nayaindia Democracy politics constitutional institutions जो सच बोलेंगे सच्चे होंगे वे मारे
बेबाक विचार | नब्ज पर हाथ| नया इंडिया| Democracy politics constitutional institutions जो सच बोलेंगे सच्चे होंगे वे मारे

जो सच बोलेंगे, सच्चे होंगे, वे मारे जाएंगे!

constitution

Democracy politics constitutional institutions देश के चीफ जस्टिस एनवी रमना और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ का आभार जो उन्होंने सरकारों और लोकतंत्र का आधार मानी जाने वाली संस्थाओं की हकीकत जाहिर की। चीफ जस्टिस एनवी रमना ने छत्तीसगढ़ के एक आईपीएस अधिकारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा ‘देश में दुखद स्थिति है। जब भी कोई राजनीतिक दल सत्ता में आता है तो कुछ पुलिस अधिकारी उसके लिए काम करने लगते हैं। फिर जब दूसरी राजनीतिक पार्टी सत्ता में आती है तो पहले वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी जाती है। उन पर राजद्रोह जैसे गंभीर आरोप तक लग जाते हैं। यह नया और परेशान कर देने वाला चलन है। इसे रोकना जरूरी है’।

इसके बाद जस्टिस एमसी छागला की स्मृति में होने वाले व्याख्यान में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने सरकारों के झूठ को उजागर करने की बात कही। ‘नागरिकों के सत्ता से सच बोलने का अधिकार’ विषय पर व्याख्यान देते हुए जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा सत्ता के सामने सच बोलना नागरिक का न सिर्फ अधिकार है, बल्कि उसका कर्तव्य भी है और इसे हासिल करने के लिए हमें संस्थाओं को मजबूत बनाना होगा, जैसे प्रेस की आजादी सुनिश्चित करनी होगी और चुनावों की ईमानदारी और निष्पक्षता सुनिश्चित करनी होगी। विचारों की बहुलता को स्वीकार करना होगा और उसका उत्सव मनाना होगा’। उन्होंने आगे कहा ‘सत्य के लिए सिर्फ राज्य पर भरोसा नहीं किया जा सकता। राज्य द्वारा बताया गया सत्य हो सकता है कि हमेशा झूठ से मुक्त न हो। लोकतंत्र का अस्तित्व बने रहने के लिए सच की ताकत जरूरी है’ उन्होंने ‘ओरिजिन ऑफ टोटलिटैरियनिज्म’ जैसी किताब लिखने वाली मशहूर लेखिका हाना आरेंट को उद्धृत करते हुए कहा ‘अधिनायकवादी सरकारें सत्ता को मजबूत करने के लिए झूठ पर निर्भरता के लिए जानी जाती हैं’।

justice dy chandrachud

चीफ जस्टिस रमना और जस्टिस चंद्रचूड़ की बातों का मतलब है कि लोकतंत्र के अस्तित्व में बने रहने के लिए सच की ताकत और संस्थाओं की मजबूती सबसे जरूरी है। दुर्भाग्य से इस समय सच और संस्थाएं दोनों खतरे में हैं। दोनों न्यायमूर्तियों के भाषण में तीन संस्थाओं- पुलिस, मीडिया और चुनाव का जिक्र हुआ। मीडिया का स्वतंत्र होना जरूरी है, चुनाव तटस्थ, निष्पक्ष और ईमानदारी से हों यह जरूरी है और पुलिस निष्पक्ष तरीके से काम करे यह भी जरूरी है। लेकिन इसके साथ साथ बाकी संस्थाओं की निष्पक्षता और ईमानदारी भी इतनी ही जरूरी है, जिसमें न्यायपालिका भी शामिल है। यह जरूर है कि बाकी संस्थाओं के मुकाबले सेना और न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा ज्यादा है लेकिन एक संस्था के तौर पर न्यायपालिका अपनी ऐतिहासिक भूमिका निभाने में पूरी तरह से सफल रही है, ऐसा नहीं कहा जा सकता।

यह सही है कि जिसकी सरकार आती है पुलिस अधिकारी उसके लिए काम करने लगते हैं लेकिन क्या न्यायपालिका सरकारों की मर्जी का ख्याल नहीं रखती है? अनगिनत ऐसे मामले हैं, जिसमें न्यायपालिका ने सरकारों की मनमानी पर आंखें मूंदे रखी या सरकारों को क्लीन चिट दी। हाल की मिसाल दें तो लाखों प्रवासी मजदूरों के पैदल चल कर अपने घर लौटने की दुर्भाग्यपूर्ण गाथा है, जिस पर देश की न्यायपालिका आंखें बंद करके बैठी रही। माननीय चीफ जस्टिस ने इसे दुर्भाग्यपूर्ण कहा है कि जिसकी सरकार आती है पुलिस अधिकारी उसके हिसाब से काम करने लगते हैं। लेकिन जिसने सरकार के हिसाब से काम नहीं किया और संजीव भट्ट या अमिताभ ठाकुर बन गए, उनको बचाने के लिए देश की कौन सी संस्था आगे आई! जेल में सड़ रहे संजीव भट्ट और घसीट कर जेल ले जाए गए अमिताभ ठाकुर की कहानी इस देश के सारे पुलिस अधिकारियों को सरकार के सामने नतमस्तक कराने के लिए पर्याप्त है क्योंकि उनके बचाव में कोई नहीं आया- न विधायिका, न न्यायपालिका और न मीडिया! देश के एक रिटायर चीफ जस्टिस का राज्यपाल बनना और दूसरे का राज्यसभा सदस्य बनना इस बात का संकेत है कि वहां भी बहुत कुछ सड़ रहा है।

Read also उत्तराखंड में गायको के सहारे भाजपा!

असल में यह इस देश का दुर्भाग्य है कि आजादी के 74 साल में भारत में लोकतंत्र को आधार देने वाली कोई भी संस्था इतनी मजबूत नहीं बनी कि वह ईमानदारी से अपनी संविधान प्रदत्त भूमिका निभा सके। सारी संस्थाओं के पैर मिट्टी के बने हैं, जो जरा सा पानी पड़ते ही गलने लगते हैं। पुलिस अपवाद नहीं है। समूचा प्रशासन सरकार के इशारे पर काम करता है। वरना क्या कारण था कि महज तीन साल पहले आईएएस बना करनाल का एसडीएम पुलिस को यह निर्देश देता कि कोई भी किसान बैरिकेड से आगे बढ़े तो उसका सिर फूटा हुआ होना चाहिए! देश की विधायिका, न्यायपालिका, मीडिया, कारपोरेट कोई भी इसका अपवाद नहीं है। जो सरकार में होता है उसकी मर्जी के हिसाब से संसद और विधानसभाओं में कानून बनते हैं। कारपोरेट का समूचा चंदा उसको मिलता है। मीडिया में सारी कवरेज उसको मिलती है। अदालतों के फैसले उसकी जायज-नाजायज कार्रवाइयों पर मुहर लगाने वाले होते हैं। चुनाव आयोग सरकार के हिसाब से चुनाव कराता है और तमाम संवैधानिक संस्थाएं सरकार के एजेंडे को पूरा करने का माध्यम बन जाती हैं। कुछ व्यक्ति अपवाद हो सकते हैं पर हर संस्था की हकीकत यही है। फिर चेतावनी सिर्फ पुलिस को क्यों? देश की हर संस्था को अपने गिरेबान में झांकने की जरूरत है। उसे आत्ममंथन करने की जरूरत है कि कहां, क्या चूक हुई है, जो संस्थाएं मिट्टी के पैर वाली हो गईं? यह संस्थाओं की कमतरी ही है कि जब कोई हंसराज खन्ना या जेएम लिंगदोह ईमानदारी से अपनी संविधान प्रदत्त भूमिका निभाता है तो संस्थाओं से बड़ा बन जाता है।

CBSE Exam in Corona

दुनिया के सभ्य, विकसित और सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक देशों में लोकतंत्र संस्थाओं से बनता है लेकिन भारत में लोकतंत्र का मतलब सरकार है। सरकार से सारी संस्थाएं बनती और चलती हैं। सरकार माई-बाप है। संविधान नहीं, सरकार की मर्जी सर्वोपरि होती है और जहां संविधान उसकी मर्जी के रास्ते में बाधा बनता है वहां उसे भी बदल दिया जाता है। सोचें, जब संविधान की कोई बिसात नहीं है तो संस्थाओं की क्या हैसियत! सरकार के आगे बोलने की हिम्मत किसी में नहीं है। अमृत महोत्सव के वर्ष में भारत की हकीकत है- भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और कानून का दुरुपयोग! जो सरकार में बैठा है उसे भ्रष्टाचार करने की छूट है, उसे भाई-भतीजावाद करने की आजादी है और कानून का दुरुपयोग उसका जन्मसिद्ध अधिकार है!

आजादी के अमृत महोत्सव के साल में यह दुर्भाग्य है कि भारत महान के नागरिकों का जीना पूरी तरह से झूठ में है। देश में झूठ अब किसी एक व्यक्ति का निजी उद्यम नहीं रह गया है, बल्कि उसे सांस्थायिक रूप दे दिया गया है। आईटी सेल के जरिए झूठ का निर्माण हो रहा है और उसे वैकल्पिक सच के रूप में प्रचारित करके स्थापित किया जा रहा है। जस्टिस चंद्रचूड़ ने पोस्ट ट्रूथ वर्ल्ड की बात कही और ‘हमारी सचाई बनाम आपकी सचाई’ के बीच की प्रतियोगिता का भी जिक्र किया। लेकिन सच तो एक ही होता है! एकम सद् विप्रा बहुदा वदंति! सत्य एक होता है, जिसे विद्वान अलग अलग तरीके से कहते हैं। लेकिन यहां तो अपना डंका बजाने और विरोधी को बदनाम करने के लिए सच के समानांतर एक दूसरे सच का निर्माण किया जा रहा है। सत्य गढ़ा जा रहा है और लोगों को यकीन दिलाया जा रहा है कि गढ़ा हुआ यानी निर्मित सत्य ही असली सत्य है। ऐसे में सच बोलने की हिम्मत कौन करेगा? तभी समकालीन श्रेष्ठ कवियों में से एक राजेश जोशी की यह कविता याद आती है, जो उन्होंने 1988 में लिखी थी –

जो इस पागलपन में शामिल नहीं होंगे, मारे जाएंगे

कठघरे में खड़े कर दिए जाएंगे, जो विरोध में बोलेंगे

जो सच-सच बोलेंगे, मारे जाएंगे

बर्दाश्त नहीं किया जाएगा कि किसी की कमीज हो

‘उनकी’ कमीज से ज्यादा सफेद

कमीज पर जिनके दाग नहीं होंगे, मारे जाएंगे

धकेल दिए जाएंगे कला की दुनिया से बाहर, जो चारण नहीं

जो गुन नहीं गाएंगे, मारे जाएंगे

धर्म की ध्वजा उठाए जो नहीं जाएंगे जुलूस में

गोलियां भून डालेंगी उन्हें, काफिर करार दिए जाएंगे

सबसे बड़ा अपराध है इस समय

निहत्थे और निरपराधी होना

जो अपराधी नहीं होंगे, मारे जाएंगे।

By अजीत द्विवेदी

पत्रकारिता का 25 साल का सफर सिर्फ पढ़ने और लिखने में गुजरा। खबर के हर माध्यम का अनुभव। ‘जनसत्ता’ में प्रशिक्षु पत्रकार से शुरू करके श्री हरिशंकर व्यास के संसर्ग में उनके हर प्रयोग का साक्षी। हिंदी की पहली कंप्यूटर पत्रिका ‘कंप्यूटर संचार सूचना’, टीवी के पहले आर्थिक कार्यक्रम ‘कारोबारनामा’, हिंदी के बहुभाषी पोर्टल ‘नेटजाल डॉटकॉम’, ईटीवी के ‘सेंट्रल हॉल’ और अब ‘नया इंडिया’ के साथ। बीच में थोड़े समय ‘दैनिक भास्कर’ में सहायक संपादक और हिंदी चैनल ‘इंडिया न्यूज’ शुरू करने वाली टीम में सहभागी।

Leave a comment

Your email address will not be published.

eleven − six =

ट्रेंडिंग खबरें arrow
x
न्यूज़ फ़्लैश
पंजाब: हंगामे की भेंट चढ़ा विस सत्र
पंजाब: हंगामे की भेंट चढ़ा विस सत्र