, समृद्ध, शक्तिशाली और बहुसंख्या होते हुए भी धीरे-धीरे खत्म होते रहे। क्योंकि उन्होंने अपनी नैतिकता से इस्लाम को एक और धर्म, एक और विचार समझने की भयंकर भूल की!

इस्लाम एक और धर्म या विचार हरगिज नहीं। जैसा भारतीय कूटनीतिज्ञ मिर्जा राशिद अली बेग ने कहा था, इस्लाम की पूरी परिकल्पना दूसरों को मिटा देने पर आधारित है। यही उस की मूल टेक है। इसीलिए, उस में लोकतंत्र या सेक्यूलरिज्म की कोई गुंजाइश नहीं। फलतः तमाम गैर-मुस्लिम समाजों को तय यह करना है कि वे या तो मुसलमानों को राजनीतिक इस्लाम से दूर करें, या फिर आज न कल इस्लामी मतवाद के जबड़े में समा जाएं। जैसे अरब से अफ्रीका, एशिया तक अनेक यहूदी, क्रिश्चियन, बौद्ध, और हिन्दू समाजों का हो चुका। राजनीतिक इस्लाम के साथ बीच का रास्ता नहीं है। काफिरों द्वारा इस की कोशिश सदैव, निरपवाद रूप से, इस्लाम को कुछ और ताकत देने के सिवा कुछ साबित नहीं हुआ है।

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