गोटाबाया का चीन कार्ड

श्रीलंका के नए राष्ट्रपति भारत आए। यहां कई ऐसी बातें कहीं, जो हमें सुनने में अच्छी लगीं। मसलन, यह कि उनकी सरकार कोई ऐसा काम नहीं करेगी, जो भारतीय हितों के खिलाफ हो। मगर जब मौका मिला, तो परोक्ष रूप से चीन का भय दिखाने से भी वे नहीं चूके। ‘द हिंदू’ अखबार में प्रकाशित इंटरव्यू में उन्होंने कहा कि अगर श्रीलंका समेत एशियाई देशों के पास कोई विकल्प नहीं होगा, तो वह चीन की विशाल ‘वन वेल्ट वन रोड’ परियोजना में शामिल होगा। 2005 से 2015 तक जब राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे के भाई महिंदा राजपक्षे देश के राष्ट्रपति थे। तब श्रीलंका चीन के करीब गया।

चीन ने श्रीलंका को कर्ज और निवेश के रूप में सात अरब डॉलर की राशि मुहैया कराई। गोटबाया राजपक्षे ने पिछले दिनों राष्ट्रपति चुनाव में जीत दर्ज कर श्रीलंका की सत्ता संभाली है। अपने पहले विदेश दौरे के लिए उन्होंने भारत को ही चुना, जहां नई दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उन्होंने मुलाकात की। द हिंदू से उन्होंने कहा- “मैं भारत, जापान, सिंगापुर और ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों से कहना चाहता हूं कि आइए और हमारे यहां निवेश करिए। अगर वे ऐसा नहीं करेंगे तो फिर चीनी लोग बेल्ट और रोड पहल को सब जगह ले जाएंगे।” जो देश चीन की इस महत्वाकांक्षी परियोजना का विरोध कर रहे हैं, भारत उनमें सबसे आगे है। उसे आशंका है कि इसके जरिए भारतीय प्रशांत क्षेत्र में चीन का सैन्य और रणनीतिक दबदबा बढ़ेगा जो भारत के लिए ठीक नहीं होगा।

साथ ही इसका मार्ग पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर से गुजर रहा है, जो भारतीय संप्रभुता का उल्लंघन है। इस परियोजना के तहत चीन ने एशिया, अफ्रीका, मध्य पूर्व और यूरोप में बंदरगाहों, रेलवे और सड़क नेटवर्क और औद्योगिक पार्क विकसित करने के लिए कई सौ अरब डॉलर आवंटित किए हैं। गोटाबाया राजपक्षे ने इस बात की पुष्टि की कि वह कोलंबो के दक्षिण में हम्बनटोटा बंदरगाह को लेकर चीन के साथ हुए समझौते पर फिर से वार्ता करेंगे। यूरोप और एशिया के बीच कई अहम जलमार्ग इस बंदरगाह को इस्तेमाल करते हैं। श्रीलंका की सरकार जब 2017 में चीन का कर्ज नहीं उतार पाई तो सरकार को मजबूरन हम्बनटोटा बंदरगाह चीन को 99 साल की लीज पर देना पड़ा। मगर गोटाबाया इससे चिंतित नहीं हैं। चीन के प्रति उनका लगाव पहले की तरह कायम है।

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