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नागरिकताः फर्जी प्रलय?

नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में कांग्रेस द्वारा बुलाई गई विपक्षी दलों की बैठक में पांच-छह प्रांतीय दलों ने भाग नहीं लिया। भाजपा इस पर खुश हो रही है कि कांग्रेस की मुहीम नाकाम हो रही है। यह भाजपा की गलतफहमी है। जिन दलों ने इस बैठक का बहिष्कार किया है, उनमें से कुछ दल ऐसे हैं, जो नागरिकता रजिस्टर और शरणार्थी कानून दोनों का विरोध कांग्रेस से भी ज्यादा जोरों से कर रहे हैं। जैसे ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ! इस बैठक का बहिष्कार करनेवाले सभी दल नागरिकता कानून का विरोध कर रहे हैं। वे कांग्रेस को अपना नेता नहीं बनाना चाहते, इसका अर्थ यह नहीं कि वे इस कानून का विरोध नहीं कर रहे हैं।

असलियत तो यह है कि देश में सर्वत्र इस कानून के विरोध में जो नौजवान नारे बुलंद कर रहे हैं, उनको प्रेरणा कांग्रेस या किसी मुस्लिम संगठन ने नहीं दी है। नौजवानों की यह बगावत स्वतःस्फूर्त है। इसमें मुसलमान युवक कम, हिंदू युवक ज्यादा हैं। इस जन-आंदोलन में युवक आगे-आगे हैं और विपक्षी दल उनके पीछे-पीछे हैं। सच्चाई तो यह है कि विपक्षी दलों के पास न तो कोई अखिल भारतीय नेता है और न ही कोई सर्वस्वीकार्य नीति है लेकिन पिछले साढ़े पांच साल में श्री नरेंद्र मोदी ने उन सब दलों को यह पहला मौका दे दिया है कि वे एक होकर देश के नौजवानों को भड़काएं।

नए नागरिकता कानून से देश का कोई बड़ा नुकसान नहीं होने वाला है लेकिन उसने देश के नौजवानों के दिल में एक फर्जी प्रलय का माहौल खड़ा कर दिया है, जो असली प्रलय से भी अधिक खतरनाक सिद्ध हो सकता है। इस नकली माहौल ने अधमरे विपक्ष में नई जान फूंक दी है। इस फर्जी विवाद में पूरा देश उलझ गया है और देश की डांवाडोल अर्थव्यवस्था पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। बेरोजगारी और मंहगाई इसी तरह बढ़ती रही तो अगले छह माह बाद भाजपा के नेता जनता को मुंह दिखाने लायक भी नहीं रहेंगे।

By वेद प्रताप वैदिक

हिंदी के सबसे ज्यादा पढ़े जाने वाले पत्रकार। हिंदी के लिए आंदोलन करने और अंग्रेजी के मठों और गढ़ों में उसे उसका सम्मान दिलाने, स्थापित करने वाले वाले अग्रणी पत्रकार। लेखन और अनुभव इतना व्यापक कि विचार की हिंदी पत्रकारिता के पर्याय बन गए। कन्नड़ भाषी एचडी देवगौड़ा प्रधानमंत्री बने उन्हें भी हिंदी सिखाने की जिम्मेदारी डॉक्टर वैदिक ने निभाई। डॉक्टर वैदिक ने हिंदी को साहित्य, समाज और हिंदी पट्टी की राजनीति की भाषा से निकाल कर राजनय और कूटनीति की भाषा भी बनाई। ‘नई दुनिया’ इंदौर से पत्रकारिता की शुरुआत और फिर दिल्ली में ‘नवभारत टाइम्स’ से लेकर ‘भाषा’ के संपादक तक का बेमिसाल सफर।

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