तब अभी के विनिवेशों पर आगे क्या?

जिन लोगों ने इंडियन एक्सप्रेस के संपादक रहे अरूण शौरी को उस दौरान देखा व जाना है वे कभी इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकते हैं कि कभी एक पत्रकार-संपादक के रूप में भ्रष्टाचार को उजागर करने का प्रतीक रहे शौरी के खिलाफ एक दिन भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तारी की कार्रवाई शुरू हो जाएगी। उसे रूकाने, रोकने के लिए उन्हे अदालतों के चक्कर लगाने पड़ेंगे। हाल में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के विशेष न्यायालय ने पूर्व केंद्रीय मंत्री रहे अरूण शौरी,, रिटायर्ड आईएएस अधिकारी प्रदीप बैजल व तीन अन्य लोगों के खिलाफ राजस्थान के एक होटल लक्ष्मी विलास पैलेस के विनिवेश करने के मामले में भ्रष्टाचार करने के आरोपों में मामला दर्ज करने का आदेश दिया है।

उदयपुर स्थित इस होटल का मालिकाना हक सरकार के पर्यटन विकास निगम के पास था। इसे विनिवेश के दौरान निजी कंपनी भारत होटल्स लिमिटेड को बेच दिया गया था। यहां यह याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि सीबीआई ने अपनी जांच के दौरान भ्रष्टाचार के आरोप प्रमाणित कर पाने वाले कोई प्रमाण नहीं मिलने के कारण इस मुकदमे को बंद कर देने का अनुरोध किया था मगर अदालत ने सीबीआई की यह मांग ठुकरा दी। यह मामला काफी पुराना है। सन् 2014 में दायर एक एफआईआर में कहा गया था कि 2001 में आईटीडीसी ने लक्ष्मी विकास होटल समेत कई होटलो का विनिवेश करने के लिए विज्ञापन दिया। शुरू में 15 लोगों ने यह होटल खरीदने में रूचि प्रदर्शित की थी। इनमें से तीन को अयोग्य घोषित कर दिया गया व छह लोगों को नीलामी के दौरान उससे खुद को अलग कर लिया।

इनमें से केवल भारत होटल्स ने ही अंतिम तारीख तक उदयपुर होटल को 7.52 करोड़ रुपए में खरीदने का प्रस्ताव दिया जोकि उसकी 99.99 फीसदी पेडअप कैपिटल के बराबर था। अंततः होटल को उसे 24 जनवरी 2002 को बेच दिया गया। सीबीआई ने अपनी एफआईआर में कहा कि 1999 से 2001 के बीच अज्ञात सरकारी कर्मचारियेां ने भारत होटल्स के साथ सांठ-गांठ करके उसे महज 7.52 करोड़ रुपए में होटल को बेच दिया। इससे सरकार की 143.48 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

एफआईआर में अरूण शौरी का नाम नहीं था जोकि मंत्रालय के मंत्री थे। मगर उनके मंत्रालय में तत्कालीन सचिव प्रदीप बैजल का नाम था। इसके अलावा भारत होटल्स के वित्तीय सलाहकार आशीष का नाम भी था जोकि संयोग से तत्कालीन सरकार के भी सलाहकार थे। अपनी एफआईआर में सीबीआई ने आरोप लगाया था कि सलाहकारों व तमाम तत्कालीन सरकारी कर्मचारियों ने दुर्भावना, धोखाधड़ी व बेईमानी करके होटल की कीमत कम तय की थी।उनका कहना था कि होटल के ऊपर से एक बिजली की हाईटेंशन लाइन गुजरती है जिसके कारण होटल व उसकी जमीन की लागत काफी घट जाती है जबकि वहां ऐसा कुछ नहीं था। होटल की वास्तविक कीमत 285 करोड़ थी जबकि उसे भारत होटल्स को महज 7.52 करोड़ में बेच दिया गया।

अरूण शौरी ने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपो का खंडन करते हुए अदालत में कहा है कि होटल बेचने के दौरान सभी जरूरी प्रक्रियाओं का पालन किया गया था। तत्कालीन राजग सरकार की कैबिनेट कमेटी ने भी तमाम दस्तावेजो व प्रक्रियाओं का गहन अध्ययन करने के बाद ही होटल की बिक्री को अपनी मंजूरी दी थी। तत्कालीन जानकार व चौकस कानून मंत्री ने भी तीन बार बिक्री से संबंधित फाइलो को सही ठहराते हुए अपनी सहमति जताई थी।

सीबीआई ने यह मामला बंद करने की सिफारिश करते हुए कहा कि उसने मूल्यांकन व वित्तीय सलाहकारों की नियुक्ति में कुछ भी गलत नहीं पाया। जांच में कहीं भी यह बात सामने नहीं आई कि होटल की वेल्यू का कम मूल्यांकन किया गया था। उसे दुर्भावना साबित करने का भी कोई उदाहरण नहीं मिला है। यह मामला वित्त मंत्रालय के तहत आने वाले विनिवेश विभाग को भी भेजा गया था।

मगर अदालत ने अरूण शौरी को पत्रकारिता संबंधी काम व अनुभव का जिक्र करते हुए कहा कि वे अपने लेखो व इंटरव्यू में भ्रष्टाचार उन्मूलन के बारे में लिखते व बोलते आए हैं। अदालत ने कहा कि पहले आईटीडीसी को वैल्यूअर (मूल्यांकनकर्ता) नियुक्त करना था मगर अरूण शौरी व प्रदीप बैजल ने वैल्यूअर नियुक्त करने का फैसला किया। उसकी रिपोर्ट को अरूण शौरी व प्रदीप बैजल ने स्वीकार कर लिया, इससे सरकार को काफी नुकसान हुआ। जबकि भारत होटल्स को काफी फायदा हुआ। उन्होंने अपने पद व स्थिति का दुरूपयोग करते हुए देश को 244 करोड़ रुपए का नुकसान पहुंचाया।

अदालत ने सीबीआई की सिफारिश ठुकराते हुए अरूण शौरी, बैजल, गुहा व वैल्यूअर कांतिकरम से कंपनी व भारत होटल्स के निदेशक ज्योत्सना सूरी के खिलाफ गिरफ्तारी के आदेश जारी कर दिए। उन्होंने यह शर्तें लगा दी कि इस संपत्ति का इस्तेमाल होटल के लिए ही किया जाएगा। जबकि उन्हें यह बात अच्छी तरह से पता थी कि जब सरकार यह होटल नहीं चला पा रही है तो उसके जरिए धंधा करने की बात कौन सोचेगा। यह सब भारत होटल्स की मिलीभगत से किया गया। अदालत ने उदयपुर के जिला कलक्टर से होटल को अपने अधिकार में लेने व उसे केवल किसी केंद्र सरकार की संस्था को ही चलाने देने की अनुमति देने के आदेश जारी किए हैं।

यहां यह याद दिलाना जरूरी हो जाता है कि कुछ समय पहले अरूण शौरी, यशवंत सिन्हा व प्रशांत भूषण ने अपनी प्रेस कांफ्रेंस में राफेल विमान खरीद में देश की सुरक्षा के साथ समझौता करने के आरोप लगाए थे। उन्होंने इस खरीद को झूठ का गुच्छा बताते हुए कहा था कि जहां पुरानी खरीद को अंतिम रूप देने में सालों लग गए वहीं नई खरीद का चंद दिनो के अंदर फैसला कर लिया गया। उन लोगों ने इसे देश का सबसे बड़ा रक्षा खरीद घोटाला करार देते हुए आरोप लगाया था कि इसके दौरान तमाम जरूरी प्रक्रियाओं रक्षा मंत्रालय व वित्त मंत्रालय की समितियों की अनदेखी कर दी गई थी।

उन्होंने इस मामले की तुलना बोफोर्स तोप कांड से करते हुए कहा था कि सरकार ने पहली खरीद की तुलना में इस विमान की कीमत 670 करोड़ रुपए बढ़ा दी थी मगर सरकार ने गोपनीयता की आड़ में यह नहीं बताया कि यह विमान किस कीमत पर खरीदे गए हैं।

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