Javed akhtar Taliban Afghanistan तालिबान को वैधता दिलाने की कोशिशें!
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तालिबान को वैधता दिलाने की कोशिशें!

javed akhtar

मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने तालिबान की तुलना राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से की है। वे होशियार आदमी हैं और हमेशा अपने धार्मिक विचारों को बौद्धिक मुलम्मा चढ़ा कर पेश करते रहे हैं। उनके मुकाबले सज्जाद नोमानी कम बौद्धिक हैं तो वे सीधे तौर पर तालिबान का समर्थन करते हैं और उसे सलाम भेजते हैं। असदुद्दीन ओवैसी भी जावेद अख्तर की तरह होशियार आदमी हैं तो वे भी तालिबान का समर्थन उन्हीं के अंदाज में करते हैं। वे कहते हैं कि भारत में खुद महिलाओं की हालत इतनी खराब है तो भारत के लोग कैसे अफगानिस्तान की महिलाओं की हालत पर चिंतित हो सकते हैं। उन्होंने अपनी बात साबित करने के लिए बच्चियों की मृत्यु दर के आंकड़ों का भी हवाला दिया। यह एक किस्म की बेईमानी है, जिसके जरिए उन्होंने तालिबान को भारत से बेहतर साबित करने का प्रयास किया। इस लिहाज से कह सकते हैं कि तालिबान समर्थकों की भारत में दो जमातें हैं। एक जावेद अख्तर और असदुद्दीन ओवैसी जैसी, जो राजनीतिक-सामाजिक तर्कों की आड़ में तालिबान का समर्थन करते हैं और दूसरी सज्जाद नोमानी और शफीकुर्रहमान बर्क जैसों की जमात है, जो सीधे ही सलाम भेजने में यकीन करते हैं। (Javed akhtar Taliban Afghanistan)

जावेद अख्तर के पूरे बयान को सुनने के बाद कुछ लोग कह सकते हैं कि वे तालिबान को जायज नहीं ठहरा रहे थे, बल्कि भारत में तालिबानी मानसिकता वाले समूहों का चरित्र उजागर कर रहे थे। लेकिन असल में ऐसा नहीं है। याद करें इससे पहले कब जावेद अख्तर ने राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ, विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल की तुलना तालिबान से की थी? वे हमेशा इन संगठनों का विरोध करते रहे हैं लेकिन पहले कभी नहीं कहा कि ये संगठन तालिबान की तरह हैं या इनका समर्थन करने वाले भी तालिबानी ही हैं। तालिबान तो दशकों से है और उसकी पांच साल की सरकार भी दुनिया ने देखी है, फिर पहले क्यों नहीं उन्होंने भारत के कट्टर हिंदुवादी समूहों की तुलना तालिबान से की थी? क्या तब वे तालिबान की मानसिकता और उसकी विचारधारा को नहीं जानते थे या आरएसएस आदि को नहीं जानते थे? असल में उस समय तालिबान को वैधता या स्वीकार्यता दिलाने की जरूरत नहीं थी। आज जरूरत आन पड़ी है तो जावेद अख्तर और उनके जैसे अनेक प्रगतिशील लोग अपना फर्ज निभाने आगे आ गए हैं।

जावेद अख्तर का भोलापन देखिए, जो उन्होंने कहा कि ‘जिस तरह तालिबान एक इस्लामी राष्ट्र चाहता है, उसी तरह ऐसे लोग भी हैं, जो हिंदू राष्ट्र चाहते हैं’। कोई उनसे पूछे कि क्या सिर्फ तालिबान ही इस्लामी राष्ट्र चाहता है और क्या तालिबान से पहले अफगानिस्तान इस्लामी राष्ट्र नहीं था? क्या पाकिस्तान इस्लामी राष्ट्र नहीं है? सऊदी अरब या खाड़ी के दूसरे देश और तुर्की या सुदूर अफ्रीका में इस्लामी राष्ट्र नहीं हैं? जब दर्जनों देश पहले से ही इस्लामी राष्ट्र हैं और शरिया कानून से चलते हैं और तालिबान भी अफगानिस्तान में वहीं करना चाहता है तो इस पर इतनी हायतौबा क्यों मचानी है? क्यों उसकी तुलना किसी हिंदू या ईसाई या यहूदी संगठन से करनी है? फर्क इतना है कि बाकी इस्लामी राष्ट्रों के मुकाबले तालिबानी राज थोड़ा ज्यादा कट्टर होगा। यानी सिर्फ कट्टरता की डिग्री का फर्क होगा।

Asaduddin Owaisi

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कह सकते हैं कि तालिबान और राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ या विश्व हिंदू परिषद और बजरंग दल की सोच एक जैसी है। हो सकता है कि कुछ मामलों में एक जैसी सोच हो लेकिन उस सोच को वास्तविकता में बदलने के लिए जैसा धार्मिक-वैचारिक आधार तालिबान को उपलब्ध है वैसा किसी कट्टर हिंदू संगठन को उपलब्ध नहीं है। तालिबान का कोई सरगना या किसी इस्लामी राष्ट्र का प्रमुख आवाम पर अपने विचार लागू नहीं करता है वह आसमान से नाजिल हुई पाक किताब के विचारों को लागू करता है। उसे शरिया के लिखित कानूनों को लागू करना होता है, जिसे मोटे तौर पर पूरी दुनिया का हर मुसलमान मानता है। भारत में कट्टर हिंदू समूहों को ऐसा कोई धार्मिक-वैचारिक आधार उपलब्ध नहीं है। यहां शासन के लिए एक ही किताब है, जिसे संविधान कहते हैं। तभी सिर्फ 40 साल पहले अस्तित्व में आया तालिबान आज सारी दुनिया के मुसलमानों का रहनुमा बना हुआ है। वह फिलस्तीन से लेकर लेवांत, सीरिया और कश्मीर तक के मुसलमानों के लिए आवाज उठाने को अपना हक मानता है। इसके उलट 96 साल पहले बना राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ अब भी अपने लिए प्रासंगिकता तलाशने में लगा है। उससे भी पुराना और कट्टर संगठन हिंदू महासभा अपनी प्रासंगिकता खो चुका है।

जावेद अख्तर ने इस फर्क को भी ध्यान में नहीं रखा कि तालिबान एक धार्मिक किताब की तालीम हासिल करने वालों का समूह है, जबकि आरएसएस का गठन कांग्रेस के बरक्स एक वैकल्पिक राजनीतिक विचारधारा के तौर पर हुआ था। अपने को सांस्कृतिक संगठन बताने के बावजूद आरएसएस बुनियादी रूप से एक राजनीतिक संगठन है। उसका धर्म और संस्कृति से उतना ही लेना-देना है, जितना तालिबान का लोकतंत्र और मानवाधिकार से। आरएसएस और भाजपा सहित उसके तमाम अनुषंगी संगठन धर्म और संस्कृति का इस्तेमाल राजनीतिक ताकत बढ़ाने के लिए करते हैं। उन्हें देश में कोई धार्मिक राज नहीं बनाना है और न पूरी दुनिया में हिंदू धर्म की सत्ता कायम करनी है। कुछ कट्टर हिंदू संगठनों द्वारा किसी अल्पसंख्यक से जय श्रीरामके नारे लगवाने या लाठी भांजने या तलवार लेकर सड़क पर निकलने की तस्वीरें और खबरें दिखा कर उनकी तालिबान से तुलना बेहद बचकानी बात है। भारत में कहीं भी ऐसा हो रहा है तो वह चंद लोगों का निजी उद्यम होता है और कानून-व्यवस्था की समस्या होती है। उसके साथ आम हिंदू की सहमति नहीं होती, जबकि तालिबान को थोड़े से अपवाद के अलावा व्यापक मुस्लिम समाज का समर्थन हासिल है, तभी पूरे अफगानिस्तान में तालिबान को कहीं भी आवाम का विरोध नहीं झेलना पड़ा। पंजशीर की लड़ाई भी आवाम का विरोध नहीं है।

वैसे भी भारत के संभवतः किसी हिंदू राजा ने धर्म के आधार पर देश या अपने साम्राज्य को चलाने की कोशिश नहीं की है। अशोक जैसे बौद्ध राजाओं ने बौद्ध धर्म के आधार पर और औरंगजेब जैसे मुस्लिम शासक ने इस्लाम के आधार पर देश का शासन जरूर चलाया पर भारत में एक पुष्यमित्र शुंग को छोड़ कर किसी हिंदू शासक के बारे ऐसा पढ़ने, सुनने को नहीं मिला कि उसने हिंदू धर्म के आधार पर शासन चलाने का प्रयास किया था। ऐसा इसलिए है क्योंकि इस्लाम की तरह हिंदू धर्म कोई मोनोलिथिक धर्म नहीं है। इसकी अनेक शाखाएं हैं और सबकी अपनी मान्यताएं व परंपराएं हैं, जिनके बचे रहने से ही भारत बचा हुआ है। इन्हें एक जैसा बनाने की कोशिश कभी सफल नहीं हो सकती है।

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इसलिए जावेद अख्तर को भारत के कट्टर हिंदू संगठनों के विरोध के अपने एजेंडे को जारी रखते हुए भी उनकी तुलना तालिबान से नहीं करनी चाहिए। अगर वे ऐसी तुलना करते हैं तो यह जान बूझकर की गई बदमाशी मानी जाएगी। क्योंकि उनके बारे में यह नहीं कहा जा सकता है कि वे तालिबान को नहीं जानते हैं या भारत और यहां के कट्टर हिंदू संगठनों को नहीं जानते हैं। वे दोनों को जानते हैं और दोनों का बुनियादी फर्क भी जानते हैं। इसलिए जब वे तुलना करते हैं तो संदेह होता है कि इसकी आड़ में वे तालिबान को वैधता और स्वीकार्यता दिलाने के एजेंडे पर काम कर रहे हैं। उनको पता नहीं यह समझ में आया या नहीं कि तालिबान के साथ आरएसएस की तुलना करके उन्होंने भारत का कितना नुकसान किया है। एक तो इस तुलना ने भारत के मुसलमानों के एक बड़े समूह में यह धारणा बनाई है कि तालिबान भी आरएसएस जैसा संगठन है, जिसका समर्थन करने में कोई बुराई नहीं है।

भले तालिबान ने तलवार के दम पर अफगानिस्तान की सत्ता हासिल की है और तलवार के दम पर ही उसे बनाए रखना है फिर भी उसकी सरकार को भारत में 22 करोड़ लोगों के वोट से चुनी हुई भाजपा की सरकार के जैसा मानने की धारणा बनेगी क्योंकि भाजपा आरएसएस का अनुषंगी संगठन है। इससे सामाजिक और राजनीतिक तौर पर कभी नहीं भरे जाने लायक विभाजन बनना शुरू होगा। दूसरी ओर जावेद अख्तर का बयान व्यापक हिंदू समाज में ऐसी प्रतिक्रिया पैदा करेगा, जिससे आरएसएस और उसके अनुषंगी संगठनों की ताकत बढ़ेगी। इस खतरे को समझते हुए उन्होंने यह बयान दिया है और इसलिए उनका बयान नोमानी या बर्क के बयान से ज्यादा खतरनाक और चिंताजनक है। अपने बयानों से वे एक तरफ तालिबान का एजेंडा पूरा कर रहे हैं तो दूसरी ओर कट्टर हिंदू संगठनों के एजेंडे को भी ताकत दे रहे हैं। पहले भी वे और उनके जैसे प्रगतिशील बुद्धिजीवी इस तरह के काम करते रहे हैं, जिससे सहिष्णुता की बजाय राजनीतिक कट्टरता को ताकत मिली।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

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  1. जावेद अख्तर की जुबां बंद कराने की कोशिश, संविधान का अपमान
    तालिबान फिर सत्ता सुख भोगने जा रहा है। 20 बरस बाद। तालिबान को सत्ता का सुख हासिल होने जा रहा है। तालिबान की सत्ता ने दुनिया में हायतौबा मचा रखी है। इस हायतौबा का असर सबसे ज्यादा कहीं है तो आपने मुल्क में है। तालिबान की मान्यता पर जबरदस्त बहस छिड चुकी है। वरिष्ठ पत्रकार अजित दिव्वेदी को लगता है कि जावेद अख्तर तालिबान की वैधता के सबसे बडे तलबगार हैं। अजित दिव्वेदी इसके साथ ही कई और नाम जोड रहे हैं। टीवी पत्रकार संदीप चौधरी का सवाल है तालिबान आतंकी है, क्या उससे बातचीत होगी ? जनरल परवेज मुशर्रफ क्या था ? फौज की वर्दी में सरगना। कारगिल मंे उसने कौन सी जुर्रत नहीं की। फिर भी एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी हुकूमत ने उससे बातचीत की थी। द्विपक्षीय रिश्तों की खातिर बातचीत। कूटनीति शायद यहीं कहती है। कोई आतंकी हो या दूसरा। जब हुकूमरान बन गया तो द्विपक्षीय रिश्तों की खातिर बातचीत तय हो जाती है। फिर भारत तो अफगान का पुराना दोस्त है। दीगर है कि चीन, रुस और पाकिस्तान अब नए अफगन के जिगरी दोस्त बनने की कवायद में जुट गए हैं। आतंकी टोले तालिबान के सबसे बडे हिमायती होने का दम भर रहे हैं। तालिबान को लेकर ही पिछले दिनों प्रधान सेवक साहेब ने प्रेसिडेंट पुतिन के साथ बातचीत की थी। रुस की सिक्योरटी कौंसिल के सर्वोसर्वा निकोले पाटरुचेव आपनी हालिया भारत यात्रा के दौरान पीएम तक से मिले। इसके बावजूद रुस तालिबान को वैधता दे रहा है। फिर जावेद अख्तर की वैधता का क्या मतलब?
    रुस, चीन, पाकिस्तान जिस तरह से तालिबान की हिमायत कर रहा है और भारत, अमेरिका जिस तरह से तालिबान के खदशे जाहिर कर रहा है। इससे दुनिया दो हिस्सो में बंट कर रह गई है। बात को आगे बढाने से पहले ज़रा समझ ले तालिबान है क्या बला ? सितंबर 1994 को तालिबान की नींव रखी गई। पश्तो जुबान में स्टूडेंट्स को तालिबान कहा जाता है। पश्तो आंदोलन धार्मिक मदरसों से उभरा था। जिसको खाद-पानी सउदी अरब ने दिया। सुन्नी इस्लाम की कट्टर मान्यताओं का प्रचार और शरिया क़ानून के कट्टरपंथी संस्करण को लागू करना इस संगठन का मकसद है। सोवियत संघ ने जब अफ़ग़ानिस्तान से अपनी फौजों सैनिकों को वापस बुलाना शुरु किया। तब मुल्ला उमर ने तालिबान की रचना कर डाली। दक्षिण-पश्चिम अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान का प्रभाव तेजी से बढ़ा। आपनी स्थापना के साल भर में तालिबान ने हेरात प्रांत पर कब्ज़ा किया। 1996 में तालिबान ने 27 सितंबर को प्रेसिडेंट नजीबल्लाह को सरेराह फांसी देकर अफगानिस्तन में हुकूमत कर ली। यह है तालिबान का इतिहास। तालिबानी कट्टर है। कट्टर लोग हमेशा आतंक और अलगाववाली मानसिकता के होते हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इसी कट्टरवादिता के चलते बहुत सारे इस्लामी संगठन दुनिया में खून-खराबा कर रहे हैं। हमास, आईएसआईएस ऐसे कई नाम हैं खून-खराबा जिनका जुनून बन गया है। कई भारतीय मुस्लमान भी आईएसआईएस में भरती हैं। मुल्क के लिए यह बेहद फिकरमंदी की बात है। लेकिन इस फिकरमंदी की जगह मुल्क में हो कुछ और ही रहा है। हो रहा है प्रोपेगंडा। नेरेटिव बनाने की ज़ोरदार कोशिशें। बहाना तालिबान।
    पहले-पहल तो लगा कि जावेद अख्तर का दुस्साहस लुटियन की दिल्ली में बैठे हुकूमरानों को आंख दिखाने का है। लेकिन जिस तरह से बीजेपी, शिवसेना,वरिष्ठ पत्रकार अजित दिव्वेदी औऱ कई दूसरे हिन्दु संगठन जावेद अख्तर पर टूट पडे। लगता है कि पूरा हिन्दु समाज इस सुगबगाहट में है कि इस मौके को हाथ से जाने न दिया जाए। मैं जावेद अख्तर साहेब का वकील नहीं। लेकिन संविधान की बात कर रहा हूं। जावेद अख्तर ने जो कहा। उसकी मज्जमत का हक सभी को है। करें। लेकिन जावेद अख्तर को भी तो अधिकार है आपनी बात रखने का। यह अधिकार उन्हें संविधान प्रदत्त है। बाबा साहेब भीम राव अंबेदकर के भारतीय संविधान में। बाबा साहेब के संविधान का जिकर अजित दिव्वेदी ने भी किया है। लेकिन साथ ही शरीयत के बहाने कुरान को भी आडे हाथों लिया है। इसके मायनों पर गौर करना जरुरी और लाजिमी भी। कुरान की खिल्ली उडाएं। किसी ने आपको रोका नहीं। लेकिन संविधान की दुहाई देकर नेरेटिव बनाने की इजाजत अजित भाई यह औछी हरकत है। इस नेरेटिव से संविधान को तिलांजलि देने की कोशिश हो रही है। आपने बाखूबी लिखा है कि मॉब लिंचिंग कानून-व्यवसथा का मामला है। साथ ही आप यह भी स्पष्ट कर रहे हैं कि मॉब लिंचिंग कइयों का धंधा बन गया है। धंधा बनाया किसने? भगवा ब्रिगेड को जब चौथी बार दिल्ली की सलत्नत पर हुकूम चलाने का हक मिला तो 28 सितंबर 2015 को नोयडा के गांव बिसाहडा में पहली मॉब लिंचिंग हुई। -अपन तो कहेंगे- हरिशंकर व्यास साहेब आपने इस कॉलम में इसकी तस्दीक करते हैं। आपके और मेरे दोनों के वरिष्ठ हैं जनाब हरिशंकर व्यास साहेब। लेकिन आपने आपने कॉलम नब्ज पर हाथ के तहत इसका जिकर नहीं किया। क्योंकि आपके अंदर का हिन्दु इसे करने से आपको रोक पाने में कामयाब रहा। आपकी निगाह में जावेद अख्तर विलेन। मेरी निगाह में आप खलननायक। मैं बाबा साहेब भीम राव अंबेदकर का उपासक। संविधान मेरा ग्रंथ। आप हिन्दु। मैं हिन्दु नहीं। ना मुझे कबी हिन्दु बन वहम में जीना है। मैं दलित हूं। दलित ही आखिरी दम तक रहना है। इसलिए मैं जावेद अख्तर के संविधान प्रदत्त अधिकार का समर्थन करता हूं।
    -मनोज नैय्यर
    journalistmanojnayyar@gmail.com

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