दक्षिण कोरिया ऐसा सुंदर कैसे बना!

कोरिया और भारत को स्वतंत्रता लगभग एक समय मिली। संयोगवश दोनों का स्वतंत्रता दिवस भी एक ही हैः 15 अगस्त। ऐतिहासिक रूप से बुद्ध धर्म-दर्शन भी दोनों देशों को जोड़ने वाला एक तत्व है। किन्तु इस के बाद प्रायः कोई समानता नहीं दिखती। सच तो यह है कि कोरिया (जो द्वितीय विश्व-युद्ध और सोवियत-अमेरिकी शीत-युद्ध वाली प्रतिद्वंदिता के कारण जर्मनी की तरह अस्थाई रूप से दो हिस्सों में बँट गया) सन 1960 ई. तक मानो मिट्टी के ढेर जैसी ध्वस्त अवस्था में था। उस जमाने के समाचार-पत्रों से इस का नजारा किया जा सकता है।

वही कोरिया, अर्थात लोकतांत्रिक दक्षिण कोरिया, आज दुनिया के सर्वोत्तम दस विकसित, सुव्यवस्थित, सुसंस्कृत देशों में गिना जाता है। उत्तर कोरिया की कहानी अलग है, जो चीनी कम्युनिस्ट नियंत्रण में होने के कारण आज भी एक विचित्र तानाशाही में जीने के लिए अभिशप्त है। वहाँ के लोगों की स्थिति 1945 ई. के बाद पूर्वी जर्मनी जैसी है, जहाँ के लोग पश्चिमी जर्मनी को हसरत से देखा करते थे। उसी तरह, उत्तरी कोरिया के लोग और दक्षिणी कोरिया के लोग अपनी-अपनी मुखमुद्रा से ही पहचान लिए जा सकते हैं। प्रायः उत्तरी कोरिया के नागरिक मानो किसी तनाव, उदासी या यांत्रिक भंगिमा के साथ अलग-थलग से दिखते हैं। वहीं दक्षिणी कोरियाई लोग अमूमन प्रसन्न, सहज और मिलनसार होते हैं।

दक्षिण कोरिया का मिट्टी के मलबे से निकल कर पचास वर्षों में ईर्ष्याजनक उन्नत स्थिति में पहुँचना हमारे लिए बहुत शिक्षाप्रद उदाहरण है। यह केवल आर्थिक विकास की बात नहीं है। उस की सफलता शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में भी उतनी ही आकर्षक है। बल्कि, कहना चाहिए कि शिक्षा पर सही नीति अपना कर ही दक्षिण कोरिया ने सारी सफलता हासिल की। इस तथ्य में भारत के लिए बड़ी मूल्यवान सीख है, जो आज भी औपनिवेशिक तथा सोवियत-कम्युनिस्ट शिक्षाओं, मानसिकताओं से नहीं उबरा है।

एक भारतीय को सियोल पहुँचते ही सबसे पहली चीज वहाँ की सहज सुव्यवस्था आकर्षित करती है। जो पेरिस और रोम से भी श्रेष्ठतर है। सब से महत्वपूर्ण राजकीय, ऐतिहासिक स्थल, बड़े होटल, केंद्रीय रेलवे स्टेशन, आदि कहीं भी कोई आपसे पहचान-पत्र, आदि नहीं पूछता। न आपके समान, बैग, आदि की कोई जाँच होती है। विदेशियों की भी नहीं। न कहीं टिकट चेकर, न पुलिस मैन, न ट्रैफिक पुलिस, न चौकीदार दिखता है। मानो सारी व्यवस्था स्वचालित ही नहीं, स्व-रक्षित भी हो! उसे किसी का भय नहीं। आप एक बार एयरपोर्ट से सियोल के अंदर आ गए, तो मानो सब कहीं सब कुछ स्वतः संरक्षित हैं। तकनीकी संयत्र लगे हैं। किन्तु व्यक्ति-व्यक्ति के बीच कहीं कोई भय, कोई संदेह, अविश्वास नहीं झलकता। मानो सभी लोग समान रूप से विश्वसनीय हैं। देशी-विदेशी, धनी या सामान्य, उच्चाधिकारी या निम्नस्तरीय कर्मी, सभी। दुकानों में भी दुकानदार देशी-विदेशी का कोई भेद नहीं करते। न इस का कोई संकेत देते हैं। जैसे कोरियाई, वैसे ही विदेशी ग्राहक।

सियोल के सरकारी विद्यालय भी दिल्ली के सर्वश्रेष्ठ कहे जाने वाले निजी, मँहगे स्कूलों से अधिक साफ-सुथरे, सहज, सुंदर लगते हैं। विकलांग बच्चों के लिए भी पर्याप्त मात्रा में, और विविध सुविधाओं से संपन्न ऐसे स्कूल हैं जहाँ उन के भविष्य का ध्यान रखते हुए विशेष शिक्षण-प्रशिक्षण की व्यवस्था है। उस में सरकार मदद करती है, किन्तु संचालन मिला-जुला है। बाहर से देख कर बिलकुल नहीं कहा जा सकता कि कौन सा भवन या संस्थान सरकारी है, कौन गैर-सरकारी। दिन भर सारे शहर, गली, बाजार, मैदान, घूमते-छानते कहीं कोई कर्कश आवाज तक सुनाई नहीं पड़ती, कोई झगड़ा या तीखी बात-चीत तो दूर रही।

यह वही देश है, जहाँ साठ वर्ष पहले मिट्टी, विध्वंस और निरीह मनुष्य छोड़कर मुश्किल से कुछ ‘विकास’ की कोई झलक थी। तब कुछ ही अवधि में ऐसा चमत्कारिक परिवर्तन कैसे हुआ? बहुतेरे कारण गिनाए जा सकते हैं। हालाँकि, कुछ लोग दक्षिण कोरिया की सुव्यवस्था का कारण उस का छोटा क्षेत्रफल, एकरूपता, आदि भी बता देते हैं। पर दुनिया में दर्जनों देश उस जैसे छोटे हैं। पर किस के यहाँ सैमसंग, हुंडाई, एल.जी., आदि जैसी विश्वविख्यात तकनीकी कंपनियाँ हैं? कितने छोटे देशों मे ऐसा सुख-चैन जैसा वातावरण है?

संभवतः इस सफलता का सब से बड़ा कारण कोरियाई लोगों की सरलता, दृढ़निष्ठा के साथ-साथ सही शिक्षा नीति पर केंद्रित होना भी है। उन्होंने आरंभ से ही अपनी भाषा में संपूर्ण शिक्षा को केंद्रित किया। यही नहीं, सब से पहले भाषा में पारंगत होने को बच्चे की शिक्षा का आधार बनाया। दूसरे, झूठे अभिमान से मुक्त होकर उन्होंने दूसरों से सीखने की सरलता रखी। जर्मनी हो या अमेरिका, उन्होंने सहज विद्यार्थी की तरह उन से तकनीक और व्यवस्था की शिक्षा ली। उसे आत्मसात किया। उन से सहयोग लिया। फिर आत्मविश्वास पूर्वक, और आपसी विश्वास के साथ देश का नवनिर्माण किया।

यह एक मौलिक बिन्दु है। दक्षिण कोरिया में सारी व्यवस्था अपने नागरिकों पर विश्वास के साथ चलती है। इस के विपरीत उत्तर कोरिया में सारी व्यवस्था अपने ही लोगों पर अविश्वास पर बनी है। कुछ अतिरंजना के बावजूद कह सकते हैं कि भारतीय तंत्र में भी वही, सोवियत-कम्युनिस्ट प्रभाव वाली अविश्वासी मानसिकता प्रचलित है। ऊपर से नीचे तक, और बराबर के स्तर में भी, अधिकांश लोग मानकर चलते हैं कि दूसरा व्यक्ति अपना काम नहीं कर रहा, या नहीं करेगा, या ठीक से नहीं करेगा। फलतः तरह-तरह का संस्थानिक दोहराव, तिहराव, संदेह, नजर रखने की अंतहीन व्यवस्था, राजकीय तंत्र का बेहिसाब फैलाव, अनुत्तरदायी अधिकारी वर्ग, आदि बनते गए। अनेक विभाग अंग्रेजों के समय की दक्षता भी खो बैठे हैं। नतीजन, नकली या अतिरंजित उपलब्धियों का वही सोवियत शैली वाला मनमाना प्रचार, जाली आँकड़े, उपदेशबाजी, अपनी पीठ खुद थपथपाना, आदि भी हमारे यहाँ नियमित चलता है।

इसके विपरीत सियोल में हर नागरिक, कर्मचारी या अधिकारी मानकर चलता है कि दूसरों ने अपना कर्तव्य निश्चित रूप से किया होगा। फलतः वे किसी को संदेह से नहीं देखते। कहीं भी पहचान-पत्र न माँगना, तलाशी न लेना, आदि इसी का संकेत है। दिल्ली में एक ही बिल्डिंग में तीन बार पहचान-पत्र दिखाना पड़ता है – मानो वहाँ प्रवेश करते हुए किसी को सुरक्षा कर्मचारियों ने ठीक से नहीं जाँचा होगा! या चौकीदारों ने चौकसी नहीं रखी है। वही आम अविश्वास स्कूलों, व्यापारिक स्थलों, आदि पर भी है।

इन सब का मूल शिक्षा व्यवस्था में है। अपनी भाषा और संस्कृति पर केंद्रित होकर जो आत्मविश्वास, आत्मगौरव, और सहजता मिल सकती थी, वह हमने आज तक नहीं किया है। फलतः उधार की औपनिवेशिक, सोवियत, आत्मदैन्य, परनिंदा और आत्मप्रशंसा की मिली-जुली अधकचरी मानसिकता में हम बने हुए हैं। दक्षिण कोरिया जैसे निकटवर्ती एसियाई देशों से तुलना कर हमें अपनी कमियों और अपनी संभावनाओं की भी सही समझ मिलती है।

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