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Wednesday, May 12, 2021
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मंदिर विज्ञान और सीनू जोसेफ

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शंकर शरणhttp://www.nayaindia.com
हिन्दी लेखक और राजनीति शास्त्र प्रोफेसर। जे.एन.यू., नई दिल्ली से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी पर पीएच.डी.। महाराजा सायाजीराव विश्वविद्यालय, बड़ौदा में राजनीति शास्त्र के पूर्व-प्रोफेसर। ‘नया इंडिया’  एवं  ‘दैनिक जागरण’  के स्तंभ-लेखक। भारत के महान विचारकों, मनीषियों के लेखन का गहरा व बारीक अध्ययन। उनके विचारों की रोशनी में राष्ट्र, धर्म, समाज के सामने प्रस्तुत चुनौतियों और खतरों को समझना और उनकी जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए लेखन का शगल।भारत पर कार्ल मार्क्स और मार्क्सवादी इतिहास लेखन, मुसलमानों की घर वापसी; गाँधी अहिंसा और राजनीति;  बुद्धिजीवियों की अफीम;  भारत में प्रचलित सेक्यूलरवाद; जिहादी आतंकवाद;  गाँधी के ब्रह्मचर्य प्रयोग;  आदि कई पुस्तकों के लेखक। प्रधान मंत्री द्वारा‘नचिकेता पुरस्कार’ (2003) तथा मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा प्रचार समिति द्वारा ‘नरेश मेहता सम्मान’(2005), आदि से सम्मानित।

पहली ही पुस्तक से चर्चित लेखकों में सीनू जोसेफ का नाम भी जुड़ गया है। कैथोलिक क्रिश्चियन पृष्ठभूमि की सीनू ने इंजीनियरिंग पढ़ी। किन्तु बाद में लड़कियों की स्वास्थ्य शिक्षा कार्य को अपना लिया। जब सबरीमला मंदिर में रजस्वला आयु वाली स्त्रियों के जाने की पारंपरिक वर्जना पर कुछ एक्टिविस्टों ने आंदोलन किया, और सुप्रीम कोर्ट ने वहाँ सभी महिलाओं को जाने देने का फैसला दिया, तब सीनू ने इस का अध्ययन आरंभ किया। क्यों भारत में ऋतु (रजःस्त्राव) काल में स्त्रियों के लिए कई तरह के नियम रहे हैं? देश के विभिन्न भागों में तत्संबंधी कितनी समानता है, और स्त्रियाँ स्वयं उसे क्या समझती हैं? इसी खोज-बीन में उन्होंने हिन्दू आगम शास्त्रों का भी अध्ययन किया। उसी का परिणाम उन की पुस्तक है: ‘द साइंस बिहाइंड रेस्ट्रिक्शन्स: वीमेन एंड सबरीमला’ (2019)।

यह छोटी सी पुस्तक चकित करने वाली है। अच्छे-अच्छे हिन्दुओं को बहुत समझ नहीं कि यहाँ ऋतुवती स्त्रियाँ कई तरह की वर्जनाओं का पालन क्यों करती है?  इस विषय पर सीनू की पुस्तक ‘ऋतु विद्या’ भी आधुनिक भाषा में अपने तरह की पहली है।

बहरहाल, सबरीमला मुकदमे के बाद सीनू ने मंदिरों में स्त्री संबंधी नियमों पर अध्ययन शुरू किया। केरल मूल की सीनू का अध्ययन इसलिए भी सहज रहा, क्योंकि दक्षिण भारत में हिन्दू मंदिर संबंधी ज्ञान व परंपरा काफी कुछ अक्षुण्ण बची रही। उत्तर भारत में इस्लामी दस्युओं, शासकों ने तमाम मूल मंदिर ध्वस्त कर दिए। फिर सदियों तक नए मंदिर भी नहीं बनने दिए। फलतः मंदिर वास्तुकार और जानकार पुजारी तक समाप्त हो गए। अंततः उत्तर भारत में मंदिर-विज्ञान ही लुप्त हो गया। तुलना में दक्षिण में अनेक मंदिर सुरक्षित रहे, जहाँ इस्लामी हमलावरों के हाथ नहीं पहुँच सके। इसीलिए उधर वैदिक ज्ञान, मंदिर विज्ञान और समाज के साथ उस का अटूट संबंध काफी कुछ बचा रहा।

अपने अध्ययन में सीनू ने अनोखी बात पाई कि सबरीमला छः मंदिरों की श्रृंखला की अंतिम कड़ी है। यह सभी विशेष मंदिर भगवान अयप्पा (शास्था) के हैं, जो मानव शरीर में स्थित छः चक्रों से संबंधित हैं। केवल सबरीमला में रजस्वला आयु की स्त्रियों के जाने की वर्जना है। विवादियों ने इसे ‘पुरुषवादी वर्चस्व’ कहकर शोर-शराबा किया। जबकि वास्तविक कारण स्त्रियों के स्वास्थ्य का ध्यान रखना था। यह जानने पर सीनू ने एक स्त्री के रूप में उन पाँचों मंदिरों में जाकर स्वयं अनुभव करने की ठानी कि शरीर-चक्र से मंदिरों के संबंध की बात कितनी सच है?

उस यात्रा में सीनू को देशज विज्ञान और मंदिर के संबंध का रहस्य मिला। रजस्वला स्त्रियों के लिए आचार-व्यवहार संबंधी निर्देशों का उत्तर भी। आगम शास्त्र में उस के विवरण हैं। भारतीय आयुर्वेद संपूर्ण जीवन के सूक्ष्म पक्षों को समेकित रूप से देख कर बना था। वह शरीर के आजीवन नीरोग बने रहने पर केंद्रित है। इसीलिए, पारंपरिक हिन्दू जन-जीवन में खान-पान, उत्सव-त्योहार, संस्कार-विधान, आदि सब उसी अनुरूप बने थे। उन का सामंजस्य इतने गहरे स्तर तक था कि ग्रामीण महिलाएं सदियों से उन्हीं बातों का पालन कर रही हैं जो आयुर्वेद में है। ऐसी व्यवस्था और समझ पश्चिमी स्वास्थ्य विज्ञान से अतुलनीय रूप से उन्नत है, जहाँ शरीर की समझ ही मात्र स्थूल शरीर है। उन्हें शरीर के अदृश्य अवयवों, नाड़ी चक्रों की स्थिति, और भूमिका की कोई कल्पना भी नहीं है।

वैज्ञानिक पद्धति अवलोकन, अनुभूति और प्रमाण को ही कहते हैं। सीनू ने उसी अनुभूति और प्रमाण को अपनी पुस्तक में रखा है, जिसे कोई भी परख सकता है। किस तरह अयप्पा के वे पाँच मंदिर एक स्त्री को प्रभावित करते हैं। सीनू छठे मंदिर, सबरीमला, के अंदर नहीं गईं। बावजूद कि सुप्रीम कोर्ट ने उस में हर आयु की महिलाओं को प्रवेश करने देने का फैसला दिया है। सीनू इसलिए नहीं गईं क्योंकि शास्था से जुड़े पहले पाँच मंदिरों में उन्हें अलग-अलग चक्रों, और उस से जुड़ी शरीर क्रियाओं पर प्रभाव महसूस हुआ। इस से उन्हें सबरीमला में अंदर जाने पर रजस्वला आयु की स्त्री के स्वास्थ्य को हानि होने की बात सुसंगत लगी।

हिन्दू मंदिरों का वास्तुशास्त्र मानव शरीर पर आधारित है। आगम शास्त्र के अनुसार, क्रेता युग में मंदिर नहीं थे। तब आवश्यकता नहीं थी। युग परिवर्तन के साथ, गुण के ह्रास और अवगुणों की क्रमशः वृद्धि के साथ ईश्वर से मनुष्यों का संबंध बदलता गया। अंततः कलियुग में, अवगुणों के वर्चस्व से, मंदिरों की आवश्यकता प्रत्येक मानवीय बस्ती में है। इसीलिए मंदिरों की वास्तु मनुष्य शरीर के अनुरूप बनाई गई। ताकि वह वृहत ब्रह्मांडीय शक्तियों से हमें जोड़ने में सहायक हो। सीनू ने उन चक्रों, उन का अलग-अलग देवी-देवताओं, तथा मनुष्य की शरीर क्रियाओं से संबंध, मंदिर से उन का सामंजस्य, और स्त्री-पुरुष की शारीरिक, व कर्म विशेषताओं के अनुसार नियमों का संक्षिप्त विवरण दिया है। अपने मंदिर अनुभव तथा भिन्न-भिन्न स्थानों में स्त्रियों के बीच प्रचलित नियमों की तुलना भी की है।

सभी मंदिर वहाँ पहुँचने वाले मनुष्यों के शरीर के विभिन्न चक्रों, भावों को प्रभावित करते हैं। वह स्त्री और पुरुष को अलग-अलग तरह से भी प्रभावित कर सकते हैं। सबरीमला मंदिर में ब्रह्यचर्य-भाव तीव्र है। इसीलिए, उस में पुरुष भी वही जा सकते हैं जिन्होंने वहाँ पहुँचने से पहले 41 दिनों का ब्रह्यचर्य-व्रत रखा हो। अन्यथा उन्हें भी मंदिर के नीचे सीढ़ियों तक ही जाने की अनुमति है।

अयप्पा की उपासना निवृत्ति मार्ग की ओर जाती है। इसीलिए सबरीमला मंदिर को ‘मोक्ष-धाम’ भी कहा गया है। वहाँ न केवल रजस्वला स्त्रियों को शारीरिक अनियमितता हो सकती है, वरन उन्हें सहज सांसारिक जीवन से ही विरक्ति संभव है। मानवीय प्रजनन अंगों की विभिन्नता यह है कि पुरुष वीर्यपात प्रक्रिया रोक सकता है, जबकि स्त्री में रजःस्त्राव मासिक-धर्म के रूप में स्वतःस्फूर्त है। वह उसे नहीं रोक सकती। इन दो कारणों से रजस्वला आयु की स्त्रियों को सबरीमला मंदिर में अदंर तक न जाने की परंपरा है। ताकि उन के शारीरिक, भावनात्मक स्वास्थ्य, एवं पारिवारिक जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े।

इस के विपरीत, ऐसे मंदिर भी हैं जहाँ जाने से महिलाओं के रजःस्त्राव और प्रजनन संबंधी गड़बड़ियाँ ठीक हो जाती है। जैसे, चेन्गानूर (केरल) का भगवती मंदिर, असम का कामाख्या मंदिर और आंध्र प्रदेश का लेपाक्षी मंदिर। सीनू जोसेफ ने असंख्य महिलाओं से ऐसे अनुभव सुने। उन की पुस्तक ‘ऋतु विद्या’ में उस के वर्णन हैं।

इस प्रकार, देश भर की स्त्रियों, और अपने अध्ययन अनुभव से सीनू इस निष्कर्ष पर पहुँचीं कि भारतीय मंदिर परंपरा के नियम एक व्यवस्थित विज्ञान है। आज क्षीण हो जाने के बावजूद वह पूरे देश के रीति-रिवाजों में जीवित है। हमारी दादी-नानियाँ भारतीय संस्कृति और धर्म परंपरा की संरक्षक, संवाहक रहीं हैं। उसे खारिज करने से पहले भारतीय ज्ञान परंपरा के साथ उस के संबंध का परीक्षण करना चाहिए।

यह पुस्तक एक गंभीर, पर उपेक्षित तथ्य की ओर भी ध्यान दिलाती है। इतिहास के विकृतिकरण को ठीक करने की माँग तो होती है। किन्तु योग, आयुर्वेद, चक्र, और मुद्रा संबंधी विशिष्ट, वृहत विज्ञान की उपेक्षा पर लगभग चुप्पी है। जबकि यह विज्ञान प्राचीन ग्रीक चिंतकों तक पहुँचा था। कितना रोचक तथ्य है कि आज संपूर्ण विश्व में मेडिकल-फॉर्मेसी का सार्वर्भौमिक प्रतीक है:  ईड़ा-पिंगला-सुषुम्ना नाड़ी एवं सहस्त्रार की ओर बढ़ती हुई कुंडलिनी वाला षड्चक्र! यूरोपीय उसे ‘एस्कलीपियस का डंडा’ कहते हैं। पर वह डंडा, उसे छः स्थानों पर घेरते-मिलते दो नाग, और सब से ऊपर पंख उन के लिए बेबूझ हैं! वह प्रतीक शत-प्रतिशत भारत का शरीर-चक्र विज्ञान है। जिस का संपूर्ण अर्थ, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभूति भी यहाँ और तिब्बत जैसे कुछ बौद्ध देशों में हजारों वर्षों से अक्षुण्ण है।

सीनू जोसेफ की पुस्तक दिखाती है कि भारतीय धर्म, संस्कृति, विज्ञान और जन-जीवन में सैदव अभिन्न संबंध रहा है। इसे पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता उतनी ही गंभीर है जितना इतिहास का गलत आख्यान बदलना। भारतीय संस्कृति को समझने के लिए भी भारतीय ज्ञान-विज्ञान को जानना अनिवार्य है। इस के अभाव में ही अनेक मूल्यवान सांस्कृतिक विरासतों को अंधविश्वास कहकर डिसमिस कर दिया जाता है।

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