अयोध्या की बात, तब और अब!

एक समय था, जब अयोध्या की बात से लोगों के खून खौलने लगते थे। मारने-काटने की बातें होने लगती थीं। एक तरफ राम की सौगंध खाकर मंदिर बनाने का संकल्प किया जाता था तो दूसरी ओर चुनौती थी कि विवादित जगह पर एक भी ईंट रखी गई तो खून की नदियां बह जाएंगी। करीब तीस साल के बाद अब स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि सारी विवादित जमीन रामलला की है और केंद्र सरकार उस पर मंदिर बनाएगी फिर भी पूरे देश में सहज, स्वाभाविक रूप से शांति बनी रही। देश के किसी हिस्से से किसी तरह की हिंसक घटना की खबर नहीं आई। उलटे हर जगह से हिंदू-मुस्लिम भाईचारे की सकारात्मक खबरें आ रही हैं। दशकों क्या सदियों तक कानूनी, राजनीतिक और धार्मिक लड़ाई लड़ने वाले समूहों ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को चैलेंज तक नहीं किया।

सोचें, यह कितना बड़ा बदलाव है। आमतौर पर सर्वोच्च अदालत के फैसले की एक बार समीक्षा करने के लिए याचिका दी जाती है। इसी बात को ध्यान में रख कर चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने चीफ जस्टिस के रिटायर होने के पांच कामकाजी दिन पहले फैसला सुनाया ताकि समीक्षा याचिका दायर हो तो यहीं बेंच उस पर फैसला करे। पर फैसले के बाद सुन्नी वक्फ बोर्ड, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और दूसरे मुस्लिम समूहों ने कहा कि वे फैसले को चुनौती नहीं देंगे। यह समय के साथ उनके अंदर आई परिपक्वता को तो दिखाता ही है साथ ही यह मौजूदा समय की सचाई को स्वीकार करने का भाव भी दिखाता है।

इस फैसले से सहमत नहीं होते हुए भी इसे स्वीकार करने का एक कारण तो यह है कि फैसला सुप्रीम कोर्ट का है और वह भी आम सहमति से आया हुआ है। फैसले से पहले सबने कहा हुआ है कि वे अदालत का फैसला मानेंगे। इसलिए उन्होंने फैसले से असहमति जताते हुए भी इसे स्वीकार किया और चुनौती नहीं देने का फैसला किया। दूसरा कारण यह है कि केंद्र की मौजूदा सरकार की राजनीति की वजह से देश के बहुसंख्यक नागरिकों की सोच पहले के मुकाबले बदली हुई है। मस्जिद के लिए मुकदमा करने वाले और उनकी पैरवी करने वालों को भी पता है कि पिछले पांच-छह साल में बहुसंख्यक हिंदू समाज की एकजुटता दंगा-फसाद करने की हद से बहुत आगे चली गई है।

पहले हिंदुओं की धार्मिक व राजनीतिक चेतना बिल्कुल अलग-अलग तरह से व्यावहार करती थी। मंदिर-मस्जिद के मामले में तो वे हिंदू की तरह सोचते थे पर चुनाव के समय उनकी चेतना सिर्फ जाति से प्रभावित और निर्देशित होती थी। अब उनकी धार्मिक चेतना का बहुत हद तक राजनीतिक चेतना में विलय हो गया है। इसी वजह से उनका राजनीतिक व्यवहार धर्म से प्रभावित होने लगा है। जब तक बहुसंख्यकों का धार्मिक व राजनीतिक व्यवहार अलग अलग था तब तक तो मंदिर मुद्दे पर भाजपा दो सौ की संख्या भी पार नहीं कर सकी। लेकिन जब से दोनों का एकीकरण हुआ है तब से भाजपा लोकसभा में अकेले पूर्ण बहुमत हासिल कर रही है। इस सचाई को स्वीकार करके ही मस्जिद पक्ष ने इस मामले को ज्यादा तूल नहीं देने का फैसला किया।

मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस और प्रदेश की दूसरी भाजपा विरोधी पार्टियों के सुर भी इसी वजह से बदले हैं। याद करें कैसे कांग्रेस 1992 में विवादित ढांचा टूटने के बाद से इस मसले पर आक्रामक रही थी। कांग्रेस ने इसके लिए कभी भी तब के प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव को माफ नहीं किया। उन्हें अपना मानने से इनकार कर दिया। कांग्रेस के कई नेताओं ने कहा कि अगर उस समय गांधी-नेहरू परिवार का कोई सदस्य प्रधानमंत्री होता तो ढांचा नहीं टूटता। कांग्रेस के कई नेता बाद के बरसों तक कहते रहे कि वहां फिर से मस्जिद बननी चाहिए। पर आज कांग्रेस के शीर्ष नेता फैसले का स्वागत कर रहे हैं और अमन चैन बनाए रखने की अपील कर रहे हैं। यह अच्छा है, जो कांग्रेस और दूसरी भाजपा विरोधी पार्टियों ने राजनीतिक नैरेटिव के इस बदलाव को समझा है। उम्मीद करनी चाहिए कि वे इस हिसाब से अपने को बदलने का प्रयास करेंगे।

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