बिखरी सभ्यता में राज की गायब इंद्रियां! - Naya India
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बिखरी सभ्यता में राज की गायब इंद्रियां!

अपने डॉ. वेदप्रताप वैदिक ने कल फिर लिखा कि बने एक वृहद आर्यावर्त! कई हिंदू विचारक, महात्मा गांधी, डॉ. राम मनोहर लोहिया से ले कर तमाम तरह के सेकुलरअपने-अपने अंदाज में यह साझा सपना लिए रहे थे या लिए हुए हैं कि दक्षिण एशिया एक साझा चूल्हा है। साझा पालने से निकले बड़े परिवार के चूल्हे भले-भले अलग-अलग बन गए हों मगर हैं तो एक घरोपा। एक राष्ट्र-राज्य। यूरोप के अलग-अलग देश जब एक संघ बनाकर पश्चिमी सभ्यता की धुरी, दुनिया की राजनीतिक, आर्थिक ताकत हैं तो मां भारती के पालने से निकले हम भारतवंशी,सार्क के आठ देश क्यों नहीं इकठ्ठा हो कर अखंड भारत, आर्यावत (या कोई भी नाम) बनाएं?

इस चाहना को दूसरी तरह से भी समझें।सोचें कि हम हिंदुओं काऔर दक्षिण एशिया के लोगों की सभ्यता-संस्कृति का मानवशास्त्र, एंथ्रोपोलोजिकल पालना, हमारी सभ्यता-संस्कृति का इतिहासजन्य घरोपा कौन सा है? तो दो टूक जवाब है सिंधु नदीं सभ्यता! सचमुच हम हिंदुओं के गौरव, विकास, धर्म-संस्कृति का प्रारंभ, उसका पालना हड़प्पा और मोहनजोदड़ो है! लेकिन ये आज भारत में नहीं हैं! ये पाकिस्तान में हैं। और पाकिस्तान क्या है? वह हिंदू सभ्यता-संस्कृति-राष्ट्र याकि दक्षिण एशिया की कुल विकसित सभ्यता की एंटीथीसिस है। वहां के लोग सिंधु घाटी सभ्यता केसत्व-सत्व को, अपने पूर्वज, अपनी कोख को नकराते हैं!

क्या नहीं? क्या अफगानिस्तान और पाकिस्तान में यह जिद्द नहीं है कि सभ्यता-संस्कृति के मूल स्थलों, लक्षणों, प्रतीकों पर बुलडोजर चलाना राष्ट्र-राज्य का उद्देश्य है।

अब यदि यह हकीकत है तो अखंड भारत, आर्यावर्त, साझा चूल्हा कैसे संभव है या यह कैसे माना जाए कि हम सब सभ्यता के एक ही छाते के नीचे!हमारी इस हकीकत को आधुनिक चीन की विशिष्ट उपलब्धि के नाते शेष सभ्यताओं से उसे अलग और रोल मॉडल बतलाने वाले ‘द चाइना वेब’ के चाइनीज दार्शनिक जांग वी वी ने बखूबी पकड़ा है। जान लें कि चीन के मौजूदा नीति-नियंताओं में जांग की थीसिस का बहुत असर है। उनकी थीसिस चाइनीज सभ्यता के मनोविश्व की प्रतिनिधि है। उसी के प्रभाव में चीन का शेष दुनिया, सभ्यताओं और देशों के प्रति व्यवहार है।

चीन के विचारकों का मानना है कि यूरोप (ईसाईयत), मध्य-पूर्व (इस्लाम) और भारतीय उपमहाद्वीप (हिंदू) की सभ्यता राजनीतिक तौर पर बिखऱी (politically diffuse civilizations), अचैतन्य रही है जबकि चीन अपने अधिकांश भू-भाग को अधिकांश समय राजनीतिक एकीकरण में बांधे, संभाले या एकीकृत किए रहा है इसलिए उसका राजनीतिक मिजाज, उसकी संस्कृति, उसकी जीवन पद्धति और उसकी सभ्यता स्थायी और दुनिया के लिए मॉडल है।

एक हद तक बात सही है। चीन बाकी देशों की तरह का न सामान्य या रूटिन देश है और न उसकी सभ्यता के इतिहास में अलग-अलग इलाकों की उपराष्ट्रीयता के अलग-अलग चूल्हों ने वह विभेद बनाया है, जैसे भारत और पाकिस्तान में बना है। न उसने वैसा जिहाद या धार्मिक हमला देखा जैसा भारत ने देखा है। बौद्ध धर्म भारत से गया लेकिन बौद्ध और इस्लाम का जो फर्क है उसने चीन को वैसे सांस्कृतिक दोहन, समर्पण, राजनीतिक गुलामी से बचाए रखा, जिससे इस्लाम के कारण भारत की सभ्यता, भारत के हम लोग गुजरे हैं।

तभी यह बात कि साझा सभ्यता, साझा चूल्हे में दक्षिण एशिया आर्यावर्त, अखंड भारत में तब्दील हो, सौ टका हकीकत से जुदा ख्याल है। अपना मानना है कि यहीं हम लोगों की पहचान, हमारे मनोविश्व का, राष्ट्र-राज्य की अपनी अवधारणा का कोर संकट है। हमारा मनोविश्व, हमारा दिल-दिमाग महान भारत, अखंड भारत, आर्यावर्त की सोचते हुए राजनीतिकसपना पालता है बिना इस बोध के कि राजनीति में, राज्येंद्रियों में हम जन्मजात अपंग हैं। हमारे संस्कारों में राजनीति, लड़ाई, राज करना, राज वाला जुनून, लक्ष्य याकि राजनीतिक चेतना, स्वतंत्र राज्येंद्रियां नहीं हैं। संदेह नहीं कि अफ्रीका से चले होमो सेपियंस ने दक्षिण भारत, सिंधु नदी के किनारे सबकुछ बनाया, घर-परिवार, समाज बनाया। खेती शुरू की, हडप्पा-मोहनजोदड़ो के नगर बने, पूरे भारत को अपना भूगोल बनाया। भाषा, वेद-पुराण-कथाएं बनाईं मगर लाख टके का रहस्य, गुत्थी कि सबकुछ बिना राज्येंद्रिय व राजनीतिक स्ट्रक्चर के!

हां, आपको जान कर आश्चर्य होगा और यह हड़प्पा-मोहनजोदड़ो से लेकर ताजा राखीगढ़ी में उत्खनन की हकीकत है जो सिंधु घाटी सभ्यता का हमने सबकुछ जाना लेकिन यह पता नहीं पड़ा कि हड़प्पा-मोहनजोदड़ो की राज्यसत्ता क्या थी? कौन था राजा? अपनी रक्षा, अपनी चारदिवारी की रक्षा के क्या बंदोबस्त थे?

बात-बात में सटीक सवाल निकला है कि बिना राजा के, राज्यसत्ता के हड़प्पा- मोहनजोदड़ो की सभ्यता कैसी थी? ध्यान रहे अपनी सिंधु नदी घाटी सभ्यता के समकाल में नील नदी की मिस्र सभ्यता, फिर मेसोपोटामिया(मौजूदा इराक) की सुमेर सभ्यता भी थी और इनके राजाओं याकि मिस्र के फैराओ, उसके राजवंश और सुमेर के राजा गिलगमेश के कीर्ति स्मारक, कीर्ति ग्रंथ सब हैं लेकिन मिस्र सभ्यता से भी बड़े भूभाग वाली सिंधु घाटी सभ्यता में न राजा का नाम है और न राज्य सत्ता की चर्चा!

यह बहुत गजब व अकल्पनीय बात है! तभी ईसा पूर्व सन् 3000से ईसा बाद सन 600 तक इस पृथ्वी पर सभ्यताओं के उत्थान और पतन का इतिहास बताने वाली लिस्ट में कोई 85सभ्यताओं का जो नाम हैं, उनमें सभ्यतागत राष्ट्र याकि राज्यसत्ता केंद्रित व्यवस्था-साम्राज्य के नाते दक्षिण एशिया (हिंदू सभ्यता) के राज्येंद्रिय झलक में (हां, झलक जितनी ही) ऐसी 11राजसत्ता बनती है, जिसकी बतौरपहचान में तथ्य उभरेगा कि राजा ने लड़ाई लड़ी, सीमाओं का विस्तार कर साम्राज्य बनाने की किलिंग इंस्टिंक्ट दिखाई। इसमें अखिल भारतीय या उत्तर भारतीय दायरा लिए सिर्फ एक ही अपना मौर्य वंश था, जिसने सिकंदर से लड़ाई लड़ी तो जिसकी कालावधि भी लंबी 364 साल की है।

सभ्यताओं की लिस्ट में भारत अनुभव के11 सभ्यतागत इलाकों में बिना राज्येंद्रिय वाली हड़प्पा सभ्यता है तो मौर्य वंश के बाद की महाजनपद सभ्यता (उम्र 200 साल) का भी विश्लेषण है। इसके बाद में नंद(शासन उम्र24 वर्ष), मौर्य साम्राज्य (शासन137 वर्ष), मगध-मौर्य (90वर्ष) को राजसत्ता के सभ्यतागत राष्ट्र खांचे में माना जाता है। इनके अलावा दक्षिण के चेरा (500साल) प्रथम चोला (500 वर्ष) सतवाहन वंश (450 साल), सुंग (112 वर्ष), आंध्र (370 वर्ष), कण्व (45 वर्ष), गुप्त वंश (90 वर्ष) का शासन। तो इस सबका अर्थ है कि 36 सौ साल के ज्ञात-जाग्रत इतिहास में दक्षिण एशिया की मां भारती के सभ्यताजन्य राष्ट्र 11 और इनमें भी चाणक्य सूत्रों में बने मौर्य वंश के चंद्रगुप्त (सत्ता 25 वर्ष), बिंदुसार (सत्ता 29 वर्ष) और सम्राट अशोक (सत्ता 37 वर्ष) के 81 वर्ष ही सभ्यतागत राष्ट्र निर्माण-उत्थान-विस्तारका वह अकेला अनुभव है, जिसमें सभ्यता का प्रताप सचमुच दक्षिण एशिया में सुदूर तक बना।

मगर वे 36 सौ साल और ईसा बाद के सन् 600 से सन् 1947 के बीच के 1347 साल याकि कुल जमा 4947 याकि पांच हजार साल पर समग्रता से यदि हम विचार करें तो क्या यह निष्कर्ष दो टूक नहीं निकलेगा कि तमाम सभ्यताओं के बीच हम, भारत के हम लोग राज्येंद्रियों, राज्यसत्ता, निज और सामूहिक राष्ट्र चेतना के मामले में सर्वाधिक शून्य व वैक्यूम में रहे! हिंदुओं की सभ्यता का जीवन बिना उन इंद्रियों के गुजरा, जिससे लड़ना, भिड़ना, अपना साम्राज्य बनाना, अपने आपको बचाना, अपनी डुगडुगी बनवाना आदि होता हैऔर अंततः जिससे कौम के बुद्धि-ज्ञान-विज्ञान के ताले खुलते हैं और विश्व सिरमौर बना जाता है!

तो बात शुरू हुई थी सभ्यतागत अखंड भारत याकि साझे चूल्हे से साझा आर्यावर्त बनाने की चाहना से। और अब सवाल है कि जब 5000 साल के इतिहास में बमुश्किल सौ साला साम्राज्यवादी (चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक महान काल), सभ्यतागत राष्ट्र का अनुभव है और बाकी पूरा काल खंड-विखंड, बिखरे राजे-रजवाड़ों और पूरे हजार साल खांटी विधर्मियों की गुलामी के हैं तो हम उन राज्येंद्रियों को कहां से लाएं, उनका कहां से आयात करें, जिससे हमारा चाइनीज, इस्लाम, और ईसाईयत सभ्यता से मैच हो सके?

यह बहुत भारी,विकट मसला है। उसके पहले अभी सभ्यतागत पालने का वह सवाल भी बाकी है कि हमने सबकुछ पाया लेकिन लड़ना क्यों नहीं आया! हमें साम्राज्य बनाना, धुरी बनना क्यों नहीं आया! हमदूसरों की धुरी के ही विस्तार या दूसरों के ही शिकार क्यों होते गए? हमारे वंशज होमो सेपियंस का शिकारीपना भला कैसे भूला बैठे? (जारी)

By हरिशंकर व्यास

भारत की हिंदी पत्रकारिता में मौलिक चिंतन, बेबाक-बेधड़क लेखन का इकलौता सशक्त नाम। मौलिक चिंतक-बेबाक लेखक-बहुप्रयोगी पत्रकार और संपादक। सन् 1977 से अब तक के पत्रकारीय सफर के सर्वाधिक अनुभवी और लगातार लिखने वाले संपादक।  ‘जनसत्ता’ में लेखन के साथ राजनीति की अंतरकथा, खुलासे वाले ‘गपशप’ कॉलम को 1983 में लिखना शुरू किया तो ‘जनसत्ता’, ‘पंजाब केसरी’, ‘द पॉयनियर’ आदि से ‘नया इंडिया’ में लगातार कोई चालीस साल से चला आ रहा कॉलम लेखन। नई सदी के पहले दशक में ईटीवी चैनल पर ‘सेंट्रल हॉल’ प्रोग्राम शुरू किया तो सप्ताह में पांच दिन के सिलसिले में कोई नौ साल चला! प्रोग्राम की लोकप्रियता-तटस्थ प्रतिष्ठा थी जो 2014 में चुनाव प्रचार के प्रारंभ में नरेंद्र मोदी का सर्वप्रथम इंटरव्यू सेंट्रल हॉल प्रोग्राम में था। आजाद भारत के 14 में से 11 प्रधानमंत्रियों की सरकारों को बारीकी-बेबाकी से कवर करते हुए हर सरकार के सच्चाई से खुलासे में हरिशंकर व्यास ने नियंताओं-सत्तावानों के इंटरव्यू, विश्लेषण और विचार लेखन के अलावा राष्ट्र, समाज, धर्म, आर्थिकी, यात्रा संस्मरण, कला, फिल्म, संगीत आदि पर जो लिखा है उनके संकलन में कई पुस्तकें जल्द प्रकाश्य। संवाद परिक्रमा फीचर एजेंसी, ‘जनसत्ता’, ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, ‘राजनीति संवाद परिक्रमा’, ‘नया इंडिया’ समाचार पत्र-पत्रिकाओं में नींव से निर्माण में अहम भूमिका व लेखन-संपादन का चालीस साला कर्मयोग। इलेक्ट्रोनिक मीडिया में नब्बे के दशक की एटीएन, दूरदर्शन चैनलों पर ‘कारोबारनामा’, ढेरों डॉक्यूमेंटरी के बाद इंटरनेट पर हिंदी को स्थापित करने के लिए नब्बे के दशक में भारतीय भाषाओं के बहुभाषी ‘नेटजॉल.काम’ पोर्टल की परिकल्पना और लांच।

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