सोशल मीडिया से खतरा

फेसबुक नफरत से भरी पोस्ट पर लगाम लगाने में नाकाम साबित हो रहा है। इसकी वजह से देश के कुछ हिस्सों में तनाव बढ़ने की शिकायत मिली है। मसलन, असम में जातीय तनाव बढ़ने के पीछे सोशल मीडिया, खासकर फेसबुक को प्रमुख कारण माना जा रहा है। असम में सोशल मीडिया पर बढ़ती नफरत के खिलाफ अभियान चलाने वाले गैर सरकारी संगठनों का कहना है कि अमानवीय भाषा का इस्तेमाल अक्सर बंगाली मुसलमानों को निशाना बनाने के लिए हो रहा है। यह वैसा ही है, जैसा म्यांमार के रोहिंग्याओं के मामले में हो रहा था। 2017 में सेना की कार्रवाई और जातीय हिंसा के बाद करीब सात लाख रोहिंग्या मुसलमानों को बांग्लादेश में शरण लेना पड़ा था। मगर फेसबुक का कहना है कि वह नफरत से भरे 65 फीसदी भड़काऊ बयान को वैश्विक स्तर पर रिपोर्ट करने से पहले ही अपने प्लेटफॉर्म से हटा देता है। फेसबुक के सामग्री समीक्षक 9 भारतीय भाषाओं में काम कर रहे हैं। फेसबुक के प्रवक्ता ने दावा किया कि ये समीक्षक हानिकारक सामग्री को पकड़ने के लिए खास रूप से प्रशिक्षित हैं। असम में पिछले दिनों राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर की सूची जारी होने से पहले संयुक्त राष्ट्र ने सोशल मीडिया पर बढ़ते भड़काऊ पोस्ट को लेकर चेतावनी दी थी। गौरतलब है कि एनआरसी की सूची में करीब 20 लाख लोग बाहर कर दिए गए थे, जिनमें ज्यादातर बंगाली मुसलमान शामिल थे।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि फेसबुक का इस्तेमाल नफरत फैलाने के लिए मेगाफोन की तरह किया जा रहा है। असम के कमजोर अल्पसंख्यकों को सीधा निशाना बनाया जा रहा है, जिनमें से ज्यादातर लोग अगले कुछ महीनों में किसी भी देश के नागरिक नहीं रहेंगे। अगस्त में जारी राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर में शामिल होने के लिए नागरिकों को यह साबित करना पड़ा था कि उनका परिवार भारत में 24 मार्च 1971 के पहले से रह रहा है। एक गैर सरकारी संगठन ने असम और एनआरसी से जुड़ी 800 फेसबुक पोस्ट और टिप्पणियों का विश्लेषण करने पर पाया कि 27 फीसदी पोस्ट भड़काऊ हैं। उसका अनुमान है कि इन पोस्ट को 50 लाख बार देखा गया। संस्था ने 213 पोस्टों को चिहनित किया और फेसबुक को सूचना दी। उसके बाद सोशल मीडिया साइट ने करीब 96 पोस्ट को हटा दिया। मगर यह बड़ी समस्या में छोटी कार्रवाई भर है। फेसबुक को अपनी बनती नकारात्मक छवि को रोकने के लिए कहीं अधिक गंभीर प्रयास करने होंगे।

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